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पृथ्वीनारायण शाह एक शोषक और जातीय राजा थे : बिकाश तिवारी

 

मनोज बनैता, सप्तरी, ११ जनवरी ।

 

पृथ्वीजयन्ती के दिन पर नेता विकाश तिवारी ने समाजिक सन्जाल मार्फत ये कहा है कि राजा पृथ्वीनारायण शाह एक शोषक और जातीय राजा थे । उन्होने पृथ्वी जयन्ती बहिष्कार के लिए आह्वान किया है । नेता तिवारी कहते है: पृथ्वी नारायण शाह का जन्म जयंती और तथाकथित राष्ट्रीय एकता दिवस को देश के तमाम शोषित पीड़ित समाज के लोगों को सक्रिय बहिष्कार और विरोध के लिए आह्वान करता हूँ । कारण :- 1. पृथ्वी नारायण मरने से पहले अपने पुत्रों और कुटुम्बों को बुला कर उपदेश दिया । नेपाल के इतिहासकार और साहित्यकार इस उपदेश को ‘ दिव्योपदेश ‘कह कर सम्बोधन करते है । पृथ्वी नारायण अपने सन्देश में इस राज्य को चार वर्ण 36 जात की साझा फुलवारी बताया था । मैं जब राजविराज के के. अ. मा. वि. में पढ़ता था । एक दिन नेपाली शिक्षक राम प्रसाद भट्टराई से पुछा, सर, यो पृथ्वी नारायण को चार वर्ण भनेको के हो ? उनका जवाब था ब्राह्मण , क्षत्री, वैश्य और शुद । परंतु बहुत दिनों के बाद अध्ययन और लेखन के क्रम में पता चला कि पृथ्वी नारायण का चार वर्ण का तात्पर्य वाहुन,क्षेत्री,ठकुरी और मगर है । क्योंकि गोर्खा में मगर जाति भी मुख्य जाति में से था । अर्थात पृथ्वी नारायण के साझा फुलवारी नामक दिव्योपदेश में मधेशी कहीं नहीं है । 2.पृथ्वी नारायण का लक्ष्य गोर्खा राज्य विस्तार के साथ ही केन्द्रीकृत राजतंत्रात्मक एकात्मक शासन और जातीय प्रशासन की स्थापना भी थी । जिसके तहत गोर्खाली प्रशासन में खासकर सैनिक विभाग में क्षत्री, मगर, ठकुरी को और निजामती विभाग में बाहुन को भरा गया । निजामती प्रशासन में 6 ( छ) थर पांडे, पन्त, बोहरा, खनाल,राणा और अर्याल वाले लोगों को ही रखने की नीति अपनायी गई । जिसे पृथ्वी नारायण की 6(छ) थर की नीति भी कहा जाता है । 3.पृथ्वी नारायण ने अपने दिव्य उपदेश में कहा “मगर जाॅची विचारी थाप्नु , ठकुरी जाॅची डिठ्ठा राख्नु ” । इस प्रकार पृथ्वी नारायण ने राज्य का फौजी और देवानी कार्यभार किस किस जाति को किस किस तह पर देना है । सभी बातें अपने दिव्य उपदेश में स्पष्ट रूप में बताई थी । उनके उक्त सन्देश में मधेशी और जनजातियों के लिए कुछ नहीं था । पृथ्वी नारायण को हर मोर्चा पर साथ देने वाले मगर को भी ‘जाॅची विचारी राखनु’ कह कर मगर के साथ भी अघोषित रूप से निषेध और विभेद की बात की थी । यसर्थ पृथ्वी नारायण का गोर्खा राज्य विस्तार का मूल लक्ष्य वाहुन, क्षत्री और ठकुरी सहित का जातीय राज्य स्थापना से था । जिसके तहत इन्हीं जातियों को ही गोर्खाली/ नेपाली प्रशासन में जिम्मेवारी मिली । यह अघोषित रूप में आज भी कायम है । आज सेना में क्षत्री 43.64%, मगर 7.6% तथा निजामती में बाहुन 73.6 % का वर्चस्व है । नीति निर्णायक तह पर यही होते है । नीति कार्यान्वयन स्तर पर यही होते है । और, राज्य के हरेक तह सहित न्यायालय में भी यही है ।

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