Sat. Aug 8th, 2020

ये जनता है, सब जानती है और मधेश भावुक हो सकता है पर मुर्ख नहीं : श्वेता दीप्ति

 

पहाड़ का दर्द भी अलग नहीं है |(सम्पादकीय ) हिमालिनी, अगस्त अंक | प्रकृति की मार ने रुह को सर्द कर दिया है । कमजोरियों और खोखली व्यवस्थाओं के पोल खुल चुके हैं । बाढ़ हर वर्ष आती है, कम या अधिक, बावजूद इसके सम्बन्धित निकाय की लापरवाही कायम रहती है । न कोई पूर्व तैयारी ना ही जनचेतना, परिणाम सबके सामने है । लाशों के सरकारी आँकडेÞ भले ही जो भी हों पर वस्तुस्थिति और वास्तविकता कुछ और ही होती है, इससे हम सब वाकिफ हैं । आश्चर्य तो यह है कि इस भयावह परिस्थिति में भी सरकार तब जगी जब वक्त हाथ से निकल चुका था । समय रहते अगर सेना परिचालन कराया गया होता तो कई जानें बच सकती थीं । कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ हर साल बाढ़ आती है फिर भी ना तो वहाँ की जनता समय रहते जगती है और न ही सरकार की ओर से कोई पूर्व तैयारी होती है । पहाड़ का दर्द अलग नहीं है, यहाँ भी आए दिन भूस्खलन की पीड़ा लोग झेलते हैं, दुर्घटनाएँ होती हैं, पर कोई ठोस कदम या समाधान सामने नहीं है ।
अफरातफरी के इस माहोल में भी कुछ ऐसे हैं जो इस आपदा को भी आगामी चुनाव के मद्देनजर राष्ट्रीयता का रंग देकर फायदा लेने से बाज नहीं आ रहे हैं । पर ये जनता है, जो सब जानती है और मधेश भावुक हो सकता है पर मुर्ख नहीं ।
चुनाव की तिथि नजदीक आती जा रही है पर मधेश का मसला अपनी जगह कायम है । दो नम्बर प्रदेश की जनता चुनाव चाहती है किन्तु अपनी माँगों के सम्बोधन के बाद । वहीं राजपा नेपाल पर आंतरिक दवाब बना हुआ है । राजपा पंजीकृत हो चुकी है और चुनाव चिन्ह लेने की प्रक्रिया में अपने कदम बढ़ा चुकी है । देखना यह है कि मधेश की भावनाएँ काम करती हैं या फिर आन्तरिक या बाह्य दवाब ।
भारत और चीन के बढ़ते तनाव का असर संसद में देखने को मिला जो निश्चय ही नेपाल की वैदेशिक नीति पर सवाल खड़ा करता है । चीन का बढ़ता निवेश अगर आर्थिक समृद्धि नेपाल को देता है तो यह एक अच्छा पहलु है परन्तु, नेपाल के लिए भारत का विलगाव भी कभी सही नहीं हो सकता । खैर, नेपाल की नजरें प्रधानमंत्री देउवा की भारत यात्रा पर टिकी हैं, उम्मीद है कि रिश्तों की तल्खी दूर होगी ।

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हम मानव हैं, सभ्यता की मिसाल,
हम ही रचते हैं कई बार चक्रव्यूह,
फँसते हैं और तड़पकर, जान दे देते हैं
फिर भी सीखते नहीं सबक
क्योंकि हम मानव हैं ।

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