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चुरे क्षेत्र को मानव रहित बनाना चाहिए : डाँ. राजेश अहिराज

डाँ. राजेश अहिराज, विश्लेषक एवं सम्पादक, मधेशवाणी
 

हिमालिनी, अंक जुलाई 2018 । नेपाल अभी संघीय, स्थानीय और प्रान्तीय तह करके संघीय संरचना में जा चुका है । इन तीनों के बीच चौथी शक्ति नागरिक समाज हैं । बाढ़ जैसी प्राकृतिक प्रलय से बचने के लिए जो मरुभूमिकरण होता जा रहा हैं उस भूमि को बचाना चाहिए । चुरे क्षेत्र को मानव रहित बनाना चाहिए । और बहुत बड़ी तादाद मे वृक्षारोपण करनी चाहिए जिस से वातावरण मे संतुलन हो सके ।

डाँ. राजेश अहिराज, विश्लेषक एवं सम्पादक, मधेशवाणी
डाँ. राजेश अहिराज, विश्लेषक एवं सम्पादक, मधेशवाणी

इस के पहले लोगों की चेतना में विकास होनी चाहिए । जो सरकार को दबाव दे सके और अपनी भूमि को और ज्यादा संरक्षित कर सके । जिन नदियों मे बाढ आती हैं । उन नदियों को गहरा करना, बैज्ञानिक तरीके से व्यवस्थित करना और वृक्षारोपण करना एकदम जरुरी है । बाढ़ आने से पहले ही अपनी संपत्ति और जनधन को सुरक्षित स्थानों पर स्थानतरण करना, नए तकनीकी से नदी को नियन्त्रण करना चाहिए । क्याेंंकि सरकार पूर्व तैयारी कभी भी नही करती वो सिर्फ राहत और अनुदान से ही हर साल समस्या को टालती जा रही हैं । सरकार को चाहिए कि नेपाल में जिन नदियों मे बाढ आती हैं उसे व्यवस्थित करें, यथासंभव पानी के निकास का संतुलित रास्ता बना दें, बाढ़ के समय में स्वयमसेवक और सुरक्षाकर्मियों को तैनात रखें, सारें संचार माध्यमों और सूचना को अन्य तरीकों का व्यवस्थित रूप से प्रयोग करके जनधन को क्षति होने से बचाए । आकर्षक योजना लाकर संभावित बाढग्रस्त क्षेत्रों से दूर मानव बस्ती को बसाए ।
सरकार की योजना खास कर कागज में ही सीमित रहती है । सरकार अनुदान के सहारे लोगों को परनिर्भर बनाने का काम कर रही है । इसलिए सरकार को तीन काम एक साथ करनी चाहिए । नदियों का व्यवस्थापन, तीव्र गति में वृक्षारोपण, और मानवरहित चुरे क्षेत्र का निर्माण । ये तीन काम करने से सिर्फ बाढ़ ही नहीं आगलगी, भू–क्षयीकरण, शीतलहर, और चरम गर्मी के प्रभाव से नागरिकों को बचाया जा सकता हैं । और प्राकृतिक विपदा से पहले नागरिकों को अपने दायित्व के पक्ष में तैयार करें, कि वो खुद भी बचे और समाज को भी बचाए । कभी कभी ये देखा गया हैं कि गाँव के सम्पन्न और सचेत लोग अपने मालजाल, और सम्पति को बचा लेते हैं, परंतु गाँव मे विपन्न लोग आर्थिक मानवीय और चेतना के अभाव में पीडि़त हो जाते हैं । इसलिए सरकार नागरिक समाज, और बुद्धिजीवियों को मिलकर प्राकृतिक विपदा जैसी समस्याओं का दीर्घकालीन ठोस समाधान ढूँढना चाहिए ।

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