गरिमा चौधरी दुष्कर्म-हत्या मामला: संसद में सरकार पर तीखा हमला, पीड़िता को न्याय देने की मांग
बारा की मासूम बालिका गरिमा चौधरी के दुष्कर्म और हत्या के मामले को लेकर सोमवार को प्रतिनिधि सभा की बैठक में जोरदार बहस हुई। आकस्मिक समय में बोलने वाले अधिकांश सांसदों ने सरकार पर पीड़िता को न्याय दिलाने के बजाय दिखावटी कदम उठाने का आरोप लगाया।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के महामंत्री और सांसद विपिन कुमार आचार्य ने गृह मंत्रालय द्वारा गरिमा के माता-पिता को काठमांडू बुलाकर उनसे धन्यवाद दिलवाने का वीडियो बनाकर सार्वजनिक किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई।
उन्होंने कहा, “हम कैसा समाज बना रहे हैं, जहाँ एक ओर मृतक बच्ची के माता-पिता का धन्यवाद वाला वीडियो मंत्रालय में रिकॉर्ड किया जाता है और दूसरी ओर आरोपी किशोर के बयान का वीडियो सार्वजनिक कर दिया जाता है। सरकार को प्रचार नहीं, न्याय सुनिश्चित करने का माहौल बनाना चाहिए। ऐसी गतिविधियाँ तुरंत बंद होनी चाहिए।”
वहीं नेपाली कांग्रेस की सांसद प्रमिला गच्छदार ने कहा कि एक मासूम बच्ची की जान की कीमत कुछ लाख रुपये का चेक नहीं हो सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पीड़ित परिवार से समझौता कर मामले को दबाने की कोशिश कर रही है और इस संबंध में चार प्रमुख मांगें रखीं।
उन्होंने मांग की कि यदि दुष्कर्म के बाद हत्या साबित होती है तो दोषी को वास्तविक आजीवन कारावास दिया जाए, दुष्कर्म मामलों में कानूनी समय-सीमा (हद-म्याद) पूरी तरह समाप्त की जाए और ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालत में तीन से छह महीने के भीतर पूरी की जाए।
सांसद श्रद्धा कुँवर क्षेत्री, बलावती शर्मा, शाहजान खातुन और राधिका रम्तेल ने भी कहा कि बालिकाएँ और महिलाएँ अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने अपराधियों में कानून का भय पैदा करने के लिए कठोर कानूनी व्यवस्था लागू करने और मुआवजा देकर मामलों को दबाने की प्रवृत्ति समाप्त करने की मांग की।
इसके अलावा सांसद ज्ञानबहादुर शाही, रञ्जु न्यौपाने, डॉ. ललिता कुमारी, नीनु कुमारी कर्ण और प्रमिला कुलुजु ने भी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि गरिमा चौधरी और खुशी खातुन जैसी मासूम बच्चियों की हत्या के बावजूद प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं।
सांसदों ने सरकार से प्रमुख मांगें रखीं:
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दुष्कर्म मामलों में कानूनी समय-सीमा (हद-म्याद) पूरी तरह समाप्त की जाए।
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बालिका दुष्कर्म और हत्या के मामलों के लिए अलग फास्ट ट्रैक विशेष अदालत बनाई जाए।
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प्रत्येक जिले में आधुनिक फॉरेंसिक लैब और प्रशिक्षित जांच टीम की व्यवस्था की जाए।
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पीड़ित परिवारों को समझौते या राहत के नाम पर न्याय से वंचित करने की प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगाई जाए।


