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भू-माफिया के षड्यन्त्र में, विधवा महिला को जेल :विनय दीक्षित

 

नेपालगंज। अगर आप नेपाली नागरिक हैं तो यह आपको चौंका देने वाली खबर है, क्योंकि जो नागरिकता दिखाकर आप नेपाली नागरिक और नेपाली राष्ट्रियता का धौंस दिखा रहे हैं, हो सकता है, उसका प्रमाण आप के स्थानीय जिला प्रशासन में न हो, अगर ऐसा हुआ तो आप भी नकली नागरिकता के आरोप में जेल जाने के कगार पर हैं। नेपाली नागरिकता प्राप्त जिले की एक विधवा महिलाको नकली नागरिकता के आरोप में बाँके जिला अदालत ने मुद्दा पर्ुपक्ष न होने तक जिला कारागार नेपालगंज में हिरासत में रखने का आदेश दे दिया है।
जिले के लक्ष्मणपुर गा.बि.स.वार्ड नं.५ बेउचहवा गाँव निवासी स्व.शिव कुमार सिंह की पत्नी कञ्चन सिंह -५०) को यह बताकर अदालत ने जेल भेज दिया कि उनकी नागरिकता नकली है। नेपालगंज कारागार में जब हिमालिनी ने कञ्चन सिंह से भेटघाट कर हिरासत में होने की वजह पूछी तो उनका कहना था- मैं जेल में क्यों हूँ यह तो मै भी नहीं जानती, अदालत ने मुझे नकली नागरिकता के आरोप में जेल भेजा है।
तथ्यों को पलट कर देखें तो बाँके जिला सन् १८६० में नेपाल का अंग बनने से पहले भारतका भू-भाग था और यहाँ के निवासी भारतीय थे। १८६० के वाद भूमि तो नेपाल की हो गई लेकिन यहाँ के निवासी भारतीय ही रहे। आज भी उनके साथ विदेशी जैसा ही व्यवहार होता है। कञ्चन सिंह के पर्ूवज १८६० के पहले भारतीय थे लेकिन उसके बाद नेपाली हो गये। २०२१ साल में भूमि सुधार लागू होने पर सैकडों विघा जमीन कञ्चन के पति स्व.शिव कुमार सिंह के नाम में नापी गई, लेकिन लम्बी मानसिक बिमारी के कारण नेपाली नागरिकता लेने से पर्ूव ही उनका निधन हो जाने के वाद काफी मेहनत करने पर २०५१।५।२२ में कञ्चन नेपाली नागरिकता प्राप्त करने में सफल हर्ुइं। और वह नागरिकता प्रमाणपत्र खो जाने के कारण २०६६।७।६ में पुनः प्रतिलिपि प्राप्त कर अपने पति की सम्पत्ति आपने नाममें नामसारी कराया।
लेकिन कञ्चन सिंह के अनुसार भू-माफिया के लोगों ने कुछ जमीन उन्हे देने के लिए बार-बार दबाव डाला और न देने पर झूठे केस में फसाने की धम्की ही नहीं दिया बल्कि कञ्चन सिंहको भारतीय बताकर उनकी सम्पत्ति नेपाल सरकार में लगाने के लिए जिले के भू-माफिया बनकट्टी गा.बि.स. निवासी फूल चन्द तिवारी, कम्दी गा.बि.स निवासी दुलारे अहिर और सर्ुर्खेत जिला निवासी जलाल बक्स मियाँ जैसे लोगों ने कारवाही भी की।
कञ्चन सिंह के अधिवक्ता धु्रव बस्याल ने नागरिकता को वैधानिक और प्रशासन की लापरवाही के कारण महिला के साथ हुए इस घटनाको गम्भीर विषय बताया, अधिवक्ता बस्याल का कहना है ः इसी तरीके से अगर प्रमाण गायब होते रहे तो कोई भी सुरक्षित नहीं है। अदालत में मुद्दा विचाराधीन होने के कारण बस्याल ने अन्य विषय में प्रतिक्रिया नहीं देना चाहा।
बाँके जिला अदालत बार एशोसिएशन के अध्यक्ष तथा अधिवक्ता विश्वजीत तिवारी का कहना है ः घटना गम्भीर है इसलिए उसका न्यायिक छानबीन होना चहिए और इस में संलग्न दोषी पर कडी कारवाही होनी चाहिए।
अन्य अधिवक्ता के अनुसार मुलुकी ऐन कर्ीर्ते -नकली) कागज १ नं. के अपराध में और उसी के ९ तथा १२ नं. के अनुसार सजायकी माँग करते हुये बाँके जिला अदालत में अभियोग पत्र दाखिल किया गया, जिस में जिला न्यायाधीश कृष्ण कमल अधिकारी ने मुलुकी ऐन अदालती बन्दोबस्त की दफा ११८-३) अर्न्तर्गत पर्ुपक्ष के लिए २०६९।३।२१ को कारागार में भेज दिया। कर्ीर्ते -नकली) कागज के १२ नं. अनुसार अपराध कायम होने पर १ वर्षकी सजा हो सकती है। साथ ही अदालती बन्दोवस्त की ११८-३) में ६ महीना से अधिक सजा हो सकने वाले अपराध में नेपाल में बसोबास न करने वालेको जमानत न देनेकी कानूनी व्यवस्था है।
सूत्रों के मुताविक कञ्चन सिंहको जमानत न मिल सके इसीलिए उन्हे भारतीय बताकर केस दर्ज किया गया है। लम्बे समय से कञ्चन की जमीन पर नजर टिका रहे भू-माफिया के खिलाडियों ने लम्बी साजिश के वाद उन्हें जेल में डालने का तरीका निकाल ही लिया।
स्थानीय लोगोंका मानना है, सम्पत्ति हडपने के लिए घटनाको भू-माफिया के साथ स्थानीय पुलिस, प्रशासन तथा हैसियत वाले लोगों की साँठगाँठ में अन्जाम दिया गया है। जहाँ की प्रहरी सहायक निरीक्षक विष्णु चौधरी के प्रतिवेदन के आधार पर केस दर्ज हुआ है, वहीं पर जिला प्रशासन कार्यालय में नागरिकता का अभिलेख गायब है तो दूसरी तरफ भू-माफिया पहले से ही कंचन सिंहको भारतीय बताकर दाबी करते आ रहे हैं।
जानकारवालों की मानें तो यह पहली घटना नहीं है। लम्बे अरसे से मधेशियो के हक हित में काम कर रही सदभावना पार्टर्ीीे केन्द्रीय सल्लाहकार राम कुमार दीक्षित का कहना है- कंचन सिंहका यह पहला मामला नहीं है। सन् १८६० के वाद नेपाल से जुडेÞ बाँके, बर्दिया, कैलाली, कञ्चनपुर के नागरिकों के साथ उसी समय से भेदभावपर्ूण्ा एवं अपमानजनक व्यवहार होता चला आ रहा है। सल्लाहकार दीक्षित ने आगे बताया कि हजारों लोग इस अपमानको न सहपाने के कारण से अपनी सम्पत्ति कौडÞी के दामपर बेचकर भारत में पलायन हो चुके हैं और यह क्रम जारी है। तथा जब तक नागरिकता वितरण में समानता नहीं आती है, तब तक समस्या बनी रहेगी।
लेकिन पहली बार जो नागरिकता बनाया गया, वह कारण वश खो गया, तो कञ्चन सिंह ने दूसरी बार नागरिकता की प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिए जिला प्रशासन कार्यालय बाँके में आवेदन दर्ज किया, सूत्रों की मानें तो कञ्चन सिंहका रिकार्ड कार्यालय में उसी समय से गायब है, २०६६ साल में तत्कालीन प्रमुख जिला अधिकारी बानिया ने नागरिकताको वैधानिक बताते हुये टिप्पणी आदेश पर पुनः नागरिकता की प्रतिलिपि देने का आदेश दिया था, लेकिन गजब तो तब हो गया जब हाल ही में वह टिप्पणी आदेश और अनुसूची फारम भी प्रशासन कार्यालय में नहीं मिला।
इस दौरान कञ्चन सिंह ने जमीन नामसारी सम्बन्धी कारोबार भी किया और भू-माफिया के खिलाडियों ने मालपोत कार्यालय बाँके में विदेशी नागरिक बताकर किसी किसिमका कारोबार न करने का दबाव बनाया, लेकिन तत्कालीन मालपोत अधिकृत ने जिला प्रशासन कार्यालय बाँके से नागरिकता के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी लिया और नागरिकताको फिर दूसरी बार बैधानिक बताया गया। इस दौरान जिला प्रशासन कार्यालय बाँके ने लक्ष्मणपुर गा.बि.स. में जाकर स्थलगत र्सजमीन भी किया, जिस मंे पर्ूव गा.बि.स.अध्यक्ष रिजवान अहमद शाह, जिला पंचायत सदस्य हफीजुल्ला खाँ लगायत ३७ ग्रामीणों ने हस्ताक्षर कर नागरिकताको बैधानिक बताया था।
हिमालिनी की टीम ने घटना की गम्भीरताको मध्य नजर करते हुये वास्तविकता की खोज में नेपालगंज से ५५ किलोमीटर दूर राप्तीपार क्षेत्र में जब कञ्चन सिंह के निवास स्थान लक्ष्मणपुर गा.बि.स. वार्ड नं.५ स्थित बेउचहवा गाँव में पहुँची, तो वहाँ का मञ्जर कुछ और ही बयां कर रहा था, लोग यह सुनने को ही तयार नहीं थे कि कञ्चन सिंहका नागरिकता नकली है, गाँव वालों ने बताया कि उनका जन्म इसी गाँव में हुवा है, और प्रापर्टर्ीीे चक्कर में उन्हे फँसाया जा रहा है।  कञ्चन सिंह के एक मात्र बेटे रणजीत सिंह के अनुसार उनके पिता स्व.शिव कुमार सिंह मानसिक रोगी थे, और सन १९७८ से उनका उपचार भारत बरेली स्थित मानसिक अस्पताल में चल रहा था, जिस कारण उनके पिताका भी नागरिकता नहीं बन पाया था। बेटे रणजीत ने हिमालिनीको बताया कि उनकी माँ के खिलाफ भू-माफिया षडयन्त्र वर्षों से चल रहा है और उसीका नतीजा है कि उनकी माँ जेल में हैं।
रणजीत की मानें तो उनकी माँ पर हाल ही में जिला प्रहरी कार्यालय बाँके के किसी अर्सइ ने जाहेरी दिया था और उसी के कारवाही में कञ्चन सिंहको फैसले तक हिरासत में रखने के लिए बाँके जिला आदालत ने आदेश जारी कर दिया। रणजीत के पास भी जन्म दर्ता मात्र है।
क्या अब नागरिकता होना भी खतरे से खाली नहीं – या इसी तरह किसीका भी नागरिकता प्रमाण गायब कर उसे जेल भेजा जा सकता है – इस सवाल पर सहायक प्रमुख जिला अधिकारी चक्रपाणी पाण्डे का कहना है- समस्या इस कारण हो गया कि नागरिकता के लिए जो दर्ता राजिष्टर है उस में कञ्चनका रिकार्ड नहीं है, और जिस साल में उनका नागरिकता बनाया गया उस समय लक्ष्मणपुर गा.बि.स.में मात्र १२ लोगोंका नागरिकता बनाया गया है।
जिला अधिकारी पाण्डे ने आगे बताया- नागरिकता प्रमाण खो जाने पर ही किसीको कर्ीर्ते -जालसाजी) ऐन में नही फसाया जा सकता, कञ्चनका रिकार्ड कहीं पर मिसिंग है, अनुसन्धान चल रहा कुछ नक ुछ तथ्य बाहर जरुर आएगा कि प्रमाण खो गया है या किसी ने खो दिया है। बाँकी कञ्चन पर मुकदमा अदालत में विचाराधीन है ही, अदालत भी विचार किए विना कोई निर्ण्र्ाातो नहीं लेगी।
इस घटना के वाद हर नेपाली नागरिकको चौकन्ना रहने की जरुरत है, क्यों कि देशका नागरिक बने रहनेका आधार नागरिकता ही है अगर उसपर किसी प्रकारकी चाल हो रही है तो ऐसे अपराध के खिलाफ हर नागरिकका र्फज बनता है कि वे अपने स्तर से पहल शुरु करें।

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