शहीदों की खेती ! : लिलानाथ गौतम
शहीद कौन है ? क्या राजनीतिक पार्टी और उनके नेताओं की स्वार्थ में सरकारी सुरक्षाकर्मियों के साथ लड़कर मरनेवाले ही शहीद हैं ? नहीं, यह तो हो ही नहीं सकता ।

शहीद किस को कहा जाता है ? हमारे यहाँ प्रश्न अनुत्तरित है । क्योंकि, यहाँ तो पुलिस की गोली से मरनेवाले और आन्दोलनकारी की आक्रमण में मरनेवाले हर कोई को ‘शहीद’ घोषणा किया जाता है । ऐसी ही अवस्था में गत माघ २२ गते नेपाल सरकार ने एक निर्णय किया । निर्णय के अनुसार सशस्त्र द्वन्द्व काल में विद्रोही पक्ष अर्थात् माओवादी की ओर से मारे जानेवाले सभी को अब ‘शहीद’ घोषणा किया जाएगा । शहीद के नाम में होनेवाले इस तरह का विवादास्पद निर्णय के कारण ही लोग भ्रमित हो रहे हैं कि वास्तव में ‘शहीद’ कौन हैं ? जनता समझने लगी हैं कि शहीद वही है, जो राजनीतिक दल के कार्यकर्ता हो कर आन्दोलन में मारे जाते हैं । और शहीद वही है, जो आन्दोलनकारी की ओर से मारे गए सरकारी कर्मचारी है !
माघ २२ गते सम्पन्न मन्त्रिपरिषद् बैठक ने निर्णय किया है कि, सशस्त्र द्वन्द्व काल में माओवादी की ओर से मारे जानेवाले नेपाली सेना, जनपद पुलिस, सशस्त्र पुलिस, अनुसन्धान विभाग के कर्मचारी, निजामती कर्मचारी, शिक्षक जैसे सभी राष्ट्रसेवक कर्मचारी को ‘शहीद’ घोषणा किया जाएगा । नीतिगत निर्णय यही है कि सभी मृतकों की रेकर्ड संकलन कर स्वतः शहीदों की सूची में सूचिकृत की जाएगी । सञ्चार मन्त्री तथा सरकार के प्रवक्ता मोहनबहादुर बस्नेत ने कहा है– ‘विगत में माओवादी सरकार ने राज्यपक्ष की ओर से मारे जानेवाले सभी को शहीद घोषणा किया । इसीलिए वर्तमान सरकार ने भी माओवादी की ओर से मारे जानेवाले सभी राष्ट्रसेवककर्मचारी को शहीद घोषणा करने का निर्णय किया है, जिसके चलते मृतक परिवार को न्याय मिल सके ।’
स्मरणीय है, इससे पहले पुष्पकमल दाहाल नेतृत्व में बनी माओवादी नेतृत्व की सरकार ने भी सशस्त्र द्वन्द्व के क्रम में राज्य पक्ष की ओर से मारे जानेवाले प्रायः सभी माओवादी कार्यकर्ता को ‘शहीद’ घोषणा किया था । उसके बाद राज्य कोष से शहीद परिवार के नाम में करोड़ो रूपयां वितरण किया गया । उसी की नकल करते हुए बाद में मधेशवादी राजनीतिक दलों ने भी आन्दोलन के क्रम में मरनेवाले राजनीतिक कार्यकता को शहीद घोषणा के लिए दबाव दिया और शहीद घोषणा किया गया । यहां प्रश्न उठ रहा है– शहीद कौन है ? क्या राजनीतिक पार्टी और उनके नेताओं की स्वार्थ में सरकारी सुरक्षाकर्मियों के साथ लड़कर मरनेवाले ही शहीद हैं ? नहीं, यह तो हो ही नहीं सकता ।
वास्तव में शहीद वह हैं, जो राजनीतिक पाटियों के कार्यकर्ता से ऊपर है । अर्थात् देश की सीमा रक्षार्थ लड़कर मरनेवाले अथवा न्याय, समानता और विभेदकारी राज्य व्यवस्था विरोधी आन्दोलन में अपनी जान गंवानेवालों को शहीद कहा जाता है । सरकार द्वारा घोषित शहीद ऐसे नहीं हैं, वह तो अधिकांश राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और अपनी पार्टी के लिए उन्होंने जान दी है । अथवा सरकार द्वारा घोषित शहीदों में अधिकांश ऐसे हैं, जो सरकारी कर्मचारी हैं और वह आन्दोलनकारी अथवा किसी भी राजनीति पार्टी के कार्यकर्ता से मारे गए हैं । राजनीति पार्टी की कार्यकर्ता की ओर से मरनेवाले अथवा सरकारी सुरक्षाकर्मी की ओर से मरनेवाले हर व्यक्ति शहीद नहीं हो सकते । लेकिन हम लोग तो वैसे ही व्यक्ति को शहीद कहने के लिए बाध्य हैं । वह तो राजनीतिक दल और उनके नेताओं की ‘खेती’ के लिए लड़नेवाले लडाकू हैं । क्योंकि पार्टी और नेता निर्माण के खातिर वे लोग शहीद हुए हैं, देश निर्माण के खातिर नहीं । देश–जनता के लिए मरनेवाले और पार्टी–नेता के लिए मरनेवाले अलग–अलग हैं, दोनों को समान दर्जा नहीं मिल सकता ।
जब सरकार द्वारा कोई भी मृतकों को शहीद घोषणा की जाती है, उनके परिवारजन को राज्य की ओर से १० लाख रूपयां दिया जाता है । जिस पार्टी और नेताओं की पहल में १० लाख रूपयां मिल जाता है, संबंधित परिवार के सदस्यगण चुनाव में उसी पार्टी और नेता को वोट देते हैं, यह आम विश्वास है । इसीलिए अभी जो शहीद घोषित हो रहा है, इसके पीछे ‘वोट’ की राजनीति अर्थात् ‘खेती’ है । स्मरणीय है, मधेशवादी कुछ नेताओं ने पिछले मधेश आन्दोलन के लिए ५० लाख का ऑफर देकर नागरिकों को ‘शहीद’ बनने के लिए आह्वान किया था । उस वक्त एक कथन पर जनमानस में खूब चर्चा हुई थी– ‘ जिस परिवार के सदस्य हर दिन मर मिट कर काम करने के बावजूद भी (पूरेजीवन में) ५० लाख कमाने के लिए असमर्थ हैं, उस परिवार के कोई एक सदस्य को आन्दोलन में कुर्बान होना ठीक रहेगा, क्योंकि ५० लाख प्राप्त होने के बाद परिवारके अन्य सदस्य सहज जीवन जी सकते हैं ।’ शहीदों के नाम में नेताओं की ओर से होनेवाला इससे बड़ा मजाक और ‘खेती’ और क्या हो सकती है ?’
एक बाद समझ में आना चाहिए– हर राजनीतिक पार्टी के आन्दोलन में सहभागी होकर मर जना ‘शहीद’ होना नहीं है । प्रथमतः कोई भी आन्दोलन में किसी का भी जान जाना ठीक नहीं है । अगर कोई मारे जाते हैं तो वह दुःखद है । ऐसी अवस्था में आर्थिक रूप में विपन्न परिवार में रहनेवाले अन्य सदस्यों की जीवन और भी कष्टपूर्ण होती है । उन लोगों को राज्य की ओर से सहयोग मिलना ही चाहिए । लेकिन सहयोग करने का मतलब ‘शहीद’ घोषणा करना नहीं है । शहीद घोषणा किए बिना ही सहयोग किया जा सकता है । आश्चर्य तो यह है कि पिछली बार सरकार ने जो शहीद घोषणा किया, उसकी संख्या तक सरकार को ही पता नहीं है और शहीदों का नाम भी पता नहीं । सरकार ने कहा है– ‘ शहीद की सूची संकलन किया जाएगा ।’ अर्थात् माओवादी द्वन्द्वकाल में कौन–कौन मारे गए हैं, उन लोगों की खोजी की जाएगी । वा ! ऐसे लोग भी यहां शहीद होते हैं ! इससे ज्यादा आचार्य और मूर्खतापूर्ण काम और क्या हो सकती है ?
आम जनता जानती है कि हत्या, अपहरण, लूट जैसे अपराध में संलग्न व्यक्ति भी शहीदों के लिष्ट में समावेश हैं । शहीद घोषणा के लिए उन लोगों की एक ही योग्यता है– वह किसी न किसी पार्टी के सदस्य हैं और नेताओं के स्वार्थ में आन्दोलन में सहभागी हो कर मारे गए हैं । हां, मारे जानेवालों में से कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने राजनीतिक पार्टियों की सदस्यता नहीं ली है । लेकिन हमारे नेता उन लोगों को पार्टी सदस्यता दिलाकर शहीद घोषणा के लिए लालायित होते हैं । यही तों हैं ‘शहीदों’ की खेती । आखिर कब तक चलती रहेगी यह खेती ?
विगत में माओवादी नेतृत्ववाली सरकार ने राज्य पक्ष की ओर से मारे जानेवालों को शहीद घोषणा करके गलती किया । उसी तरह मधेश आन्दोलन में मरनेवाले सभी को शहीद घोषणा कर दूसरी गलती की । आज आकर विद्रोही अथवा अन्दोलनकारी की ओर से मारे जानेवाले सभी को शहीद घोषणा कर दिया गया, इससे ज्यादा भद्दा मजाक और क्या हो सकता है ?
सामान्यतः आन्दोलन में दो पक्ष होते हैं । उसमें से एक पक्ष न्याय, समानता और विभेद के विरुद्ध लड़नेवाले माने जाते हैं और दूसरा पक्ष उसके विरोधी । जो न्याय के पक्ष में लड़ते वक्त मारे जाते हैं, उसी को शहीद घोषित किया जाता है । लेकिन हमारे यहां दोनों पक्ष को शहीद घोषणा किया जाता है । अर्थात् आंदोलन में मारे जाने के बाद शत्रु पक्ष भी शहीद होते हैं । क्यों ? क्योंकि हमारे यहां वास्तविक ‘शहीद’ को नहीं, राजनीतिक कार्यकर्ता को शहीद घोषणा किया जाता है । जय हो– ‘शहीदों की खेती !’


