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राजनेता के लिए लालाइत नेपाल : चन्दन दूबे

 

चन्दन दूबे,हिमालिनी, अंक सितंबर,२०१८ | बीमार, लाचार, असमर्थ और असहाय नेपाल की दुर्दशा दिन–ब–दिन बद से बदतर होती जा रही है । विकास पूर्वाधार की स्थिति चौपट है, शिक्षा निचले स्तर के तरफ प्रतिगमन कर रही है, रोजगार के लिए विदेश बहिर्गमन का विकल्प नहीं दिखता, उधोग धंधे की हालत खस्ताहाल है, महंगाई की रफ्तार बुलेट ट्रेन के जैसी लगती है । देश मे आवाम के लिए सस्ते और सुलभ दर पर इलाज की बेहतर सुविधाओं की केवल परिकल्पना ही की जा सकती है । ऊपर से स्थानीय सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक के द्वारा धमाधम लगाए और बढ़ाए जा रहे करों के चलते सर्वसाधारण का जीना मुहाल होता जा रहा है ।
पेट्रोलियम की कÞीमत बारह महीने में बारह बार बढ़ गई है और एक सौ तीन रुपये लीटर से बढ़ कर एक सौ ग्यारह रुपये तक पहुंच गई है । पढ़ाई से लेकर दवाई तक, खाद्यान्न से लेकर परिवहन तक, दिनचर्या की वस्तुओं से लेकर विलासिता तक कुछ भी सुलभ और सुपथ मूल्य में मिलना कठिन हो गया है । महंगाई का आलम ये है । रोजाना सड़क हादसों में लोगों की मौतें होती रहती हैं । सड़कें ऐसी हैं कि अखवार पढ़ते वक्त सड़क हादसों में मौत की खबरों की तरफ कोई तवजÞ्जÞो भी नहीं देता । हां केरूंग से काठमांडों तक रेल चलने वाली खबरों को लोग चुटकुले के रूप में जरूर पढ़ लेते हैं ।
उधोग व्यवसाय के हालत का नमूना बरसों से बंद पड़े नेपाल सरकार द्वारा संचालित जनकपुर चुरोट कारखाना का भ्रमण कर के देख सकते हैं हालांकि अभी इस कैंपस को प्रदेश न.दो के मंत्रालय के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है ।
बजाय जनता के जख्म पर मलहम लगाने के और इस समस्या का स्थाई समाधान ढूंढने के हमारे देश के हुक्मरान चुटकुले सुनाते हुए नजÞर आते हैं ।
नेपाल लगातार अदूरदर्शी, अपरिपक्व, अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक नेतृत्व का शिकार होता जा रहा है ।
इस देश को एक राजनेता की परम आवश्यकता है जो कि फिलहाल पूरी होती नहीं दिख रही । जो अपने आपको राजनेता कहलाना पसंद करते हैं उनकी भूमिकाओं का विश्लेषण करें तो वो क्षेत्रीय नेता से ऊपरी स्तर के नहीं दिखते । किसी को डडेलधुरा की चिंता है तो कोई झापा के लिए परेशान है, कोई गोरखा में फंसा हुआ है तो कोई काठमांडों उपत्यका में तो किसी को सिर्फ मधेश के नाम पर राजनीति को जीवित रखना है । अपरिपक्वता ऐसी कि जिस संविधान को सर्वोत्कृष्ट करार देते हैं तुरन्त उसी में संसोधन करने का कार्य करके उसे त्रुटिपूर्ण प्रमाणित भी करते हैं । फिर भी सर्वोत्कृष्ट संविधान का नारा लगाते तनिक लजाते भी नही हैं यहाँ के हुक्मरान । किसी के पास राष्ट्र निर्माण का कोई दृष्टिकोण हो ऐसा दिखाई बिल्कुल नहीं पड़ता ।
एक ऐसा हृदय जिसमे हिमाल, पहाड़ और तराई या यूँ कहें कि सम्पूर्ण और सारभौम नेपाल समाता हो वो आधुनिक नेपाल के किसी भी नेता के पास नहीं है तो फिर उन्हें राजनेता कहलाने का हकÞ भी नही है । स्व. गिरिजा प्रसाद कोइराला जिनको कभी एशिया का बड़ा नेता भी कहा गया उनके रूप में नेपाल ने आखरी राजनेता खो दिया । बी पी, गणेशमान, गिरिजा जैसे कुशल राष्ट्रीय नेतृत्व के कारण ही तराई में कांग्रेस ने बहुत अच्छी पकड़ बनाई । हालांकि यथास्थितिवादी नेपाली कांग्रेस ने भी तराई और मधेस को सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल ही किया है । गिरिजाप्रसाद कोइराला की मृत्यु के बाद ही नेपाल की राजनीति में अराजकता की दौड़ शुरू हुई ।
जंगल से शान्ति वार्ता के जरिये सदन में आए माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल में भी नेपाली जनता ने राजनेता की छवि देखी थी लेकिन उनकी सत्ता लोलुपता और अस्थिर चरित्र ने जल्द ही नेपाली जनता का भ्रम तोड़ दिया । आज उन्हें नेपाली राजनीति में सबसे चलायमान नेता के रूप में जाना जाता है ।
दूसरा एक और नाम माओवादी खेमे से ही आया डॉ. बाबूराम भट्टराई जिनको माओवादी का चाणक्य तक कहा गया लेकिन प्रधानमंत्री होने के बावजूद भी खुद को एक राजनेता के रूप में स्थापित करने में वो भी नाकाम रहे ।
देश के बड़े नेता या पार्टियों के मुखिया लोग सिर्फ अपने परिवारजन, कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों के संरक्षण और संवर्धन में मशगूल हो गए आज भी नेपाल की राजनीति उसी रास्ते पे चल रही है और आम नागरिकों की सुधि लेने वाला कोई नही है । नश्लिय तौर पर देश को विभाजित कर किसी एक समुदाय के विरुद्ध सख्त और विभेदपूर्ण व्यवहार कर कोई बहुत बड़ा राष्ट्रवादी हो जाता है और इसी देश के किसी एक भूगोल में रहने वाले लोगों को विदेशी तक कह बैठता है । आखिर किसी भी हाल में देश की सत्ता में बने रहने का सवाल जो है ।
अब जिक्र करते हैं देश के कर्मचारीतन्त्र की, कर्मचारी तंत्र किसी भी लिहाजÞ से सर्वसाधारण के प्रति दोस्ताना बर्ताव नहीं रखता क्योंकि विभिन्न संघ संगठनों के नाम पर वो भी राजनीति में प्रत्यक्ष दखल रखता है और राजनीतिक संरक्षण के कारण बेखौफ भी रहता है ।
इन सभी परिस्थितियों के बीच सबसे बुरा हाल है नेपाल के साधारण नागरिकों का । आम नागरिक फिलहाल राज्य के द्वारा धमाधम बढ़ाए जा रहे करों से परेशान हो के छटपटाहट महसूस कर रहे हैं और प्रधानमंत्री लोगों को मुंगेरी लाल के सपने दिखाने से थक नहीं रहे हैं । पानी जहाज, बुलेट ट्रेन, पाईप लाइन से गैस सप्लाई तो फलाना फलाना अर्थहीन और महत्वाकांछी योजनाओं का जिक्र कर अपने ही देश के कर दाता और जनता के साथ मजाक पर मजाक किए जा रहे हैं ।
जिस देश मे हरेक संस्थान और निकाय सिंडिकेट से घिरा हुआ हो वहां इस प्रकार के सपने दिखाना जनता से मजाक करना नही है तो फिर क्या है ? हाल ही के दिनों में संघीय सरकार के आपूर्ति मंत्री मात्रिका यादव के द्वारा काठमांडू के सब्जी मंडी में रेड मारने के बाद पता चला कि कैसे किसानों से १८ रु. प्रति किलो खरीदी गई गोभी १३० रु. प्रति किलो के दर से आम उपभोक्ताओं या कहे तो कर दाताओं को बेचा जा रहा है । जब करवाई की बात उठती है तो सब्जी मंडी के सिंडिकेट के मसीहाओं के पक्ष में कुछ राजनीतिक दलों के नेतागन खड़े हो जाते हैं इससे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है ? और हम परिकल्पना करते है संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल के भीतर समाजवाद जैसे पवित्र सिद्धांत लागू करने की । गौरतलब है कि नेपाल का न्यायालय हो कि सैन्य विभाग हर जगह के प्रमुख के शैक्षिक प्रमाणपत्र पÞmजर्Þी होने की खबर अखबारों में पढ़ने को मिलतीं हैं । न्यायालय जैसे स्वतन्त्र निकाय के न्यायमूर्तियों की नियुक्ति दलों के हिस्सेदारी के आधार पर की जाती है । जहाँ मानव अधिकार आयोग और संचार जगत भी सत्ता के समीप बने रहने के लालचवश नश्लिय चिंतन से प्रभावित रहता है । भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए गठित अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग जैसे स्वतन्त्र और अति संवेदनशील निकायों के प्रमुख की नियुक्ति योग्यता के नही बल्कि राजनीतिक दलों के सिफारिस के आधार पर होती हो और इस देश के एक मात्र अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा से बड़ी आसानी से ३३ किलो सोना बाजÞार पा जाता हो और कारवाई के ऊपर भी सवालिया निशान हो तो यहाँ की जनता कैसे मान ले कि देश की स्थिति सुधर रही है और देश विकास कर रहा है ?
हाल ही में लाए गए फौजदारी÷देमानी संहिता एवं कार्यविधि कानून में व्यापक संसोधन की आवश्यकता है । इस संहिता ने हरेक निकायों को भय और त्रास के बीच कार्य सम्पादन के आदेशात्मक व्यवस्थाओं का जिÞक्र किया है । जिस देश मे नश्ल के आधार पर न्याय किया जाता हो वहां सामाजिक न्याय की परिकल्पना भी बेमानी होगी । इसका एक ज्वलंत उदाहरण रेशम चौधरी प्रकरण है । जहाँ एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय से सजÞायाफ्ता बालकृष्ण ढुङ्गेल को राजनीति का दवाब के कारण राष्ट्रपतीय माफी दी जाती है वहीं दूसरी तरफ जनता के मत द्वारा देश में ही सबसे अधिक मतांतर से प्रतिनिधि सभा सदस्य पद पर निर्वाचित सांसद रेशम चौधरी को हथकड़ी लगाकर जेल में रखा जाता है और शपथ ग्रहण से भी वंचित किया जाता है ।
आखिर क्या वजह है कि मित्र राष्ट्र के प्रधानमंत्री जनकपुर की यात्रा पर आते हैं तो उनकी सभा में स्वतःस्फूर्त लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है और लोग उनका तालियों से भव्य स्वागत करते हैं । दूसरी तरफ अपने देश के प्रधानमंत्री को काला झंडा दिखाया जाता है और हजÞार दो हजÞार लोग भी भाड़े पे लाने की जरूरत पड़ जाती है ? इस प्रश्न का जवाब क्यों नही ढूंढा जाता ? इसकी एक ही वजह है यहाँ का नेतृत्व तबका ही असहिष्णु है और नश्लवादी चिन्तनों से चिंतित है । जिसके कारण यहाँ की जनता के बीच में राजनीतिक दलों और नेताओं के विरुद्ध अविश्वास, आक्रोश और घृणा बढ़ती जा रही है ।
आज की सरकार जो दो तिहाई के उन्माद में भी है और अधिनायकवादी भी उसे अपने शासनकाल की उम्र की चिंता है नेपाल के सर्वसाधारण और विभेदित जनता की सुधि लेने की फुरसत किसे है ? प्रधानमंत्री महोदय खुद को देश की संविधान और कानून के ऊपर मानते हैं । इसका उदाहरण हाल में ही प्रधानमंत्री ने प्रदेश न.२ की सभा का सम्बोधन अनाधिकृत और असंवैधानिक तरीके से कर के प्रस्तुत किया है । जबकि ऐसा उदाहरण दुनियांभर में कहीं भी देखा नही गया है कि प्रधानमंत्री प्रदेश सभा को संबोधन करे । संविधान की धारा १८२, १९० के अनुसार सिर्फ प्रदेश प्रमुख के ही द्वारा प्रदेश सभा को संबोधन करने की संवैधानिक व्यवस्था है । लेकिन खुद को सम्राट समझने वाले प्रधानमंत्री को विश्व के सर्वोत्कृष्ट संविधान से कोई मतलब नहीं है शायद ।
पार्टियों के द्वारा चुनावी घोषणापत्रों में चाहे जितनी भी मन लुभावनी बातें लिखी जाती हों सिर्फ कागजों में सिमट कर रह जाती हैं । सरकार और जनता के बीच किसी भी किस्म का तालमेल नहीं दिखता । प्रमुख प्रतिपक्षी के हैसियत से विपक्ष बैठी नेपाली कांग्रेस नहीं तो मजबूत विपक्ष मालूम पड़ती है नहीं तो उसके पास ऐसे मुद्दे हैं जिसके दम पर वो सत्ता पक्ष के लिए चुनौती खड़ी कर सके । नेपाली कांग्रेस इनदिनों विभिन्न विषयों को लेकर सड़क से सदन तक आंदोलनकारी दिखायी पड़ती है ये भी दरअसल पार्टी के अन्तर्द्वन्द को झेलने के लिए अपनाया जा रहा राजनीतिक दांव है । यथास्थितिवादी नेपाली कांग्रेस केवल अस्तित्व बचाने में लगी है और उसके पास भी देश के निर्माण और विकास के लिए कोई रेखाचित्र नही है । राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अपने शासनकाल में सत्ता लोलुप्त और नेपाल के आवाम के प्रति अनुत्तरदायी रही कांग्रेस सिर्फ सत्तारूढ़ दलों का विरोध करने का काम कर रही है और परिस्थितियों के भरोसे चल रही दिखाई पड़ती है । नेपाल सरकार और विपक्ष में से कोई भी देश और देश की साधारण जनता के प्रति दूरदर्शी या उत्तरदायी नहीं दिखता । देश की सभी छोटी बड़ी पार्टियाँ एवं नेता केवल सत्ता हथियाने एवं सरकार में पहुंच बनाने के दांव पेंच में लगे रहते हैं । अगर आप पिछले डेढ़ दशक का नेपाली राजनीतिक घटनाक्रम पर गौर फरमाएं तो इसके अनेक उदाहरण देख सकते हैं । पिछले डेढ़ दशक से नेपाल में अपवित्र गठबंधनों की सरकारें सत्ता संचालन करती आ रही है जिनके साथ विचार धाराएं और सिद्धांत बिल्कुल नहीं मिलते ऐसी पार्टियों के बीच भी गठबंधन की सरकारें चल रहीं होती हैं । यहां दलों के बीच लोकतन्त्र का मजाक उड़ाने और नागरिकों से कर वसूली करके सता सुख भोगने की अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा चल रही है जोकि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । इसलिये अभी यहाँ की जनता को रोटी, कपड़ा और मकान के लिए खुद के दम पर और मसक्कत करनी होगी । अपितु देश की समस्याओं से अभी लड़ना होगा, अपने अधिकारों के लिए सड़क संघर्ष भी करते रहना होगा तब तक जब तक कोई मसीहा किसी राजनेता के रूप में जन्म नही ले लेता ।
(लेखकः दुवे रा.ज.पा नेपाल के केन्द्रीय सदस्य हैं।)

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