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मधेश और मधेशी दलों पर चीन का बढ़ता प्रभाव : डा. श्वेता दीप्ति

 

डा. श्वेता दीप्ति, काठमांडू | मधेश के लिए आम तौर पर यह धारणा सदा से रही है कि, मधेश भारत के करीब है । जबकि अगर मधेश के आम नागरिकों की मनःस्थिति का जायजा लें तो भारत के प्रति उनकी रुष्टता ज्यादा समझ में आती है । यह रुष्टता राजनीतिक स्तर से अधिक भावनात्मक स्तर पर है । सच तो यह है कि मधेशी की स्थिति हमेशा दोलायमान रही है । देश का एक पक्ष अधिकतर मधेशियों को बिहारी या भारतीय कह कर अवहेलना करता आया है जिसकी वजह से मधेशी वर्ग को सदैव अपनी राष्ट्रीयता सिद्ध करनी पड़ती है । जिस वजह से मधेशी अवहेलित हैं वहाँ से उन्हें सहयोग और सद्भाव की अपेक्षा हमेशा रही है परन्तु ऐसा हुआ नहीं है । मधेश के विकास के लिए मधेश भारत से जो अपेक्षा रखता आया है, उसकी पूर्ति न्यूनतम स्तर पर होती है । ऐसे में भावनात्मक स्तर पर आम जनता आहत होती आई है । पर राजनीति का अखाड़ा तो इन भावनाओं से परे होता है । जहाँ अवसर का महत्व होता है भावनाओं की नहीं ।

इस धारणा से विपरीत आज की स्थिति कुछ अलग माहोल बयान कर रही है, जहाँ के परिदृश्य में बदलाव दिख रहा है । कल तक भारत से करीबी रहने का दोष जिन पर लग रहा था आज वो चीन के ज्यादा करीब नजर आ रहे हैं । कुछ दिनों पहले संघीय समाजवादी फोरम नेपाल की उपाध्यक्ष रेणु यादव की २० सदस्यीय टीम चीन यात्रा पर गई हुई थी । यह शायद पहली बार हुआ था कि किसी एक ही पार्टी के इतने नेता चीन भ्रमण पर गए हों । किन्तु राजपा अब तक इस में शामिल नही हुई है । यूँ तो सत्तासीन होने के बाद प्रायः हर एक पार्टी के सदस्य चीन यात्रा पर जाते रहे हैं, पर राजपा अब तक इस मोह से मुक्त रही है । आमंत्रण मिलने के बाद भी ये परहेज करते आए हैं शायद इसके पीछे भारत के प्रति इनका सद्भाव रहा हो । लेकिन वर्तमान में एक परिवर्तन नजर आ रहा है कि यात्रा भले ही नहीं की गई हो किन्तु चीन से राजपा नेताओं की भी नजदीकी बढ़ रही है और इनके सम्बन्ध अच्छे हो रहे हैं । शायद मधेश की धीमी गति का विकास इस मानसिकता के पीछे हो या मोहभंग की स्थिति हो परन्तु यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि इनकी मनोदशा बदली है । मधेशी नेताओं का चीनी दूतावास जाने का क्रम भी बढ़ा है और मधेश के विकास के लिए चीनी प्रोजेक्ट तथा अनुदान भी लाया जा रहा है ।विगत को देखें तो आलम यह था कि, मधेश के नेता चीनी अनुदान लेने से पहले हिचकते थे पर आज यह स्थिति नहीं है । मधेश जब कोशी के कहर से गुजर रहा था और उस वक्त हर ओर से सहयोग के हाथ बढे थे, तब भी चीन ने जब राजपा नेपाल के अध्यक्ष महंथ ठाकुर से राहत सामग्री वितरण का सहयोग माँगा था तो, अध्यक्ष ठाकुर तुरंत इस विषय पर सहमति नहीं दे पाए थे । हालाँकि बाद में उन्होंने सहमति भी दी और सहयोग भी मिला । तब यह चर्चा भी सामने आई थी कि, इस सहमति के पीछे भारतीय दूतावास की रजामंदी भी थी । बात चाहे जो भी हो पर यह तो स्पष्ट है कि, पहले जो सहायता भीतरी तौर पर ली जाती थी आज वह खुले तौर पर ली जा रही है । यह बदलाव का एक संकेत है । हालाँकि आज भी यह माना जा रहा है कि ससफो चीन के जितने करीब है उतना करीब अब तक राजपा नही हो पाई है ।

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मधेश और चीन के सम्बन्धों में जो परिवर्तन आया है उसके सूत्रधार चीन में रह रहे धनुषा के डा. राजीव झा को माना जा रहा है । सूत्रों के अनुसार ‘चाइना नेपाल फ्रेन्डसिप मेडिकल रिसर्च सेन्टर’ के निर्देशक रहे डा. झा राजपा नेपाल के नेताओं के साथ निरन्तर समपर्क में हैं और इस रिशते को मजबूती प्रदान करने की दिशा में प्रयत्नशील हैं जिसमें काफी हद तक उनहें सफलता भी मिली है । डा. झा नेकपा अध्यक्ष प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नजदीकी भी माने जाते हैं । इस नजदीकी का एक और अहम मुद्दा संविधान संशोधन भी है । मधेश केन्द्रीत सभी दलों का एक महत्वपूर्ण मुद्दा है संविधान संशोधन । जो आज तक समभव नहीं हो पाया है । जिसके लिए प्रधानमंत्री की ओर से कोई आश्वासन नही मिला है । संविधान संशोधन के लिए तो प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि संविधान संशोधन फैशन बन गया है । पर इसी संवेदनशील मुद्दे पर यह माना जा रहा है कि चीन की ओर से पहल करने का आश्वासन मधेशी दलों को मिला है जो इनके नजदीक होने का एक महत्तवपूर्ण कारक तत्व है । वैसे यह आश्वासन भारत की ओर से भी मिला था पर सफलता आज तक हाथ नही लगी है । राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विषय में राजपा नेताओं का मोहभंग हुआ है उन्हें लगने लगा है कि उनका अस्तित्व दाँव पर लगा हुआ है और जिनसे अपेक्षा थी वहाँ से निराशा ही हाथ आ रही है । इसलिए उनका झुकाव चीन की ओर हो रहा है क्योंकि वर्तमान सरकार चीन के ज्यादा नजदीक है यह सर्वविदित है । इसलिए यह अपेक्षा की जा रही है कि शायद चीन द्वारा पहल किए जाने पर संविधान संशोधन सम्भव हो सके । मधेश जिस विकास की राह देख रहा है उसके लिए वो किसी से भी लाभ लेने की स्थिति में है और इस दृष्टिकोण से मधेशवादी दलों की बदलती मानसिकता सामयिक मानी जारही है ।

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