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कौन अच्छा है इस ज़माने में क्यूँ किसी को बुरा कहे कोई : नासिर रज़ा काज़मी

 

आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के संस्थापकों में से एक। भारत के शहर अंबाला में पैदा हुए और पाकिस्तान चले गए जहाँ बटवारे के दुख दर्द उनकी शायरी का केंद्रीय विषय बन गए।

अकेले घर से पूछती है बे-कसी

तिरा दिया जलाने वाले क्या हुए

अपनी धुन में रहता हूँ

मैं भी तेरे जैसा हूँ

आँच आती है तिरे जिस्म की उर्यानी से

पैरहन है कि सुलगती हुई शब है कोई

आज तो बे-सबब उदास है जी

इश्क़ होता तो कोई बात भी थी

आज देखा है तुझ को देर के बअ’द

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आज का दिन गुज़र जाए कहीं

आरज़ू है कि तू यहाँ आए

और फिर उम्र भर जाए कहीं

इस क़दर रोया हूँ तेरी याद में

आईने आँखों के धुँदले हो गए

इस शहर-ए-बे-चराग़ में जाएगी तू कहाँ

शब-ए-फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें

उन्हें सदियों भूलेगा ज़माना

यहाँ जो हादसे कल हो गए हैं

उम्र भर की नवा-गरी का सिला

ख़ुदा कोई हम-नवा ही दे

उस ने मंज़िल पे ला के छोड़ दिया

उम्र भर जिस का रास्ता देखा

एक दम उस के होंट चूम लिए

ये मुझे बैठे बैठे क्या सूझी

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दोस्त हम ने तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद

महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी

मेरे मसरूफ़ ख़ुदा

अपनी दुनिया देख ज़रा

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें

आए हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें

कभी ज़ुल्फ़ों की घटा ने घेरा

कभी आँखों की चमक याद आई

कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा

रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है

कहते हैं ग़ज़ल क़ाफ़िया-पैमाई है ‘नासिर’

ये क़ाफ़िया-पैमाई ज़रा कर के तो देखो

कौन अच्छा है इस ज़माने में

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क्यूँ किसी को बुरा कहे कोई

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो

गिरफ़्ता-दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने

ख़ुदा करे कोई तेरे सिवा पहचाने

चुप चुप क्यूँ रहते हो ‘नासिर’

ये क्या रोग लगा रक्खा है

 

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए

तुझे भी नींद गई मुझे भी सब्र गया

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए

तुझे भी नींद गई मुझे भी सब्र गया

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