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मिथिलाञ्चल का महान् पर्व सामा चकेवा शुरु

 

जनकपुरधाम, १२ नवम्बर । भाई–बहन के बीच घनिष्ठ संबंध को दर्शनेवाला मिथिलाञ्चल बासियों की महान् त्यौहार सामा चेकवा सोमबार से शुरु हुआ है । यह पर्व ८ दिन तक मनाया जाता है । ८ दिन तक मिथिलाबासी बाहन अपने भाई के दीर्घायू के कामना करते हुए सामा चेकवा गीत गाती है । इसका बर्णन पुरानों में भी मिला है । सामा – चकेवा एक कहानी है । कहते हैं की सामा कृष्ण की पुत्री थी, जिनपर अवैध सम्बन्ध का गलत आरोप लगाया गया था । जिसके कारण सामा के पिता कृष्ण ने गुस्से में आकर उन्हें मनुष्य से पंक्षी बन जाने की सजा दे दी । लेकिन अपने भाई चकेवा के प्रेम और त्याग के कारण वह पुनः पंक्षी से मनुष्य के रूप में आ गयी ।

क्या होता है इस पर्व में ?

शाम होने पर युवा महिलायें अपनी संगी सहेलियों की टोली में मैथिली लोकगीत गाती हुईं अपने–अपने घरों से बाहर निकलती हैं । उनके हाथों में बाँस की बनी हुई टोकड़ियाँ रहती हैं । टोकड़ियों में मिट्टी से बनी हुई सामा–चकेवा की मूर्तियाँ, पक्षियों की मूर्तियाँ एवं चुगिला की मूर्तियाँ रखी जाती है । मैथिली भाषा में जो चुगलखोरी करता है उसे चुगिला कहा जाता है । मिथिला में लोगों का मानना है कि चुगिला ने ही कृष्ण से सामा के बारे में चुगलखोरी की थी । सामा खेलते समय महिलायें मैथिली लोक गीत गा कर आपस में हंसी–मजाक भी करती हैं । भाभी ननद से और ननद भाभी से लोकगीत की ही भाषा में ही मजाक करती हैं । अंत में चुगलखोर चुगिला का मुंह जलाया जाता है और सभी महिलायें पुनः लोकगीत गाती हुई अपने – अपने घर वापस आ जाती हैं । ऐसा आठ दिनों तक चलता रहता है । यह सामा–चकेवा का उत्सव मिथिलांचल में भाई–बहन का जो सम्बन्ध है, उसे दर्शाता है । यह उत्सव यह भी इंगित करता है कि सर्द दिनों में हिमालय से रंग–बिरंग के पक्षियाँ मिथिलांचल के मैदानी भागों में आ जाते हैं ।

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बदलते समय के साथ आया है बदलाव

पहले महिलायें अपने हाथ से ही मिट्टी की सामा – चकेवा बनाती थीं । विभिन्न रंगों से उसे सवांरती थी । लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं होता है । अब बाजार में रंग–बिरंग के रेडीमेड मिट्टी से बनी हुई सामा–चकेवा की मूर्तियाँ उपलब्ध हैं । महिलायें इसे ही खरीदकर अपने घर ले आती हैं । लेकिन अब मिथिला की इस संस्कृति पर , ऐसी लोकगीतों पर , ऐसी लोक नृत्यों पर लोगों की आधुनिक जीवनशैली के द्वारा, एकल परिवार में बृद्धि के द्वारा एक प्रकार से चोट पहुंचाया जाने लगा है तथा रोजगार के कारण लोगों के अन्यत्र रहने से अब महिलायें सामा–चकेवा का उत्सव नहीं मनाती हैं । कहीं–कहीं हम सामा–चकेवा के अवसर पर गांवों की सड़कों पर , शहरों की गलियों में सामा–चकेवा के गीत सुनते हैं । अब यह उत्सब साधारण नहीं रहा ।

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आठ दिनों तक मनाया जाता है

सामा–चकेवा का उत्सव पारंपरिक लोकगीतों से जुड़ा है । यह उत्सव मिथिला के प्रसिद्ध संस्कृति और कला का एक अंग है जो सभी समुदायों के बीच व्याप्त सभी बाधाओं को तोड़ता है । यह उत्सव कार्तिक शुक्ल पक्ष से सात दिन बाद शुरू होता है । आठ दिनों तक यह उत्सव मनाया जाता है , और नौवे दिन बहने अपने भाइयों को धान की नयी फसल की चुरा एवं दही खिला कर सामा–चकेवा के मूर्तियों को तालाबों में विसर्जित कर देते हैं । गाँवों में तो इसे जोते हुए खेतों में विसर्जित किया जाता है ।

क्या है कहानी इस पर्व की

सामा–चकेवा के उत्सव का सम्बन्ध सामा की दुःख भरी कहानी से है । सामा कृष्ण की पुत्री थी । जिसका बर्णन पुरानों में भी किया गया है । कहानी यह है कि एक दुष्ट चरित्र बाला व्यक्ति ने एक योजना रची । उसने सामा पर गलत आरोप लगाया कि उसका अबैध सम्बन्ध एक तपस्वी से है । उसने कृष्ण से यह बात कह दिया । कृष्ण को अपनी पुत्री सामा के प्रति बहुत ही गुस्सा हुआ । क्रोध में आकर उसने सामा को पंक्षी बन जाने का श्राप दे दिया । सामा अब मनुष्य से पंक्षी बन गयी ।
जब सामा के भाई चकेवा को इस प्रकरण की पुरी जानकारी हुई तो उसे अपनी बहन सामा के प्रति सहानुभूति हुई । अपनी बहन को पंक्षी से मनुष्य रूप में लाने के लिए चकेवा ने तपस्या करना शुरू कर दिया । तपस्या सफल हुआ । सामा पंक्षी रूप से पुनः मनुष्य के रूप में आ गयी । अपने भाई की स्नेह और त्याग देख कर सामा द्रवित हो गयी । वह अपने भाई की कलाई में एक मजबूत धागा राखी के रूप में बाँध दी । उसी के याद में आज बहनें अपनी भाइयों की कलाई में प्रति वर्ष बांधती आ रही हैं ।

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यह है समा–चकेवा गीत–

गामके अधिकारी तोहे बरका भैया हो
भैया हातदश पोखरी खुनाइ दिय, चम्पा फूल लगाइ दिय
सामचको सामचको ऐहा हो
ऐहा हो
गुँढ खेतमे भसिया हो

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