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‘मैं शिवलिंग हूं। न मेरा कोई आदि और न कोई अंत।’ 

 

 

देव आदिदेव महादेव का नाम आते ही मन में शिवलिंग की छवि जरूर उभरकर आती है। भक्‍तजन शिवलिंग पर जलाभिषेक करके भगवान शिव की आराधना करते हैं। कभी सोचा है कि आखिर शिवलिंग की उत्‍पत्ति कैसे हुई?

 देवी द्वारा सृष्टि की रचना के बाद भगवान विष्‍णु पैदा हुए और फिर विष्‍णु की नाभि से ब्रह्माजी की उत्‍पत्ति हुई। दोनों के अंदर श्रेष्‍ठता साबित करने को लेकर होड़ मची हुई थी। दोनों खुद को एक-दूसरे से ज्‍यादा शक्तिशाली मानते थे। तभी अचाकन आकाश में एक चमकता हुआ विशालकाय पत्‍थर प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई कि जो इस पत्‍थर का अंत ढूढ़ निकालेगा उसे सर्वाध‍िक शक्तिशाली माना जाएगा। व‍ह चमकदार पत्‍थर कोई और नहीं शिवलिंग ही था।

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उसके बाद शुरू हुई ब्रह्मा और विष्‍णु के बीच में अंत ढूढ़ने की दौड़। भगवान विष्‍णु पत्‍थर का अंत खोजने नीचे की ओर गए तो ब्रह्मा ऊपर की ओर चल दिए पत्‍थर का अंत खोजने। हजारों वर्षों तक दोनों पत्‍थर का अंत खोजते रहे, लेकिन दोनों में से किसी को भी अंत नहीं मिल सका। अंत में हारकर भगवान विष्‍णु बोले कि हे प्रभु मुझे इस पत्‍थर का अंत नहीं मिल पाया है। अत: आप ही सबसे शक्तिशाली हैं।

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पत्‍थर का अंत तो ब्रह्माजी को भी नहीं मिला था, मगर उन्‍होंने फिर भी झूठ बोला कि उनको अंत मिल गया है। तभी आकाशवाणी हुई, ‘मैं शिवलिंग हूं। न मेरा कोई आदि और न कोई अंत।’

तभी उस शिवलिंग से भगवान शिव प्रकट हुए। उन्‍होंने सच बोलने के लिए भगवान विष्‍णु को वरदान दिया और ब्रह्माजी को शाप दिया कि भविष्‍य में कोई भी उनकी पूजा नहीं करेगी। तभी से सारे जगत में शिवलिंग की पूजा हो रही है। ब्रह्मांड में संतुलन बैठाने के लिए शिवलिंग का जन्‍म हुआ था।

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