चूरे संरक्षण हीं नेपाल का संवर्धन है : अजय कुमार झा
हिमालिनी, अंक सितम्बर २०१८ | शिवालिक पहाडि़याँ, जिसे नेपाल में चूरे पहाड़ कहा जाता है, जो भारत के सिक्किम राज्य के तिस्ता नदी से पश्चिम पश्चिमोत्तर की ओर, नेपाल से पश्चिमोत्तर भारत की ओर और उत्तरी पाकिस्तान की ओर १६०० किमी से अधिक की दूरी तक विस्तृत हो स्थित है । कई स्थानों पर ये पहाडि़याँ १६ किमी चौड़ी हैं और इनकी औसत ऊंचाई ९०० से १२०० मीटर है । चूरे–तराई मधेस के संरक्षण हेतु एकीकृत योजना व्यवस्थापन कार्यान्वयन और संरक्षण से जुड़े नीतियों का निर्माण के लिए नेपाल सरकार ने पूरब में इलाम और पश्चिम में कञ्चनपुर जिला तक के नेपाल के कुल भू–भाग का १२.७८ प्रतिशत चूरे क्षेत्र को वातावरण संरक्षण क्षेत्र घोषणा किया गया, तो २०७१ साल असार २ गते राष्ट्रपति चूरे–तराई मधेस संरक्षण विकास समिति का गठन किया गया । इसके अंतर्गत नेपाल के ३६ जिला, और कुल संरक्षण क्षेत्र १८, ९६, २५१ हेक्टर क्षेत्रफल शामिल हैं । ६ राष्ट्रीय निकुञ्ज तथा आरक्ष (क्षेत्रफल–३, ४२९ वर्ग किलोमिटर) और १३२ नदी के साथही जलाधार प्रणाली भी शामिल हैं । इतने विशाल प्राकृतिक भण्डार को सरकार द्वारा अब आ के राष्ट्रीय विषय के रूप में लेना अपने आप में यक्ष प्रश्न है । जिस नेपाल सरकार ने अब तक चूरे को योजना बनाकर विनाश ही किया है, उसे इसके संरक्षण हेतु प्रेरणा कैसे मिला ? या फिर इसमे भी संवेदनात्मक षडयंत्र तो नहीं ! क्योंकि एक तरफ संरक्षण और दूसरी तरफ पूरब पश्चिम राजमार्ग को चार लेन बनाने के नाम पर वन विनास । आखिर कब तक ! अब नेपाल संघीय गणराज्य बन चूका है । अतः इसके संरक्षण का दायित्व प्रदेश सरकार का भी है ।
पहाड़ों की श्रृंखलाएं और सुंदर एवं मनोरम घाटियां अपने आप में एक दिव्य सौन्दर्य का स्वर्गिक दृश्य स्थापित करता है । इसीलिए हमारे अधिकाँश देवी–देवताएं, योगी–महात्मा, ऋषि–महर्षियों, शक्ति पीठों, द्वादस ज्योतिर्लिंगों, ये सभी पहाड़ और जंगल में ही अपने को व्यवस्थित अनुभूत किए हैं । पहाड़ के देवता मरुदगन हैं । और जब लोग अपनी क्षणिक लाभ के कारण देवभूमि पहाड़ के साथ खिलबाड़ करते हैं, तो मरुदगन उन्हें भयानक दंड दिए बिना नहीं छोड़ते । प्रमाण है अमरनाथ और नेपाल में आया भूचाल । पहाड़ को जीवंत बनाने के लिए जरूरी मुख्य तत्वों में पेड़ और पानी दोनों आवश्यक हैं । वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है । जीवन को परिभाषित करने के लिए जीव और वन दोनों जरूरी हैं । जहां वन होता है वहीं जीव होते हैं । इनके बिना पहाड़ अधूरा और वीरान हो जाता है । दूसरी ओर पहाड़ों के कारण ही नदियों के वहाव में निरंतरता रहती है । और याद रहे संसार की सभी सभ्यताएं जैसे ःह्वान्हो, सिंधुघाटी, मोहनजोदारो, हरप्पा, वेविलोन, मिश्र, मेसोपोटामिया, फारस, गंगा और बागमती) आदि नदी किनारे ही विकसित हुई है । अतः नदी, पहाड़ और जंगल हमारे लिए जीवन का आधार स्तम्भ तो है साथ ही सभ्यता, संस्कृति, धर्म, भाषा और संस्कार के उदगम भी है।
हम उस दिव्य संस्कृति और सभ्यता के धरोहर हैं जिसमे कंकर से शंकर तक को बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता है । हम उस वैदिक परंपरा की उपज हैं जिसमें कण–कण को परमात्मा के रूप में पूजा जाता है । उदाहरणार्थ ः ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षँ शान्तिस्, पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वँ शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
अर्थ (द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों । जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों । सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों । ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों । उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों । सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो । ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे । अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण–कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो । समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो ।
तो मेरे प्यारे ! फिर हम बिना विशेष कारण के पेड़ को कैसे काट सकतें हैं ! कभी पेड़ को प्यार करके देखिए, वह आपको हजार गुणा अधिक स्नेह लौटाएगा । मैंने प्रेमल व्यक्तियों के स्वागत में पेड़ो को बिना समय फूलों और फलों से लदकर लोट पोट होते देखा है । मैं कहना यह चाहता हूँ कि, जिसके हृदय में प्रेम और करुणा नहीं है वही षडयंत्र पूर्वक पेड़ों को काटने का दुष्कर्म करतें हैं । वो हिंसक हैं । कल उन्हें पशुओं को काटने में मजा आएगा और परसों वो हम मानवों को भी बड़े मजे से मौत के घाट उतारेगा । वैसे इन लोगों ने माओवादी जनयुद्ध के नाम पर २० हजार युवाओं को मौत के घाट उतार कर अपना दानवीय परिचय दे चुके है । अतः योजनावद्ध रूप मे हजारों एकड़ के पेड़ों को काटकर विकास कार्य और मानव बस्ती बनाना भविष्य में महाभारत को निमंत्रण देने का बीजारोपण है ।
मानव एक ओर जहां पहाड़ और जंगलों को नष्ट कर सड़कें और शहरों को बना रहा है वहीं नदियों पर बांध बनाकर उनके अस्तित्व को मिटाने पर तुला है । विश्व का कुल भूभाग के ३०.६ प्रतिशत भूभाग में जंगल है ।
गौरतलब है कि हम मधेसी लोग इसी शिवालिक चूरे पर्वत श्रृंखला के सान्निध्य में अस्तित्वगत हैं और इसी के वन से संरक्षित जल से हमारा जीवन है । अब, जबकि इसी के अस्तित्व को मिटाने का षडयंत्र चल रहा है तो, हमारा अस्तित्व क्या सुरक्षित रह पाएगा ?
चूरे पर्वत श्रृंखलाओं के अनेक क्षेत्रों में अधिकतर जंगल ही थे । लेकिन इनमें से ज्यादातर क्षेत्रों का जंगल कभी कृषि भूमि के लिए तो कभी पूरब पश्चिम राजमार्ग के नाम पर अथवा अन्य औद्यौगिक, व्यावसायिक निर्माण कार्य हेतु सफाया कर दिया गया है और वन विनास कार्य जारी भी है । इसके चलते यहां का दुर्लभ वन्यजीवन और संजीवनी शक्ति से युक्त जड़ीबुटियाँ भी लुप्त हो चुके हैं । एक तीर दो निशाने के तहत खस संरक्षण और मधेस भक्षण की दानवीय मानसिकता से ग्रसित आज तक के सभी सरकारें, चाहे राजतन्त्र की हो या प्रजातंत्र की, राणा शासक हो या आधुनिक गणतांत्रिक सरकार सभी एक दूरगामी षडयंत्रपूर्ण सोच है, (जिसका शिकार मधेसी को म्यानमार के रोहिङ्गियो की भाति मधेस से पलायन होने को मजबूर किया जाय) के उद्देश्य से पहाडि़यों को पर्वतीय कष्टकर जीवन से निकाल कर मधेस के समतल, सहज और सुरम्य वातावरण का मालिक बनाने और मधेसियों के ऊपर लगाम लगाने के उद्देश्य से धोखे में डालकर विभिन्न विकास के नामों से वन जंगल विनास का काम किया जा रहा है ।
विभिन्न सर्वेक्षण के जरिए नेपाल के वन सम्पदा को विकसित होने का दावा किया गया है । लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि, पहाड़ वासियों को माओवादी जनयुद्ध और भस्मासुरी प्रवृति के कारण किए गए वन विनास के कारण पहाड़ से पलायन होना पड़ा था । इस प्रकार उस लावारिस जमीन को बचे खुचे स्थानीय रैथाने द्वारा सामुदायिक वन विकास के नाम से व्यवस्थित किया गया । जिसे वो लोग नेपाल में वन सम्पदा बढ़ने का खोखला दावा विश्व समक्ष कर रहे हैं । ताकि नेपाल सरकार को मधेस के जंगलों का सफाया करने में यु एन ओ के विरोध का सामना न करना पड़े । और बड़ी आसानी से मधेस के विकास के नामपर मधेसियों द्वारा ही जंगल को विनास करा दिया जाय । और सारा दोष भी मधेसियों के ऊपर ही मढ़ दिया जाय । नेपाल सरकार अपने ही नागरिक के साथ सौतेला व्यवहार करती रही है । हजाराें वर्षों से नेपाल के हिमाली नदियों का पानी व्यर्थ ही वर्वाद हो रहा है । जबकि इस जल से नेपाल को श्रेष्ठतम देश की कोटि में सहज ही पहँुचाया जा सकता था । लेकिन सभी पार्टियों ने अपने कार्यकर्ता भरती अभियान के अलावा आज तक कुछ नहीं देख पाया । स्वतःस्पÞmुर्त रूप में टिकाऊ और स्वावलंबी आर्थिक नीति के तहत नेपाल को कृषि क्षेत्र में मजबूत होना ही होगा । आज १४ खरब के राष्ट्रीय बजेट में १२ खÞराब घाटा ही है । इसमे भी भारत से मंगाए गए अनाज में ही लगभग ५ खरब का घाटा नेपाल को सहना पड़ता है । जो कृषि क्षेत्र वैज्ञानिक होते ही नाफा में बदल जाएगा । परन्तु नेपाल सरकार को यह करना ही नहीं है । वो तो मधेसियो को दरिद्र और पलायन करने पर मजबूर किया जा सके, इस खतरनाक दाँव पे है । वास्तव् में ये वही भस्मासुर हंै, जो अब मधेस के सुरम्य चूरे भूभाग को भी तहस नहस करने के उद्देश्य से आ पहुंचे हैं । हमें इनसे से सावधान होना होगा । पिछले ३० वर्षों में मधेस के भूमिगत जल सम्पदा २००५ के दर से नष्ट हुआ है । पीने के पानी के रूप में प्रयोग होते आ रहे चापा कल के भूतल का जलस्तर प्रतिवर्ष घटता जा रहा है । कुछ वर्षों में हीं हमारे यहाँ पानी किल्लत हो जाएगा और हम न घर के रहेंगे न घाट के । यह समग्र मधेसवासियों का प्रत्यक्ष अनुभव है । वन विनास पर अविलम्ब रोक न लगाया गया तो, कुछ ही वर्षों में पीने के पानी के प्रचंड अभाव में मधेसियों को मधेस से पलायन होना होगा । उधर भारत के द्वारा मधेस के सीमा से सटे निर्माण हो रहे बाँध रूपी सड़क से मधेस की आधी आवादी वर्ष भर पानी में डूबने को मजबूर हो रही है । खुर्दलोटन बाँध और लक्ष्मणपुर का क्षेत्र इसका प्रमाण है । गंभीर होगा कौन ?
जिसके अस्तित्व के ऊपर प्रलय रूपी राजनैतिक षडयंत्र मंडरा रहा है । वह भी बाहरी देशों से नहीं, अपने ही देश के भीतर मधेस विरोधी सोच को लेकर फलफूल रहे क्षुद्र राजनैतिक सोच से । दुर्भाग्य है हमारा कि उस घृणित और आत्मघाती काम में हम बड़े गर्व के साथ उसके ही सहयोगी बन बैठे हैं ।
नेपाल के कुल जंगल का ७३५ भूभाग केवल चूरे क्षेत्र अंतर्गत पड़ता है । और इसका संरक्षण नेपाल और मधेस के सभ्यता का संरक्षण है । क्योंकि पहाड़ पर हरियाली (जंगल) बादलों को बरसने के लिए न्योता होता है, पहाड़ और जंगल अपने करीब की बस्ती के तापमान को नियन्त्रित करते हैं और अपने भीतर वर्षा का संपूर्ण जल संरक्षित कर लेते हैं । इससे आसपास की भूमि का जल स्तर बढ़ जाता है । कुएं, तालाबों, नदी और नलकूपों में भरपूर पानी रहता है। किसी पहाड़ी के कटने के बाद इलाके के भूजल स्तर पर असर पड़ने, कुछ झीलों, तालाबों आदि का पानी पाताल में चले जाने की घटनाओं पर कोई ध्यान नहीं देता । क्या किसी वैज्ञानिक ने इसकी जांच की है कि पहाड़ों के कटने से भूकंप की संभावनाएं भी बढ़ जाती है ?
जंगल के कटने से हुई अनेक क्षतियों में वन्य जीवन पर संकट भी विशेष महत्व रखता है । इससे मधेस लगायत संपूर्ण देश का परिस्थितिकि तंत्र गड़बड़ होने लगा है । जंगल के कटने से तथा पशु आहार के रूप में अतिरिक्त दबाव के कारण भूक्षरण, भूस्खलन जैसी क्षतियां भी होती ही रहती हैं । साथ ही बढ़ती मानव आबादी से प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है । मधेस को नेपाल का अन्न भण्डार कहा जाता है, लेकिन चूरे पहाड़ के तथा वहां के वन विनास के कारण प्रत्येक वर्ष बाढ़ में आए बालुओं के कारण आज मधेस के कृषि योग्य जमीन रेगिस्तान में बदलने लगा है । जिस मधेस के किसान अपनी उपज को भारत में बेचते थे आज वो भारत से अन्न खरीदकर जीवन यापन करने को मजबूर हैं । यह किसी एक जिले या गाँव की बात नहीं बल्कि समग्र मधेस का और नेपाल राष्ट्र का है । यहाँ के सबल किसान के बच्चे भी जीवन यापन हेतु विदेश पलायन को बाध्य हैं । क्योंकि सरकारी नौकरियों में किसी वर्ग का एकाधिकार है । प्रहरी, सेना और शिक्षकों में भी उन्हीं लोगो का कब्जÞा है । राजनीति पर तो उनका वंशज अधिकार है । अब सोचने वाली बात है, कि हम मधेसी आखिर में करें तो क्या करें, क्योंकि खेती भी सरकार के षडयंत्र के कारण पूरी तरह बर्वाद होने के कगार पर है । बहुत जल्द भूमिगत जल के अभाव के कारण पीने को पानी तक के लिए दूसरों का मोहताज होना पड़ेगा । समय रहते सचेत होना और समाज को सचेत कर मार्ग निर्देश करना प्रज्ञावानों का कर्तव्य है । राजनीति कर्मियों को चाहिए की तुष्टिकरण और क्षणिक आर्थिक और पदीय लाभ को त्याग कर समग्र मधेस के अस्मिता और सभ्यता को संरक्षित करने का अभियान चलावें ।

