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मधेस भूमि सातवीं शताब्दी में हिमालय तक फैला हुआ था : दिनेश्वर गुप्ता

 

सिरहा, १५ अप्रैल ।

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मधेस का इतिहास बयाँ करता है कि उसकी अपनी एक अलग पहचान रही है पर कुमाउ गढ्वाल से आए हुए नव प्रवेशी इस बात को मानने से इनकार कर रहे हैं जिसकी मुख्य वजह है उनका डर और घबराहट । इतिहास का अगर पन्ना पल्टाए तो हम भौचक्के रह जाएङ्गे । मधेस इतिहास  की जमीनी सच्चाई यह है कि यह पवित्र भूमि दक्षिण गङ्गा से लेकर उत्तर हिमालय  तक फैला हुवा था । सिरहा का सल्हेस गहबर और पोखरीयागढ इस बात को प्रमाणित करता है कि मधेस आज से करीब १४०० वर्ष पहले एक शक्तिशाली राज्य हुवा करता था । राजा सल्हेस की कहानी लाहान पोखरीयागढ के साथ जुडी हुई है । सलहेश के साथ जुडे लहान पोखरीयागढ मे बैशाख २ गते मेला लगता आ रहा है । इतिहास ये कहता है कि पोखरीयागढ मे राजा कुलहेश्वर राज करते थे । राजा कुलहेश्वर सोना के हल से अपने खेत जोता करता था । उनकी बेटी राजकुमारी चन्द्रावती राजा सलहेस के साथ प्रेम करती थी पर शादी नही हो पायी क्याेंकि राजा कुलहेश्वर का नौलखा उसवक्त चोरी हो गया । चोरी का आरोप राजा सलहेस पर लगा पर बाद में सच्चाई यह सामने आया कि उक्त हार चोहरमल ने चोरी की थी । जिसके कारण राजा सलहेश खफा हो गए और शादी से इनकार किया । हार कुछ समय तक दरभंगा महाराज के दरबार मे रहा । दरभंगा महाराज उक्त हार मराठा बाजीराव पेशवा से खरीदे थे । इससे पहले बाजीराव १८५७ के क्रान्ति के वाद नाना साहेब पेशवा हार लेकर मधेस आए और उनहोने ये हार तत्कालीन नेपाल के जंगवहादुर को बेचा था । १९०१ मे तख्ता पलट विद्रोह मे शमशेर राणा को नेपाल के प्रधानमंत्री पद त्याग करना पडा ।उस वक्त नेपाल आर्थिक कमजोरी से जूझ रहा था । नेपाल को धन की जरुरत पडी और उसके बाद दरभँगा महाराजा रामेश्वर सिंह उक्त हार फिर से खरीद लिए । ये हार १९६० तक दरभंगा परिवार मे ही रहा । संसार के बहुमूल्य पन्ना का हार दरभंगा महाराज के साथ ही रह गया । लहान के पोखरीयगढ से चोरी किए गए नौलाखा हार दरभंगा महाराज ने फिर कहाँ जाकर बेचा ये राज महाराज के मौत के साथ दफन होगया । दरभंगा महाराजा परिवार के जवाहरात लन्डन अर्थात पेरिस मे लिलाम होता रहा है । सन्देह है कि वो हार पेरिस मे भी हो सकता है । सवाल यह है कि क्या हमारी सरकार हमारे खोए हुए उस अमुल्य हार को खोज पाएङ्गे ?

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