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भारत में एनआरसी पर बहस, नेपाल डम्पिङ साइट न बन जाये ! : बाबुराम पौड्याल

बाबुराम पौड्याल ,हिमालिनी, अंक सितंबर,२०१८ | भारत में इन दिनों जनसांखिकी और उसके स्वरूप पर अलग सिरे से जमकर बहस चल रही है । आजादी के बाद धर्म निरपेक्षता का पथिक भारत इस बार भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद हिन्दु प्रधानता की ओर संक्रमित होता प्रतीत होता है । उत्तरपूर्वी राज्य असम में भारतीय नागरिकों की सूची ल्बतष्यलब िचभनष्कतभच या ऋष्तष्शभल तैयार की जा रही है । दूसरी सूची को इसी जुलाई में प्रकाशित किया गया है । इसे भी भारतीय जनसंखिकी पर असर डालने वाले एक और जबरदस्त मसले के रूप में देखा जा रहा है । एनआरसी की पहली सूची बीते साल ३१ दिसम्बर में प्रकाशित की गयी थी । इस साल के अन्त में आखिरी सूची को तैयार किया जाना है । दूसरी सूची प्रकाशित होने तक चालीस लाख से अधिक लोगों के नाम इस सूची से बाहर हो गये हैं । मतलब, ये लोग अगर आखिरी सूची के लिए भी स्वयं को भारतीय सिद्ध नहीं कर पाते हैं तो इन्हे घुसपैठिए अर्थात् गैरकानूनी विदेशी माना जायेगा । इस तरह का प्रयोग करनेवाला भारत में असम पहला राज्य है ।
वैसे इस काम को अंजाम तक पहुंचाना असंभव तो नही पर आसान भी नहीं है । अब तक की सूचियों में कई खामियां भी पायी गई है । भारत के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद, असम विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति और कई स्थानीय लोगों के नाम भी सूची से बाहर हो जाना खामियों की ओर भी संकेत करता है ।
यह अभी यकीनी तौर पर कहना जल्दबाजी होगा कि चालीस लाख लोग ही असम में गैरकानूनी विदेशी हैं, फिर भी यह तय है, असम में ऐसे विदेशियाें की संख्या उल्लेखनीय है । असम में अस्सी के दशक से ही ऐसे लोगों के निष्काशन के लिए नागरिक स्तर में कई आन्दोलन किये जा चुके हैं । सन् १९८५ में केन्द्र सरकार और आन्दोलनकारी अखिल असम छात्र संघ के प्रतिनिधियों के बीच इस मसले पर दिल्ली में एक सम्झौता भी हो गया था ।
इस चालीस लाख की सूची से बाहर के लोगों में अधिकांश बांगलादेश से सन् १९७१के बाद आये या उससे पहले आकर भी स्वयं को कागजी तौर पर प्रमाणित करने में असफल लोग शामिल हैं । बांगलादेश ने इन लोगों को अपना मानने से इन्कार किया है ।
सन् १९४७ में अंग्रेजी साम्राज्य से आजादी मिलने तक वर्तमान पाकिस्तान और बांगलादेश भी भारत के ही हिस्से थे । तब तक आपसी आवाजाही गुजर बसर करने में इस तरह की कोई समस्या नहीं थी । फिर भी हिन्दुओं की आबादी वाले असम में पूर्वी बंगाल से आने वाले मुसलमान जिनको मैमनसिंगिया कहा जाता था— के प्रति असंतोष देखने को मिलता था । यह असंतोष दो धर्म के बीच की भिन्नताओं के कारण ही था । मैमनसिंगियों पर असम में पशुपालन के लिए आरक्षित भूमि पर अतिक्रमण करने का आरोप उस समय भी लगाया जाता था । भारत—पाक विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आनेवाले स्वभाविक रूप से विदेशी थे । बात यहीं तक खत्म नहीं हो जाती, पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुररहमान के नेतृत्व में पाकिस्तान से अलग होने के लिए अलगाववादी आन्दोलन शुरु हो गया । भारत ने इस आन्दोलन को हर तरह से साथ दिया । उस दौरान बड़ी संख्या में पूर्वी पाकिस्तान से लोग शरणार्थी के रूप में भारत के सीमावर्ती असम और अन्य सीमावर्ती राज्यों में आये या उन्हे आने के लिए प्रोत्साहित किया गया । भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ और पाकिस्तान के हार जाने के बाद सन् १९७१ म्ों पूर्वी पाकिस्तान आजाद बंगलादेश बना । तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गान्धी ने भी उस समय पूर्वी पाकिस्तान से युद्ध के कारण भारत में आए शरणाथिर्यों को वापस बांगलादेश जाने को कहती रही परन्तु उस पर जमीनी तौर पर काम नहीं हो सका । कितने शरणार्थी बांगलादेश लौट गये और कितने यहीं रह गये इसका आंकड़ा नहीं है । इसी आधार पर अब बांगलादेशियों के लिए सन् १९७१ को कुछ शर्त के साथ आधार वर्ष माना गया है ।
भारत का विभाजन हिन्दु और मुस्लिम दो धर्म के आधार पर किया गया था । हिन्दुओं के लिए हिन्दुस्तान बना और मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाया गया । मुस्लिम आबादीवाले पूर्वी बंगाल को भी पाकिस्तान माना गया । मतलब, एक देश का दो भूगोल में होने के कारण पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के नाम से जाना गया ।
असम में बड़ी संख्या में स्वयं को भारतीय गोरखा कहने वाले नेपाली भाषी लोग भी सूची से बाहर हो गए हैं । न्यायलय और असम सरकार ने नेपाली भाषियों को लेकर कहा है कि वे घुसपैठिये नहीं हैं । इनके प्रतिनिधि दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से अपनी फरियाद कर चुके हैं । उनके अनुसार गोरखों की इस समस्या के प्रति वे सकारात्मक हैं । इसका मतलब यह भी हो सकता है सूची से बाहर के सभी नेपाली भाषी लोग को सन् १९५० की भारत नेपाल संधि के तहत नेपाल का नागरिक मान लिया जाये और उन्हे अन्त में नेपाल का रास्ता दिखा दिया जाये ।
भले घुसपैठियों की असली पहचान के लिए एक और अन्तिम दौर का पूरा होना बांकी है, सियासी हलकों में सरगर्मियां तेज हो गई है । हर किसी राजनीतिक दल अगले साल भारत में होनेवाले चुनावों के लिए दमदार मसले के रूप में इसे इस्तेमाल करने पर आमादा है । भारतीय जनता पार्टी राज्यों में अपनी सरकार आने पर असम की ही तरह एनआरसी को शुरु करने की बात कर रही है । बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अधिकांश विपक्षी दलो ने एनआरसी के खिलाफ मोरचा खोल लिया है । ममता ने तो कड़े शब्दों में देश में जाति और धर्म को लेकर गृहयुद्ध की चेतावनी दे डाली है ।
राजनीतिक खींचातानी में अभी अन्तिम और जटिल परिस्थिति की ओर कोई खास गम्भीरता दिखाई नहीं दे रही है । जिनको विदेशी मान लिया जायेगा उनका व्यवस्थापन किस तरह होगा, तस्वीर साफ नहीं है । असम के कुछ नेता तात्कालिक रूप से इन राज्यविहीन लोगों को विभिन्न राज्यों में बांट देने का सुझाव देने लगे हैं । बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को शरणार्थी के तौर पर कब तक और कैसे रखा जायेगा — बात आसान नहीं है । कुछ लोग इस मसले को सिर्फ चुनावी स्टंट मानते है जिसका चुनाव के बाद दम टूटना तय है । अगर यही सच है तो भी सामाजिक तौर पर इसका बहुत बड़ा नकारात्मक असर पड़ना निश्चित है ।
इस मसले पर पूर्वोत्तर भारत में विद्यार्थी संगठनाें की सक्रियता बहुत ही दवाबकारी रही है । इस समय भी इनकी सक्रियता में ज्यादा ही वृद्धि देखी जा रही है । सौरभ गोगोई ने २३ अगस्त के एशिया टाईम्स् में लिखा है— निचले तबके के आमलोग जातिगत और सामाजिक सम्बन्ध को लेकर चलनेवाली राजनीति के भूलभुलैया के चपेट में अक्सर आ जाते हैं जिसके चलते परिणाम अमानवीय स्तर तक पहुंच जाता है । इस समय यही कुछ हो रहा है । अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय राज्यों में वहां की विद्यार्थी संगठनों ने रास्तों पर अराजक तरीके से विदेशियों को रोकने के नाम पर यात्रियों की तलाशी के नाम पर परेशान करना शुरु कर दिया है । वैसे सरकार भी अपने स्तर से यह काम कर रही है ।
इस हलचल में भारत के पड़ोसी देशों में से नेपाल पर प्रभाव पड़ने का ज्यादा खतरा है । भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा के कारण इन शरणर्थियों का नेपाल की ओर चले आने की संभावना है । भुटानी शरणर्थियों को लेकर नेपाल ने विगत मे जो कुछ झेला है उसे इसबार स्मरण में रखना उसके लिए आवश्यक है । भारत ने भुटानियों को अपनी भूमि से उठाकर नेपाल की सीमा में ला पटका परन्तु उन्हे वापस जाने नहीं दिया । इसबार भी नेपाल डम्पिङ साइट न बन जाये ।

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