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अविश्वास गिरने के बाद क्या है मोदी सरकार की स्थिति ?

 

नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी नौ महीने में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया. जिन 451 लोकसभा सांसदों ने वोटिंग में भाग लिया, उनमें मोदी सरकार के पक्ष में 325 व सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए के पक्ष में 126 वोट पड़े. भारतीय जनता पार्टी पहले से विपक्ष के द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव को शक्ति प्रदर्शन के लिए एक सुनहरे मौके के रूप में ले रही थी और वह इसमें सफल हुई. उधर, विपक्ष पहले से संकेतों में यह कह रहा था कि हां, हमारे पास संख्या बल नहीं है, लेकिन हम सरकार को विभिन्न मुद्दों पर एक्सपोज करना चाहते हैं. इसमें सोनिया गांधी का वह बयान अपवाद है, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसने कहा कि हमारे पास संख्या बल नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार को भले उसके सबसे पुराने साथी शिवसेना का साथ नहीं मिला, लेकिन दिवंगत जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक उसके साथ आ खड़ी हुई. वहीं, बीजू जनता दल ने सदन से बर्हिगमन कर एक तरह से उसकी राह ही आसान कर दी. उसी तरह के चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति ने वोटिंग से अनुपस्थित रह कर एक तरह से सरकार का अप्रत्यक्ष सहयोग किया. भाजपा के दूसरे सबसे पुराने सहयोगी नीतीश कुमार के जदयू ने सरकार के समर्थन में अपना मजबूत समर्थन जताया, भले ही उनके पास अभी संख्या बल कम हो.

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लोकसभा में चर्चा में शामिल सोनिया गांधी.

देश में संभवत: पहली बार एक राज्य के मुद्दे पर अविश्वास प्रस्ताव लाया गया. टीडीपी ने आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिये जाने के खिलाफ मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया, जिसे कांग्रेस सहित अन्य दूसरे दलों का समर्थन मिला. लोकसभा चुनाव से मात्र नौ महीने लाये गये इस अविश्वास प्रस्ताव ने एक तरह से कुछ महीनों में 2019 के लिए सजने जा रही राजनीति की बिसात की झलक दे दी.

दक्षिण के एक बड़े दल टीडीपी ने भले एनडीए से दूरी बना ली हो, लेकिन यह बहुत स्पष्ट है कि दक्षिण का एक दूसरा प्रमुख दल अन्नाद्रमुक मौके पर बीजेपी के साथ खड़ी हो सकती है. अन्नाद्रमुक का पहले से भाजपा व नरेंद्र मोदी की ओर झुकाव रहा है. अब इस पार्टी के पास जयललिता जैसा करिश्माई नेतृत्व नहीं है और यह अपने आंतरिक द्वंद्व में उलझी है, ऐसे में केंद्र के मजबूत खेमे से जुड़े रहने की उसकी मजबूरी भी बढ़ जाती है. तमिलनाडु में लोकसभा की 39 सीटें हैं.

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वोटिंग के बाद संसद से घर लौटते राहुल गांधी.

एक बड़े सहयोगी नेता की चंद्रबाबू नायडू की छवि की कमी को नीतीश कुमार पूरा करने में सक्षम हैं और अमित शाह अपने प्रेस कान्फ्रेंस में यह बात दोहराते रहे हैं कि वो गये तो ये आये. बिहार में बीजेपी-जदयू के गठजोड़ ने हमेशा करिश्माई चुनाव परिणाम दिये और ऐसे में 2019 में भी इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं.

तेलंगाना में सक्रिय टीआरएस भाजपा से चुनावी गठजोड़ कर सकती है. तेलंगाना में कुल 17 लोकसभा सीट हैं. हालांकि टीआरएस अभी तीसरे मोर्चे के लिए जोर लगाये हुए है. ओडिशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं. हालांकि भाजपा इस राज्य में जिस तरह बीजद का विकल्प बनने की कवायद में जुड़ी है, उससे गठजोड़ की उम्मीद करना बेमानी है.

भाजपा ने पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पूर्वोत्तर राज्यों को वैसी सूची में डाल रखा है, जहां वह अपने पूर्ण प्रभुत्व वाले राज्यों मसलन, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात की कमियों की भरपाई करेगी. कुल मिलाकर गंठबंधन की संभावना वाले राज्यों व गैर हिंदी भाषी राज्यों में उसकी रणनीति अधिक धारदार हो सकती है. दक्षिण में भी वह नये गठजोड़ से सीटों की संख्या बढ़ाने की जुगत में है.

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विपक्ष को भाजपा की आक्रमकता का जवाब देने के लिए साझा उम्मीदवार की नीति अपनानी होगी. इस फार्मूले से उसने यूपी उपचुनाव में शानदार जीत हासिल की. ममता बनर्जी ने हाल में एक प्रमुख पत्रिका को दिये इंटरव्यू में भी इस बात के संकेत दिए. इससे कम में विपक्ष की बात बनना मुश्किल है. विपक्ष के पास सर्वस्वीकार्य नेता की कमी है, जिसे कल राजनाथ सिंह ने भी लोकसभा में रेखांकित किया. फिर भी विपक्ष को वास्तविक अर्थ में महागंठबंधन बनाना होगा. तभी मुकाबला आमने-सामने का हो सकता है, नहीं तो नरेंद्र मोदी का आक्रामक चुनावी महासमर एक तरफा हो सकता है.यह प्रभात का विश्लेषण है |

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