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हाली साहित्य में नारी चेतना ! : रचनासिंह”रश्मि”

रचनासिंह”रश्मि”, आगरा उ.प्र | हाली साहित्य में नारी की भागीदारी जिस तेजी से हो रही है उसे देखते हुए नारी की अभिव्यक्ति की सामर्थ्य पर हैरान होने वाली कोई बात नहीं है!आज के दौर में महिलाओं ने पुरुष के मुकाबले साझेदारी निभाई है ! महिलाओं के अंदर बढ़ती चेतना और जागरूकता ने पारम्परिक छवि को तोडा है!!
देखा जाये तो हाली साहित्य में काफी बदलाव आया है
हाली साहित्य में या यूँ कहे !अब महिला कमजोर नही रही।महिला साहित्यकार ऐसे विषय पर भी लिखने.लगी है जिसके बारे मे बात करना भी बुरा माना जाता था नारी का जीवन बहुत ही संघर्ष से विरत है महिला साहित्यकार के लिए सबसे पहले बाहरी संदर्भो में उसका आंतरिक समय होता है जहां वो जीती है और सांस लेती है ,और वही दूसरी और होती है समय की चुनौतियां जिससे वो बिलकुल परे होती है उनके जीवन वे सृजन के बीच अनवरत की स्थिति बनी रहती है ,उनकी राह आसान नहीं है उनकी राह में बहुत सी विचारधाराएं वे दुविधाएं है!
साहित्य जब तक मौखिक परम्परा का हिस्सा था तब तक लेखन में स्त्रियों का योगदान बराबरी के स्तर पर रहा ,परन्तु इतिहास के पन्नो में उनका जिक्र भी नहीं किया गया क्योंकि उन्हें कोई जगह नहीं मिली ,अगर नारी के योगदान का मूल्यांकन साहित्य में करना हो तो वह किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है !
आज के दौर में महिलाओं ने पुरुष के मुकाबले साझेदारी निभाई है !महिला साहित्यकारों के अंदर बढ़ती चेतना और जागरूकता ने पारम्परिक छवि को तोडा है !!
समस्त महिला साहित्यकार स्त्री काया जनित वेदना और विद्रोह को अभिव्य्क्त करती है चाहे वो मीरा हो या लल्लेश्वरी भक्ति में भिगोई इनकी दमनकारी व्यवस्था के प्रति आक्रोश को सेहज ही पहचाना जा सकता है !!
हाली साहित्य की विभिन्न विधाओं में महिलाओं से कोई क्षेत्र अछूता नहीं रहा !
महिला लेखन की सबसे बड़ी खासयित यह है क़ि वे आज पुरुष सत्तात्मक समाज में अपनी बेबाक अभिव्यक्ति का साहस जुटा पायी है !!
नारी लेखन में मुक्ति के स्वर उभरे वह नारी जिसे पुरुषों ने सती सावित्री का झोला पहना रखा था ! नारी एक स्वप्न लोक में बसी एक खूबसूरत देह थी , एक ऐसी देह जिसके अंदर कोई भावना नहीं होती ,एक बेजान देह जो कभी किसी चीज की आशा नहीं करती !!
अपने अंदर भावनाओं को छुपा कर रखती है !!जिसे पुरुष प्रधान बनकर स्त्री को अपने इशारों में नचा सकता है !
नारी भावनाओं की यह अभिव्यक्ति जो कई सदियों से भीतर ही भीतर छटपटा रही थी और हाली के नारी लेखन में ही अभिव्यक्त हुई !
आज के समय में जहां तक देखा गया है की भारत में महिलाओं की स्थिति ने पिछले कुछ सदियों में कई बड़े बदलावों का सामना किया है महिलाओं ने प्राचीन काल में पुरुषों के साथ बराबरी के स्तरीय जीवन और सुधारकों द्वारा सामान अधिकारों को बढ़ावा दिए जाने तक भारत में महिलाओं का इतिहास काफी गतिशील रहा !!
नारी साहित्य लेखन एक और स्वातः सुखाय है तो दूसरी ओर जन हिताय है नारी साहित्य इस परिवर्तन युग का शुभचिंतक है।
यद्यपि महिला लेखन आज स्पर्धा के युग में चुनौती है। फिर भी उसे हर स्थिति का सामना करने में उसे किसी वैसाखी की जरूरत नहीं। अपितु वह स्वयं मार्ग ढूंढ स्वयं अपने हस्ताक्षर बना रही है।
अत्यंत सयंत व शालीन बने रहकर सृजन करना भी एक चुनौती है। महिला रचनाकार ऐसा करती आ रही हैं। निर्भयतापूर्वक सोचना और लिखना होगा आज की यह जरूरत है।
हम चुनौतियों में तब ही सफल हो सकती हैं जब हम अपने सामाजिक सरोकार के हिसाब से किसी न किसी रूप में एक्टिविस्ट हो साथ में घर गृहस्थी भी सफलता से निभाएं! सृजन की शक्ति उसके पास है जो उसके लेखकीय सरोकार को नवीन अभिव्यक्ति की क्षमता देती आई है और देती रहेगी।
इसलिए विरोध-अवरोध तिरस्कार-बहिष्कार को नकारते हुए उसे आगे आना होगा। तब ही समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है और अपनी सार्थकता को सिद्ध भी।
हमें ठोस चिन्तन का प्रमाण देना है व इस दंभ से बचना होगा कि चूंकि स्त्री है अतः स्त्री समस्याओं या भावनाओं को वही बेहतर समझ सकती है। वह सृजन के क्षेत्र में पैर रख रही है न कि किसी रणक्षेत्र में। नारी मुक्ति का संघर्ष लम्बा है और इसे मुख्यतः स्वयं नारी को लडना है। लेकिन यह लडाई पुरुष वर्ग के विरुद्ध न होकर व्यवस्था के अन्तर्विरोधों व पुरुष प्रधान समाज से निथरे नारी विरोधी अवमूल्यों के प्रति होनी चाहिए! समाज व अपनी संस्कृति से जुडी वर्तमान परिवेश की चुनौतियां स्वीकार करके ही महिला सृजन सफल हो रहा है !
बहुत प्रसन्नता की बात है। हाली साहित्य में स्त्री लेखन की चर्चा अब हर जगह होने लगी है। यह निश्चय ही महिला रचनाकारों के बढते महत्त्व को रेखांकित करता है।

रचनासिंह”रश्मि”

रचनासिंह”रश्मि”

आगरा उ.प्र

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