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राजशाही पुनर्जीवित करने की साजिश

 

संविधान-सभा भंग होने के बाद जहां संघीयता और अधिकार को लेकर आम जनता और उन के नुमाईंदे बने राजनीतिक दल निराश हैं और बदली हर्ुइ नई परिस्थिति में सभी राजनीतिक दल जहां अपनी भूमिका को लेकर चिन्तित हैं, वहीं इन दलों पर दूर से नजर डाल रहे और सत्ताच्यूत हो चुके पर्ूव राजा ज्ञानेन्द्र के लिए यह एक सुखद समाचार के रूप में आया है। संविधान-सभा भंग होने के बाद राष्ट्रपति डाँ रामवरण यादव जहां उत्पन्न परिस्थिति के बारे में कानूनी सल्लाह लेने में व्यस्त थे वहीं निर्मल निवास में भी देश के बडे और नामचीन अधिवक्ताओं और संविधान विज्ञों का जमावडा लगा हुआ था।
संविधान-सभा से संविधान नहीं बनने, संविधान-सभा भंग होने और इस समय रहे अन्तरिम संविधान के अस्तित्व पर भी संकट खडा होने की स्थिति में क्या फिर से २०४७ साल के संविधान को जीवित किया जा सकता है – निर्मल निवास में हर्ुइ बैठक में चर्चा का मुख्य विषय यही था। हालांकि कई लोगों ने पर्ूव राजा को यह भी सुझाव दिया कि न तो वो खुद और न ही अपने बेटे को ही इसके लिए आगे बढांए। बल्कि अपने पोते और बहू को आगे लाने पर जनता के साथ साथ अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर भी सहानुभूति मिलेगी।
देश में गणतंत्र की स्थापना के बाद जब सरकार की तरफ से तत्कालीन राजा को नारायणहिटी राजदरबार छोडÞने का आदेश सुनाया गया तो उन्होंने बिना किसी विरोध के ही सहजता से उसे स्वीकार कर लिया था। उसके बाद भी यदाकदा मौके को छोडते हुए हमेशा शान्त रहने और कोई भी प्रतिक्रिया नहीं देने वाले ज्ञानेन्द्र अपने मौके की तलाश में रहे।  उस समय किए गए त्याग का फल लेने के लिए शायद वे उतावले हो रहे हैं। संविधान-सभा भंग होने के बाद जैसे उनकी मुराद अब जल्द ही पूरी होने वाली है। राजसत्ता से बाहर रहने के दौरान उन्होंने कई बार आम जनता के बीच जाकर उनकी नब्ज टटोलने की कोशिश भी की। और सत्ता में आसीन देश के नेताओं की जनता के प्रति उदासीनता ने उन्हें बल दिया। कुछ साल पहले जिस जनता ने राजा को सत्ता से उखाड फेंकने के लिए सडक पर उतरकर आन्दोलन किया था, वही जनता अब यह सोच रही थी कि एक राजा को हटाकर हमने बाहर कर दिया उसके बदले अब कई राजा बन गए जो कि उससे भी अधिक नालायक साबित हुए। जनता की इन्हीं भावनाओं की वजह से ज्ञानेन्द्र के दौरे के समय कई स्थानों पर भीड देखी गई। निश्चित ही इस भीड में उनके द्वारा भाडा पर लाए गए लोगों की भी कमी नहीं होगी लेकिन खुद अपने मन से पर्ूव राजा को देखने के लिए भी जनता की भीड जुटी। अब इसको अपने पक्ष में समझ कर यदि ज्ञानेन्द्र कोई कदम उठाना चाहते हैं तो यह उनके लिए बडी भूल साबित हो सकती है। लेकिन उनके सलाहकार भी इस तरह के सुझाव दे रहे हैं जैसे सत्ता में उनकी वापसी के लिए इससे अच्छा माहौल और हो ही नहीं सकता।
वैसे ज्ञानेन्द्र को फिर से वापसी करानेवाला एक बडÞा ही शक्तिशाली समूह देश में सक्रिय है। इसी समूह के प्रभाव में र्सवाेच्च अदालत ने संविधान-सभा की समयसीमा नहीं बढÞाने और संविधानसभा भंग करने का आदेश सुनाया था। इतना ही नहीं संविधान बनने नहीं देने और ०४७ साल के संविधान को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से कई काम किए गए। पर्ूव प्रधानसेनापति, पर्ूव न्यायाधीश, पर्ूव नौकरशा, सुरक्षा के पर्ूव अधिकारियों, वकीलों, बडे मीडीया घरानों, नामचीन पत्रकार सम्मिलित इस समूह के द्वारा किसी भी हालत में ०४७ साल के संविधान को पुनर्जीवित करने और राजशाही को किसी न किसी रूप में स्थापित करने की गहरी साजिश में सक्रिय हैं। पिछली दो बार से नेताओं द्वारा संविधान-सभा का कार्यकाल बढाने पर बकायदा विज्ञप्ति जारी कर ही इसका कडा विरोध किया गया था। और र्सवाेच्च अदालत का इस संबंध में आया फैसला उसी का प्रभाव था।
कुछ राजनीतिक दल भी राजा को फिर से लाने और ०४७ साल के संविधान को पुनर्जीवित करने के काम में सक्रिय भूमिका निर्वाह कर रहे हैं। कमल थापा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टर्ीीेपाल तो खुल कर ही इस अभियान में लगी है। थापा ने चुनौती देते हुए कहा था कि इस संविधान-सभा से किसी भी हालत में संविधान जारी नहीं हो सकता है। और हारकर दलों को ०४७ साल के संविधान को ही कुछ फेरबदल के साथ जारी करना होगा। इसके लिए जनमत संग्रह कराए जाने की भी मांग थापा के द्वारा की जा रही है। राजतंत्र, हिन्दूराष्ट्र जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जनमत संग्रह ही र्सवाेत्तम विकल्प होने की बात शुरू से ही थापा द्वारा उठायी जा रही है। कमल थापा के साथ ही पर्ूव राजावादी की पार्टर्ीीे रूप में परिचित पशुपति शमशेर के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टर्ीीौर र्सर्ूय बहादुर थापा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टर्ीीे बीच होने वाले एकीकरण का सीधा और साफ मतलब यही है कि इन तीनों पार्टियों के बीच कुछ मुद्दों को लेकर सहमति के बाद ही एकीकरण अन्तिम चरण में पहुंच पाया है। हालांकि राणा और र्सर्ूय बहादुर थापा ने पिछले दिनों राजा से अपनी दूरी बढा ली थी और गणतंत्र को ही अंगीकार करने का पूरा मन बना लिया था। लेकिन जिस तरीके से अन्य दलों के नेताओं में नए संविधान के प्रति उदासीनता देखी गई उससे साफ हो गया कि नयां संविधान नहीं बनने वाला है और संविधान-सभा भंग होने जा रहा है। इसके बाद ही कमल थापा, र्सर्ूय बहादुर थापा और पशुपति शमशेर और लोकेन्द्र बहादुर चन्द ने मिलकर अब नए संविधान के पीछे लगने के बजाए पुराने संविधान को ही पुनर्जीवित करने और राजशाही को उस रूप में न सही लेकिन किसी न किसी रूप में लाने की कोशिश में सक्रिय हो गए हैं।
कुछ अंतर्रर्ाा्रीय शक्तियां भी देश में संघीयता नहीं लाने और राजा को ही किसी न किसी रूप में लादने में सक्रिय हैं। इनमें खास कर यूरोपीय यूनियन की भूमिका काफी संदिग्ध बताई जाती है। नेपाल में संघीयता नहीं लाने और संविधान-सभा भंग होने की परिस्थिति पैदा करने के लिए यूरोपीय यूनियन के देश जिस तरीके से लगे हुए थे और जिस तरीके से उन्होंने देश में जातीय उन्माद पैदा कर दिया, उससे उन पर भी राजशाही को लौटाने के लिए सक्रिय भूमिका निर्वाह करने की बात कही जा सकती है।
संविधान-सभा भंग होने के बाद ०४७ साल के संविधान को पुनर्जीवित करने के लिए जल्द ही र्सवाेच्च अदालत में एक रिट दायर होने जा रही है। इसके लिए पूरी तैयारी की जा चुकी है। संविधान-सभा भंग होने के बाद सरकार द्वारा चुनाव की घोषणा तो कर दी गई लेकिन किस आधार पर चुनाव होंगे इस बात पर कई कानूनी पेंच लगे हैं। अन्तरिम संविधान में संविधान-सभा के दुबारा चुनाव के लिए कोई भी प्रावधान नहीं है। दुबारा चुनाव करने के लिए अन्तरिम संविधान में संशोधन करना आवश्यक है। और उसके लिए संसद का होना भी आवश्यक है। लेकिन संविधान-सभा के साथ संसद भी भंग हो गई है। हां सरकार चाहे तो अध्यादेश के मार्फ या फिर र्सवाेच्च अदालत द्वारा कोई दिशा निर्देश देने के बाद चुनाव संभव है लेकिन यह आसान नहीं है। चुनाव कराने में कई और दूसरी बाधा अडचन भी है। अन्तरिम संविधान अपने आप में एक अधूरा और कई स्थानों पर एक दूसरे को काटने वाली धाराओं से भरा परा है। ऐसे में उस संविधान से न तो चुनाव ही संभव है और न ही अधिक दिनों तक देश को ही चलाना संभव है। ऐसे में अदालत के पास इस बात को लेकर जोडÞ दिया जा सकता है कि ०४७ साल के संविधान में कुछ फेरबदल कर उसे ही जारी किया जाए। ०४७ साल के संविधान में राजतंत्र के बारे में जो भी बातें कही गई हैं, उसमें दलों के बीच सहमति कर उसे बदला जा सकता है।
अब देखना यह होगा कि कौन सा दल ०४७ साल के संविधान के पक्ष है या विपक्ष में। बडे दलों के नेताओं के बयान पर गौर करें तो सभी दलों के बडे नेता कभी न कभी ०४७ साल के संविधान को जीवित करने और राजशाही को भी किसी न किसी रूप में रखने के र्समर्थन में बयान दे चुके हैं। माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड, उपाध्यक्ष मोहन वैद्य किरण, नेत्र विक्रम चन्द सहित कई नेता हैं जो सांस्कृतिक राजा के रूप में राजतंत्र को रखे जाने का बयान दे चुके हैं। इसी तरह नेपाली कांग्रेस के तो अधिकांश पुराने नेता अभी भी खुले रूप से या दबी जुबान से ही सही ०४७ साल के संविधान को फिर से सक्रिय करने का बयान दे चुके हैं। पहले तात्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला ने तो ज्ञानेन्द्र को यह सुझाव ही दिया था कि वो संविधान जारी होने तक खामोश रहें तो राजशाही को सेरेमोनियल के रूप में रखने पर विचार किया जा सकता है। एमाले खुलकर तो नहीं परन्तु उस पार्टर्ीीे कई नेता भी राजशाही के पक्ष में दिखते हैं।
राजा के र्समर्थन को लेकर ही यह पार्टर्ीीई बार विवादों के घेरे में आने से लेकर विभाजित भी हो चुकी है। पर्ूव राजा ज्ञानेन्द्र ने भी कई बार कहा है कि राजनीतिक दलों ने उनके साथ वादा किया था कि उन्हें किसी न किसी रूप में स्थान दिया जाएगा। और उसी आधार पर उन्होंने संसद की र्सवाेच्चता को स्वीकार करते हुए उसके आदेश पर नारायणहिटी दरबार छोडÞ कर जंगल में रहे नागार्जुन दरबार में रहने चले गए थे। अब वे इन नेताओं से अपनी भूमिका के बारे में नजरें गडÞाए हुए हैं।

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