Wed. Oct 23rd, 2019

सी.के. राउत का मुख्य मुद्दा यह उजागर करना था कि नेपाल का ‘योग्य नागरिक’ कौन है : गीता कोछड़ जायसवाल

नेपाल के योग्य नागरिक और अयोग्य नागरिक : मधेसियों का बहिष्कार

डॉ. गीता कोछड़ जायसवाल | नेपाल लंबे समय से शक्तियो में तीव्र संघर्ष का एक स्थान रहा है, जिसने अस्थिरता के कारकों को जन्म दिया है। हालांकि, पिछले आम चुनावों में नए सत्ता गठबंधन और कम्युनिस्ट समामेलन की एकजुट जीत ने नेपाल के भविष्य में परिवर्तन का संकेत दिया, फिर भी, समाज के कुछ वर्गों में असंतोष रहा और बहुमत से टकराने वाले कुछ तत्व सक्रिय रहे।’राष्ट्रविरोधी’ प्रवचन के बढ़ने से और सरकार की सख्ती के टकराव के चलते, नई वास्तविकताओं से निपटने के लिए दृष्टिकोणों में एक नया बदलाव आया है। वास्तविकताओं ने नेपाली सरकार और उसके नेताओं पर आंतरिक और बाहरी दोनों तरह के दबाव डाले। चुनौतियों को इस तथ्य से रेखांकित किया गया था कि नेपाली समाज में दरारें मौजूद थीं, जो संस्कृति और आत्मीयता के आधार पर लोगों को अलग करती थीं। यह विभाजन आधिकारिक तौर पर नेपाल के संविधान में निहित था, जिसने लोगों और समुदायों को उनकी योग्यता की पहचान के आधार पर रेखांकित किया था।

जैसे ही कुछ समुदायों के इस विच्छेदन की कथा को नेपाल के सामुदायिक संवाद में समेकित किया, कई नेताओं ने नेपाल के विभिन्न हिस्सों में उन मुद्दों के चलते अपनी जगह बनायी। उनकी आवाज़ों ने लोगों पर मानवाधिकार अत्याचार का मुद्दा उठाया और लोकतांत्रिक प्रणाली में ‘बोलने की स्वतंत्रता’ के बहुत सारे सवाल उठाए। राज्य के साथ इस झगड़े ने डॉ. सी. के. राउत जैसे नेता को एक ‘अलग क्षेत्र’ होने की मांग पर स्वतंत्र आवाज़ के रूप में उभरने दिया और राज्य के विभाजन की बात निकली। हालांकि, कई आवाजें समर्थन में शामिल नहीं हुईं, लेकिन विशेषकर नेपाल के तराई क्षेत्र में अंतर-पक्षीय संघर्ष और विवादों के कारण जन आधार मजबूत हुआ। डॉ. सी. के. राउत ‘स्वतंत्र मधेश’ के लिए एक खुले आह्वान के साथ स्व-घोषित शांतिपूर्ण विरोध की वकालत करने वाले एक अंतरराष्ट्रीय लोकप्रिय व्यक्ति बन गए। सदियों से स्थानीय लोगों में कुछ चुनिंदा लोगों और समुदायों के लिए “द्वितीय श्रेणी के नागरिक” जैसे भेदभाव और असमान व्यवहार के प्रति असंतुष्टि थी। नेपाल के कुलीन वर्ग की व्यवस्था में ‘अयोग्य नागरिक’ होने की धारणा, मधेसी, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के समुदायों में फैल गई। डॉ. सी. के. राउत को देशद्रोह के आरोप में सलाखों के पीछे डाल दिया गया, जिससे उनकी रिहाई की उम्मीदें लगभग असंभव लग रही थीं।

लेकिन अभी कुछ दिन पहले ही, डॉ. सी. के. राउत ने ओली सरकार के साथ 11-सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए। जिससे मुख्यधारा की राजनीति में ‘जनमत’ नामक नई पार्टी का गठन हुआ। मुख्यधारा में उनके शामिल होने से नेपाली समाज में ‘क्या स्वीकार्य है और क्या स्वीकार्य नहीं है’ इस पर गहन बहस होने लगी है। डॉ. सी. के. राउत के पूरे अभियान का मुख्य मुद्दा यह उजागर करना था कि नेपाल का ‘योग्य नागरिक’ कौन है। उन्होंने कुलीन पहाड़ी शासकों और शासन के बीच के अंतर को उजागर किया था। ‘स्वतंत्र मधेश’ के उनके प्रस्ताव को कई युवाओं का समर्थन हासिल हुआ। इसका मुख्य कारण था सदियों से चलती आ रही विभिन्न वर्गों में विशेषाधिकार प्राप्त और वंचित समुदायों के बीच का विभाजन।

एक विशेष समुदाय से संबंधित होने का कलंक, या जातीय रूप से एक अलग समूह से संबंधित होना, जो कि शासक से  संबंधित नहीं है, इस पूरे कथन ने नेपाल के सारे समाज को पूर्ण रूप से विभाजित कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि कम्युनिस्ट विचारधारा नेपाली समाज में इन सामाजिक विरोधाभासों और विभाजन को जड़ से खत्म करने के लिए लोकप्रिय हुए थे। माओवादी क्रांति (या माओवादी उग्रवाद) बड़े पैमाने पर समतामूलक समाज के भविष्य के सपने के लिए जनता द्वारा समर्थन प्राप्त किया था। हालाँकि, एक शांति प्रक्रिया और परिणामी चुनावी लोकतंत्र की ओर बढ़ने से कई निहित स्वार्थी समूह बने जो समाज में कमजोरियों का लाभ उठाने लगे। यहाँ तक कि 2015 में नए संविधान के उद्घोषणा ने सत्ता समीकरणों में गंभीर असंतुलन और निहित स्वार्थी समूहों में दरार को प्रदर्शित किया। भावुक प्रकोपों ​​ने असामान्य गठबंधनों को उजागर किया और कई व्यक्तियों की उम्मीदों का ख़त्म कर दिया।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के एकजुट शक्ति के गठन और सत्ता में बहुमत के प्रतिनिधित्व के रूप में आने के पश्चात, उपेक्षित समुदाय सबसे अधिक ‘अयोग्य नागरिक’ बन गए हैं, क्योंकि उनके आंतरिक विरोधाभासों ने खेल के नियमों को निर्धारित करने के लिए वैकल्पिक शक्तियों के लिए स्थान बना दिया हैं। समतामूलक समाज और न्यायसंगत अधिकारों की मांग करने वाले सभी प्रगतिशील और हिंसक शक्ति केंद्रों को अपवर्जन कर दिया गया है। इसलिए, रेशम चौधरी को अपराधों के लिए दंडित किया गया है; जबकि शक्ति केंद्र के शीर्ष पर कई लोगों की नियति निर्विरोध है। इन दोष रेखाओं में, प्रगतिशील हिंसक आवाज़ वाले कई अन्य वैचारिक समूहों की गतिविधियों पे भी प्रतिबंध लगाया गया है। बिप्लव के नेतृत्व की कम्युनिस्ट पार्टी का मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है।

नेपाली समाज में एक ‘श्रेष्ठ बुद्धिजीवी’ के गुणों की चर्चा के लिए भी राजनीतिक झगड़े ने एक प्रवचन खोल दिया है। इस विचारधारा के चलते अब यह तय होगा कि उच्च पदानुक्रम की कुर्सी के लिए कौन सही मायनों में अधिक हकदार हैं, और कौन अलग-थलग, बहिष्कृत और वंचित रहेंगे। यह पूर्व पीएम बाबूराम भट्टाराई की कथनी में दृढ़ता से प्रकट हुआ है, जिसके तहत वह प्रचंड को असामान्य नेता के रूप में देखते हैं, जो किसी भी दृश्यमान या आगामी नेता के लिए अतुलनीय है। अब मुद्दा यह है कि उपेक्षित समुदाय के लोग कुछ कुलीन वर्ग के लोगों की दया पर जीते रहेंगे या फिर मधेसी पार्टियों के बीच और भीतर नए संघर्ष के साथ ये सत्ता समीकरण बदल जाएगा। आने वाले कुछ समय में देखा जाए तो, वैकल्पिक दलों का उदय और नए गठबंधन वर्तमान में स्थापित व्यवस्था के लिए कोई चुनौती नहीं हैं। इसलिए, नेपाली समाज के अत्यधिक परिवर्तन का कोई संकेत नहीं है। फिर भी, परिवर्तन की मांग का भारी प्रभाव पड़ रहा है। जब तक राज्य यह स्वीकार नहीं करता कि नेपाल के उपेक्षित क्षेत्रों में ‘योग्य नागरिक’ हैं और उनकी सामंजस्यपूर्ण शक्ति राज्य की स्थिरता के लिए एक चुनौती बन सकती है, तब तक उभरती हुई ये आवाजें अशांति के अंधेरों में गुम हो जाएंगी और शोषक शक्तियां दबे हुए समुदायों पर शासन करती रहेंगी।

Geeta Kochad Jayaswal
डा. गीता कोछड़ जायसवाल

लेखक-जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर है।

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