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परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता  किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता बशीर भद्र

 
अवाम के चहेते शायर बशीर भद्र के शेर जिसे भारतीय संसद में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुहराए – ‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजायश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’ ये लाइनें हैं मशहूर शायर बशीर बद्र की, जिनका आज 15 फरवरी 83वां जन्मदिन है।
 
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्ति‍यां जलाने में  
सोचा नहीं अच्छा बुरा, देखा सुना कुछ भी नहीं 
मांगा खुदा से रात-दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं 
वो सादगी, न करे कुछ भी तो अदा ही लगे 
वो भोलापन है के बेबाक की भी हया ही लगे 
पत्थर मुझे समझता है मिरा चाहने वाला 
मैं मोम हूं उसने मुझे छूकर नहीं देखा 
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता 
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता 
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो 
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए  
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले लगोगे तपाक से 

ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा

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दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे

बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला

किसी को ग़ज़लगोई, शेरो-शायरी के शौक़ हो तो बशीर साहब की ग़ज़लें मोकम्मल उसे पूरा डालती हैं। सरल भाषा में अपनी बात, अपने भाव और एहसास को आम आदमी तक पहुंचा देना बहुत बड़ी कला है और बशीर में ये प्रतिभा कूट-कूटकर भरी है। ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने में बशीर का नाम अगली पंक्तियों में शुमार है। बशीर साहब की भाषा में वो रवानगी मिलती है जो बड़े-बड़े शायरों में नहीं मिलती। बशीर साहब कठिन भाषा के इस्तेमाल से हमेशा बचते थे और यह कहा भी करते थे कि फारसी और उर्दू के इस्तेमाल भर से सिर्फ शायरी ग़ज़ल नहीं बनती बल्कि ज़मीनी भाषा यानि आम आदमी जो ज़बान बोलता है, जिसमें वो बातें करता है, उसी में ग़ज़ल या शायरी भी सुनना-पढ़ना पसंद करता है, और तभी कोई रचना अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचती है। ग़ज़ल अपने अंदर गहरे एहसासों को समेटे हुए होती है, इसलिए वो ऐसी भाषा में कही जानी चाहिए कि लोगों के ज़हन में उतर जाए ।

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