हमारा बैंक में दो अरब था बढ़कर आठ अरब हुआ यह अबैध कैसे हुआ ? अरुण सुमार्गी
वीरगंज उदोग वाणिज्य संघ की ४२वीं साधारण सभा के अवसर पर अरुण सुमार्गी के मंतव्य का संपादित अंश
मैं चार विन्दुओं पर अपना विचार रखने की अनुमति चाहता हूँ । सर्वप्रथम मैं वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ के ४२वें साधारण सभा की सफलता की शुभकामना व्यक्त करना चाहता हूँ । दूसरा, जब मैं मकवानपुर उद्योग वाणिज्य संघ का सभापति था और इस हैसियत से वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ के पूर्व अध्यक्षों के साथ भारत के विभिन्न चेम्बरों का भ्रमण किया था, उस समय हमने मिलकर एक एएमयू तैयार किया था । आज जब वीरगंज स्वयं का आर्थिक राजधानी के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाह रहा है तो इस संदर्भ में मैं इसे अपरिहार्य समझता हूँ । मैंने हमेशा इस वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ को आदर के रूप में देखता हूँ । इस क्षेत्र के प्रति मेरा सदभाव रहा है । आज यह क्षेत्र जब क्षेत्रीय और प्रादेशिक निकायों का नेतृत्व कर रहा है तो मैंने ये बातें स्पष्ट करना आवश्यक समझा कि बारा, पर्सा और मकवानपुर उ. वा. संघ का एक साझा मंच तैयार हो । आज जब वीरगंज प्रदेश की राजधानी की भी परिकल्पना कर रहा है तो इस सन्दर्भ में यहाँ की प्रदेश सभा में जीते हुए जनप्रतिनिधियों की बात भी मैंने सुनी है । इस सन्दर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि वीरगंज देश को पैसा देता है लेकिन सरकार की दृष्टि में यह उपेक्षित है और इसे उस अनुपात में अपना हिस्सा नहीं मिलता । आज वीरगंज महानगर बन चुका है लेकिन यहाँ की स्थिति यह है कि कई क्षेत्रों में यह ग्रामीण विकास का स्तर भी नहीं प्राप्त कर सका है । इसलिए भी यह आवश्यक है कि बारा, पर्सा और मकवानपुर के चेम्बर का साझा मंच तैयार हो ।
इस देश में हड़ताल की आवाज सुनना आम बाता है । वीरगंज देश को रिवेन्यू तो देता है, लेकिन उसका हिस्सा उसे नहीं मिलता है । लेकिन आज जब वीरगंज २ नंबर प्रदेश की राजधानी बनने की इच्छा जाहिर कर रहा है तो मैं माननीय मंत्रीजी से यह आग्रह करता हूँ कि ऊपरी स्तर पर हमारी यह आवाज उनके द्वारा उठा दी जानी चाहिए । आज वीरगंज देश की कुल रिवेन्यू का ६५ प्रतिशत राष्ट्र को देता है । ऐसे में अगर वह प्रदेश की सभा में अपनी जगह माँगता है और इस प्रदेश की आर्थिक राजधानी माँगता है तो यह उसकी गलत माँग नहीं है । लेकिन जब कभी हम इस तरह की आवाज इस मंच से उठाते हैं तो हमारे मुख्य अतिथि तथा सम्बन्धित निकायों के मंत्रीगण इस आवाज को सुनते तो जरूर हैं लेकिन कानूनी रूप में इसे आगे बढ़ाने के लिए कोई पहल नहीं करते ।
यह इस देश की विडम्बना है । मैं लेखक भी हूँ और आर्थिक विषयों पर विभिन्न आलेख मैं लिखता रहा हूँ । इनमें मैं हमेशा इस बात के पक्ष में लिखता रहा हूँ कि वीरगंज को देश का ही आर्थिक राजधानी बनाया जाना चाहिए । इस बात को राष्ट्रीय संचार तंत्रों में भी मैं कहता रहा हूँ । आज यह निश्चित है कि हमारे अर्थराज्य मंत्री जो निश्चित ही कुछ दिनों में संसद में विपक्ष में बैठेंगे, यह अवसर सृजनशील कार्यों के लिए भी आदर्श है । आप नेपाली काँग्रेस के ऐसे युवा नेता हैं जिनमें पर्याप्त संभावनाएँ हैं । इसलिए भी आपको यह बताना आवश्यक है । सत्ता संचालन करने वाले दलों और सम्बन्धित मंत्रालयों पर तो हम दबाब डालेंगे ही । दो दिनों पूर्व ही हमने पृथ्वीनाराण साह के जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया है । मैं क्या देख रहा हूँ कि नेपाल में २००७ साल के परिवर्तनों के बाद आजतक सार्वजनिक खरीद का कानून तो है लेकिन सार्वजनिक विक्री का कानून नही है और तजवीज के आधार पर हम विक्री करते हैं । हम फ्रीक्वेन्सी बेचते हैं, हम पानी के रास्ते बेचते हैं, हम पानी बेचते हैं, हम हवा बेचते हैं, हम पत्थर बेचते हैं, गिट्टी बेचते हैं । इसलिए संसार के प्रायः देशों में विक्री का कानून है लेकिन नेपाल ऐसा देश है जहाँ विक्री का कोई कानून नहीं ।
नेपाल में राज्य का संचालन करने वाले निकाय पुलिस, प्रशासन आदि के लिए यह निश्चित है कि उन्हें कितना पैसा खर्च करना है और उसके खर्च करने की प्रक्रिया क्या है ? अगर यह सब उसके पास है तो उसे क्लिनचिट मिल जाता है । लेकिन व्यापार करने वालों को यह सुविधा प्राप्त नहीं । अगर कोई हमें परेशान करना चाहता है तो एक पुर्जा मात्र लेकर वह अगर सीडीओ, अख्तियार अथवा सम्पत्ति शुद्धिकरण निकाय में चला जाता है तो दूसरे दिन ही हमें अपराधी के कठघरे में खड़ा होने की स्थिति आ जाती है । उद्योगी–व्यवसायियों ने इतने वर्षों में इतना पैसा कमाया और आज उसकी कीमत यह है इसक प्रमाणपत्र हमें नहीं मिलता । हमारे यहाँ लालपुर्जा का काफी महत्व है । अगर किसी का दादा के नाम लालापुर्जा है और उसका पोता जब यह खोजते हुए आता है तो थोड़ा प्रयास करने पर उसे उसका हिस्सा मिल जाता है । लेकिन हमारे लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है । यही कारण है कि हमें हमेशा पापी और बदमाश समझा जाता है ।
इसी सन्दर्भ में पर्सा अगर आर्थिक राजधानी बनना चाहता हूँ कि उसकी यह माँग साशदर्भिक है । अगर यहाँ का उद्योगी व्यवसायी ६५ प्रतिशत रिवेन्यू राज्य को देता है तो अपने व्यावसायिक हितों के संरक्षण के लिए अगर वह आर्थिक राजधानी माँगता है तो यह उचित है और मैं इसका जोरदार समर्थन करता हूँ ।
यहाँ एक हमारे सरोकार का विषय भी है । फौरन डाइरेक्ट इन्वेस्टमेण्ट से जुड़ा यह विषय है और मेरे परिवार से भी इसका सम्बन्ध है । अगर हमसे जुड़े मंत्रालय के मंत्री यहाँ नहीं होते तो मैं इस विषय का चर्चा नहीं करता । लेकिन वे यहाँ हैं और मैं कहना चाहता हूँ कि यदि विदेश से पैसा लाकर यहाँ निवेश करना पाप है तो इसका निर्णय कर देना चाहिए और हमें पैसा वापस ले जाने का रास्ता तैयार कर देना चाहिए । हमें बन्धक नहीं बनाना चाहिए । अगर विदेश से लाए गए पैसे को गलत निगाह से देखा जाता है और दलाली न मिल पाने के कारण मीडिया में इसे गलत ढंग से प्रचारित और प्रसारित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और ऐसे व्यक्ति को संरक्षण दिया जाता है तो इसे क्या कहा जाना चाहिए ? अगर मैं और मेरे परिवार ने व्यवसाय के लिए विदेश से पैसा लाकर अपराध किया है तो मैं सजा भुगतने के लिए तैयार हूँ । अगर नहीं तो हमें मरहम लगाना चाहिए । अगर हम उद्योगी–व्यावसायी पाप ही करने के लिए जन्म लिए तो हमें बता देना चाहिए कि हमारे कौन–कौन से पाप हैं । हमें पाप करने का लाइसेंस देना चाहिए । अन्यथा विदेश से लाए गए धन की ओर अँगुली उठाने वालों को तमीज सीखलानी चाहिए और उन्हें ऐसा नहीं करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ।
हमारा एक बैंक में दो अरब रुपया था जो अब बढ़कर आठ अरब हो चुका है । इस पैसे को अबैध कैसे कहा जा सकता है ? आज हमारी स्थिति यह है कि कम लागत की लघु विद्युत परियोजनाओं में हमारा करोड़ों का निवेश है लेकिन हम पैसा नहीं दे पा रहे हेैं और परियोजना भी पुूरी नहीं हुई है । आज हम रो रहे हैं । इसलिए माननीय मंत्रीजी को इसी मंच से हमारे लिए सहानुभूति के शब्द देने चाहिए । अन्यथा हमें गोबिन्द केसी की तरह अनशन आदि का मार्ग ही अवलंबन करना पड़ा तो हम इसके लिए भी तैयार हैं । एक ओर हम विदेश से पैसा लाने पर हम भी अपराधी हैं । दूसरी ओर विदेश में पेसा ले जाने वाले और अगर लालबाबू पंडित के शब्दों में कहें तो कार्ड लेकर बैठने वालों के विरुद्ध कार्रवाइ करने में सक्षम नहीं हैं ।
अन्त में सकारात्मक पक्ष की बातें भी हमारे सामने हैं । देश प्रादेशिक संरचना में जा चुका है । इसके सन्दर्भ में नीतियों का अभाव है । इस सन्दर्भ में विचार विमर्श करना जरूरी है । हम किसी प्रदेश में उत्पादन करते हैं और अगर दूसरे प्रदेश में जाते हैं तो इस अवस्था में कर प्रणाली क्या होगी ? इसका सही रूप सामने नहीं आया है । इसलिए हमारे उद्योगपति व्यवसायी तथा प्रादेशिक सभा के सदस्यों मिलकर इस सन्दर्भ में विचार करना चाहिए ताकि बाद में किसी प्रकार की असहमति की गुंजाइश न रहे । नेपाल हमारा है । हम सारे लोगों को मिलकर इसके विकास के सन्दर्भ में सोचना चाहिए । आज प्रतिदिन हजारो लोग वैदेशिक रोजगार में जा रहे हैं । इसलिए देश के भीतर ही रोजगार का अवसर सृजित करना चाहिए जो निजी क्षेत्र के सहयोग के बिना संभव नहीं । इसलिए इस क्षेत्र की समस्याओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाना चाहिए । अन्त में हठौडा में जन्म लिए एक व्यक्ति जो उ. वा. संघ के सदस्य की हैसियत से अपनी यात्रा करता रहा उसे वीरगंज ने जो स्नेह और सम्मान दिया उसके लिए आभार और वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ की ४२ वीं साधारण सभा की सफलता की शुभकामना ।m


