भारत–चीन संबंधः ‘हिंदी–चीनी भाई–भाई’ आदर्शलोक से व्यवहारवाद तक का एक सफर : डॉ. गीता कोछड़ जायसवाल
डॉ. गीता कोछड़ जायसवाल,हिमालिनी अंक अक्टूबर २०१८ पिछले कई दशकों से सक्रिय युद्धों में शामिल होने से लेकर अस्तित्व की सद्भावना पैदा करने तक के लंबे सफÞर को तय करते हुए काफÞी मायनों में हमारे आस–पास की वर्तमान दुनिया बदल गई है । फिर भी, विभिन्न स्तरों पर देशों के बीच निरंतर टकराव रहा है, भले ही कई दमदार समर्थकों का मानना है कि “सहयोग का मार्ग टकराव से बेहतर है ।” वैश्वीकरण ने गहन सहभागिता बनाने में भी अत्यधिक भूमिका निभाई है और उन देशों के बीच गतिशीलता में बदलाव आया है जो सहकारी भागीदारी के माध्यम से अर्थव्यवस्थाओं के विकास की तलाश में हैं ।
दुनिया की बदलती भू–राजनीति न केवल द्विपक्षीय स्तर पर बल्कि बहुपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर जिम्मेदारियों और सहकारी दृष्टिकोण के साथ देशों के बीच जुड़ाव चाहती हैं । एशिया में, भारत और चीन—दो बड़ी और बढ़ती शक्तियों ने पिछले कई दशकों में टकराव से सहयोग पर ध्यान केंद्रित किया है । यह अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण सीमाओं में दिखाई देता है, हालांकि पिछले कुछ दशकों से छोटे पैमाने पर कई टकराव हुए, लेकिन विवादों को कम करने के लिए क्रियाविधि पर काम चलते रहे । फिर भी, जुड़ाव का स्तर और गति कम बनी रही और रिश्तों में सामान्यता ही रही ।
भारतीय प्रधान मंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति के रूप में शी जिनपिंग के साथ बदले हुए नेतृत्व ने भारत–चीन संबंधों में एक नई गतिशीलता बनाई है । मोदी की पड़ोसी राज्यों के साथ सक्रिय भागीदारी भारत की विदेशी नीति को व्यवहारवाद की दिशा में पुनः अनुकूल करती है, जो अपने पड़ोसी राज्यों, विशेष रूप से चीन के साथ संबंधों को बढ़ाने और उसमें प्रगति लाने पर जÞोर देती है । व्यावहारिक दृष्टिकोण संबंधों में आर्थिक जुड़ाव को खÞास महत्व देता है और अन्य सभी ऐतिहासिक मुद्दों से निपटने के लिए सक्रिय संवाद और आत्मविश्वास निर्माण क्रियाविधि पर जÞोर देता है । मोदी का दृष्टिकोण इस तथ्य से समर्थित है कि चीनी सरकार राष्ट्रीय विकास के लिए केंद्रीय नीति और अन्य देशों के साथ सामरिक राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए “विकास” पर जोर देती है ।
जिस मुद्दे को अधिक समझने की आवश्यकता है वह यह है कि चीन का पारस्परिक दृष्टिकोण क्या है ? विशेष रूप से, जब शी जिनपिंग सभी पड़ोसी राज्यों के साथ संबंधों को फिर से परिभाषित कर गठबंधन बनाने के उद्देश्य से “सामान्य भाग्य के समुदायों” के निर्माण के लिए कहते हैं, तब भारत इस तरह के राजनीतिक जुड़ाव में कैसे भाग लेता है ? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत और चीन दोनों राष्ट्रवादी उत्साह के साथ मजबूत राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, भारत एक “अखण्ड भारत” (यूनाइटेड इंडिया) का निर्माण करना चाहता है और चीन की दृष्टि “चीनी राष्ट्र को पुनर्जीवित” करने की है । इन राष्ट्रीय राजनीति के तहत, सहकारी भागीदारी के लिए कौन सी चुनौतियां मौजूद हैं ? भारत के “व्यवहारवाद” के इस नए दृष्टिकोण को पूर्व चीनी नेता डेंग जियाओपिंग के समय से चीन की निरंतरता के संबंध में समझना भी महत्वपूर्ण है ।
व्यवहारवाद ः भारत और चीन के दृष्टिकोण
यथार्थवाद, उदारवाद और रचनात्मकता के मानक सैद्धांतिक रूपरेखाओं से अलग है व्यवहारवाद । यह लाभ के उद्देश्य में अंतर्निहित राज्यों के बीच व्यवहार बढ़ाने और अस्तित्व में सद्भाव बनाने का चौथा दृष्टिकोण है । यह मौजूदा संरचनात्मक ढांचे में कुछ चीजÞें जोड़ता है जिसे विद्वान “आत्म–सहायता को अपनाना” कहते हैं और कुछ चीजÞों को अस्वीकार करता है । अधिकतर बहस “विचारधारात्मक ढांचे” के मूल तत्व को नकार कर “राष्ट्रीय हित को परिभाषित करने वाली भौतिक शक्ति के यथार्थवादी धारणाओं” के नए तत्वों को अपनाने पर केंद्रित हैं ।
चीन के मामले में, १९८० की शुरुआत में, डेंग जियाओपिंग ने व्यवहारवाद की विचारधारा को प्रचारित किया और माओ जÞेडोंग के “समाजवाद” के आदर्शवादी ढांचे को अस्वीकार कर दिया, जिसने चरम पिछड़ेपन के साथ एक समतावादी समाज बनाने की कोशिश की थी । डेंग ने भौतिक कल्याण पर केंद्रित “चीनी विशेषताओं के साथ समाजवाद” बनाने के लिए “माओ की तथ्यों से सच्चाई की तलाश” (क्भभपष्लन तचगतज ाचयm ाबअतक) पर पुनः काम करने को कहा । उनकी टिप्पणी “गरीबी समाजवाद नहीं, समृद्ध होना गौरवशाली है” ने चीन के विकास मॉडल को एक नई दिशा दी और विदेशी निवेश को आमंत्रित करने के लिए दरवाजे खोले । व्यावहारिकता का विचार, जिसे चीनी भाषा में ‘धगकजष् शजगथष्’ कहते हैं, भौतिक हितों के विचारों को व्यावहारिक कार्यवाही से जोड़ता है । इसका उद्देश्य वास्तविकता में चीन को आर्थिक और सैन्य इन दोनों क्षेत्रों में मजबूत और शक्तिशाली राष्ट्र बनाना था । इस प्रस्ताव में, डेंग ने दुनिया की कल्पना शांतिपूर्ण स्थिति के रूप में की और भौतिक हितों पर निर्मित “व्यापक राष्ट्रीय ताकत” के दायरे में चीन की राष्ट्रीय रुचि कों निर्धारित किया ।
दूसरी तरफ, १९९० के दशक तक भारत “नेहरूवादी रूमानवाद” और “नैतिक मुद्रा” पर अत्यधिक निर्भर था । भारत का उपनिवेशवाद, नस्लवाद, महाशक्तियों के संदेह, और गैर–संरेखण की घोषणा को खत्म करने पर दृष्टिकोण अधिक था । नेहरूवादी आदर्शवाद भौतिक गतिविधियों के आधार पर राष्ट्रीय हित के बजाय दुनिया को बदलने के विचारधारात्मक उदारवाद के मूल्यों पर अधिक थी । यह कहा जाता है कि उस समय बीजेपी, सोवियत संघ के पतन के साथ अप्रासंगिक के रूप में गैर–संरेखण की घोषणा करने वाली एकमात्र पार्टी थी, जबकि १९९८ में किया गया परमाणु परीक्षण भारत के मूल सिद्धांत में एक परिवर्तन था । इसलिए, व्यावहारिकता के प्रति भारत का दृष्टिकोण इस बात पर निर्धारित था की दुनिया में हितों के लिए संघर्ष है और राज्यों में सत्ता की लालसा थी ।
भारत और चीन दोनों की व्यावहारिकता के प्रति दृष्टिकोण इस बात पर निर्धारित है कि वह अपने अपने देश की आर्थिक व्यवस्था को तेजी से विकसित करना चाहते थे, अंतरराष्ट्रीय शासनों में अंतःक्रिया के क्षितिज का विस्तार करना चाहते थे और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अपना स्थान बनाना चाहते थे । जबकि चीन ने राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप भौतिक लाभों की ओर एक तीव्र मोड़ लिया, भारत ने विश्व व्यवस्था में एक नई पहचान पाने के लिए थोड़ी वृद्धिशील निरंतरता से काम किया । हालांकि, भारत के दृष्टिकोण में प्रमुख बदलाव २०१४ में मोदी के सत्ता में आने के बाद “नेहरूवादी आदर्शवाद” की पूरी तरह अस्वीकृति में नजÞर आता है । उन्होंने तेज गति के साथ सहकारी स्थानों के साझाकरण को बढ़ावा दिया ताकि “सभ्यतावादी राज्य” सिद्धांत पर निर्धारित राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा मिल सके । शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को महत्व देते हुए मोदी की विदेश नीति का सैद्धांतिक प्रवचन भारत को नैतिक और आध्यात्मिक रूप से विशिष्ट मानता है ।
भारत–चीन संबंधों की यात्रा
भारत चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाला पहला गैर–समाजवादी देश था । १९५४ में पंचशील समझौते (शांतिपूर्ण सह–अस्तित्व के पांच सिद्धांत) पर हस्ताक्षर करने के बाद, भारत और चीन दोनों देश एक साथ “साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरोध” में “हिंदी–चीनी भाई–भाई” की प्रेम कहानी में मगन थे । धारणा यह थी कि नए स्वतंत्र राज्य द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक सिद्धांत स्थापित करने में सक्षम होंगे जिससे संघर्ष और युद्ध की संभावना नहीं रहेगी । मगर, १९६२ में भारत और चीन की सीमा पर हुए युद्ध के साथ प्यार का रूमानवाद खÞत्म हो गया । इस युद्ध की अपरिवर्तनीय क्षति ने भारत–चीन को स्थायी प्रतिद्वंधि बना दिया ।
१९७८ में भारतीय विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन की ऐतिहासिक यात्रा के साथ दोनों देशों ने राजनयिक संबंधों को पुनः स्थापित किया । जिसके बाद चीनी विदेश मंत्री हुआंग भारत यात्रा पर आए । १९८८ में भारतीय प्रधान मंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के दौरान संयुक्त संवाद पर हस्ताक्षर करके संबंधों में एक नई आशा और गर्मी आयी, जिसके चलते पंचशील के सिद्धांतों के आधार पर मैत्रीपूर्ण संबंध बहाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया । २००६ में ४४ वर्षों के बाद नाथुला पास के उद्घाटन के साथ संबंधों में और अधिक सुधार हुआ । दोनों देशों के बीच पारस्परिक समझ यह थी कि सीमा व्यापार तनाव को कम करेगा और सहयोग को बढ़ाएगा ।
२००८ तक, चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया और आपसी संबंध रणनीतिक और सैन्य संबंधों तक बढ़ गए । २०१५ में, चीनी प्रधान मंत्री वेन जियाबाओ की भारत यात्रा के दौरान, दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि २०१५ तक द्विपक्षीय व्यापार को १०० अरब अमरीकी डालर तक बढ़ाना है, जिससे दोनों देशों के प्रयास से “एशियाई शताब्दी” बनेगी । मगर आज भी दोनों देशों के बीच ६३ अरब अमेरिकी डॉलर के व्यापार घाटे के असंतुलन का महत्वपूर्ण मुद्दा हैं जो कि चीन के पक्ष में है । हालांकि पिछले वर्ष तक द्विपक्षीय व्यापार ९० अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, लेकिन सीमा विवाद लंबे समय से अनिर्णीत रहा है ।
विकास राष्ट्रीय हितों की कुंजी
भारत और चीन दोनों “गरीब और पिछड़े विकासशील देशों” से परिवर्तित हो के “तकनीकी रूप से उन्नत आधुनिक राज्य” बनने के संक्रमणकालीन चरण में हैं । दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों के इस आधुनिकीकरण का अर्थ यह भी है कि दोनों गरीबी को खत्म करने, अस्थिरता के आंतरिक कारकों से निपटने, बुनियादी ढांचे के निर्माण में बड़ी मात्रा में निवेश करने, और जनसंख्या के कौशल बनाने के अवसरों के लिए बड़ी आंतरिक चुनौतियों का सामना करते हैं । इसका यह भी अर्थ है कि दोनों देशों को बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए न केवल आंतरिक संसाधनों को उत्पन्न करने की आवश्यकता है, बल्कि साझाकरण और सहयोग से बाहरी अवसरों पर निर्भर करना भी जÞरूरी है जो अर्थव्यवस्थाओं के उच्च विकास को बनाए रखने में मदद करती हैं ।
१९८० के दशक से चीन के सुधार और खुले दरवाजे की नीति के उद्देश्यों को २०५० तक पूर्ण करना था । शी ने ‘चीनी सपना’ (ऋजष्लब म्चभबm) के तहत एक नई दृष्टिकोण बनाने की धारणा को बढ़ावा दिया, जो कि “दो शताब्दी लक्ष्यों” पर केंद्रित है ः एक, २०२१ तक गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य के साथ “मध्यम समृद्ध समाज” का निर्माण, दूसरा, २०४९ तक चीन को “पूर्ण विकसित राष्ट्र” बनाना । इन भव्य उद्देश्यों में चीन की अग्रणी वैश्विक शक्ति का विचार भी शामिल है और इस क्षेत्र के देशों के बीच आम समृद्धि प्राप्त करना भी शामिल है ।
भारत की दीर्घकालिक दृष्टि की कमी ने प्रगति को बहुत धीमा कर दिया था । मोदी के सत्ता में आने के बाद, १९९१ से उदारीकरण के व्यावहारिक दृष्टिकोण को एक नई परिभाषा दी गई । १०० स्मार्ट शहर, “कुशल भारत”, “डिजिटल इंडिया” बनाने और २०३२ तक गरीबी उन्मूलन करने के उद्देश्य से नीतियों के साथ “मेक इन इंडिया” के बैनर के तहत एक नया भारत बनाने की कोशिश है ।
इसलिए, भारत और चीन दोनों ने जनसंख्या के भौतिक कल्याण के साथ आधुनिकीकरण के मुख्य एजेंडा के रूप में “विकास” पर अपना ध्यान केंद्रित किया है । अगस्त २०१४ में जापान के दौरे में मोदी ने स्पष्ट किया कि “दुनिया को दो शिविरों में बांटा गया है ः एक शिविर विस्तारवादी नीतियों में विश्वास करता है, दूसरा विकास में विश्वास करता है । ” सितंबर २०१४ में शी की भारत यात्रा के दौरान चीन द्वारा इस उद्देश्य को पारस्परिक रूप से पारित किया गया था, अगले पांच वर्षों में २० अरब अमरीकी डालर का निवेश करने का वादा चीन द्वारा किया गया था । तब से संबंधों ने डोकलाम मुद्दे के दौरान सबसे ज्यादा बढ़े हुए तनावों को देखा गया, फिर भी परेशानियों को एक अनदेखी विवाद के रूप में रखा गया जिसे प्रबंधित करने की आवश्यकता है । यह उन दोनों नेताओं का सबसे व्यावहारिक दृष्टिकोण है जो संबंधित राज्यों के हितों को नजरअंदाज किए बिना एक बहुआयामी जुड़ाव में पारस्परिक विकास की जगह को साझा करना चाहते हैं । अप्रैल २०१८ में मोदी–शी वुहान शिखर सम्मेलन था, जिसने विवादों में अंतर लाने की आवश्यकता पर जोर दिया ।
भारत और चीन के संबंध ने पुराने सिद्धांतों को तोड़ दिया है जो केवल टकराव या सहयोग को प्रतिबिंबित करते हैं, बल्कि स्थायी प्रतिमानों की सीमाओं को तोड़ने के एक नए प्रस्ताव को लाए हैं । इस क्षेत्र में शक्ति के राजनैतिक खेल के पुराने नियमों को भारत–चीन के पारस्परिक लाभ के लिए मोदी–शी की व्यावहारिकता ने परिवर्तित किया है । यह वैश्विक क्रम में नई पहचान और स्थिति बनाने के दृष्टिकोण में भी प्रतिबिंबित है, जिससे दोनों देश तुलनात्मक मॉडल या संघनित ब्लॉक्स जैसा कि ‘चीन के खिलाफ भारत’ या ‘भारत को नियंत्रित करता चीन’ को तोड़ रहे हैं । एशियाई इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बैंक, न्यू डेवलपमेंट बैंक, एससीओ, ब्रिक्स इत्यादि जैसे बहुपक्षीय जुड़ावों का संयुक्त प्रचार और वैश्वीकरण की वकालत करते समय संरक्षणवाद की अस्वीकृति व्यवहारवाद में परिवर्तन का प्रतिबिंब है । भारत और चीन एक असाधारण द्विपक्षीय संबंध स्थापित कर रहे हैं, जिसके चलते दोनों अपनी–अपनी सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर साझेदारी और शांतिपूर्ण परिवर्तन ला रहे हैं ।
प्रस्तुतिः सीपु तिवारी

