Mon. Apr 6th, 2020

सती प्रथा सच या एक अंधविश्वास : मनीषा गुप्ता

नमस्कार मैं मनीषा गुप्ता आज आप लोगो के समक्ष एक ऐसी कुरीति को लेकर आई हूँ जी वास्तव में मानवता को धता बता एक जीते जागते इंसान को सिर्फ आपने अंधविश्वास के कारण अग्नि को समर्पित कर देती है …बुद्धिजीवी बर्ग से यही जान्ने की लालसा लिए की क्या यह प्रथा जो हिन्दू समाज में व्याप्त थी सही थी ?

सती

(संस्कृत शब्द ‘सत्’ का स्त्रीलिंग) कुछ पुरातन भारतीय हिन्दु समुदायों में प्रचलित एक ऐसी धार्मिक प्रथा थी, जिसमें किसी पुरुष की मृत्योपरांत उसकी पत्नी उसके अंतिम संस्कार के दौरान उसकी चिता में स्वयमेव प्रविष्ठ होकर आत्मत्याग कर लेती थी। 1829 में अंग्रेजों द्वारा भारत में इसे गैरकानूनी घोषित किए जाने के बाद से यह प्रथा प्राय: समाप्त हो गयी।

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प्राचीन सन्दर्भ

इस प्रथा को इसका यह नाम देवी सती के नाम से मिला है जिन्हें दक्षायनी के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दु धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवी सती ने अपने पिता दक्ष द्वारा अपने पति महादेव शिव के तिरस्कार से व्यथित हो यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। सती शब्द को अक्सर अकेले या फिर सावित्री शब्द के साथ जोड़कर किसी “पवित्र महिला” की व्याख्या करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

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सती प्रथा के कारण

प्राचीन काल में सती प्रथा का एक यह भी कारण रहा था। आक्रमणकारियों द्वारा जब पुरुषों की हत्या कर दी जाती थी, उसके बाद उनकी पत्नियॉं अपनी अस्मिता व आत्मसम्मान को महत्वपूर्ण समझकर स्वयमेव अपने पति की चिता के साथ आत्मत्याग करने पर विवश हो जाती थी।

कालांतर में महिलाओं की इस स्वैच्छिक विवशता का अपभ्रंश होते-होते एक सामाजिक रीति जैसी बन गयी, जिसे सती प्रथा के नाम से जाना जाने लगा।

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सती प्रथा का अन्त

ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहनय ने सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागरूक किया। जिसके फलस्वरूप इस आन्दोलन को बल मिला और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार को सती प्रथा को रोकने के लिये कानून बनाने पर विवश होना पड़ा था। अन्तत: उन्होंने सन् 1829 में सती प्रथा रोकने का कानून पारित किया। इस प्रकार भारत से सती प्रथा का अन्त हो गया।

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