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सेटेलाईट युग में प्रवेश

 

व्यग्ंय………बिम्मी शर्मा

सरकार और नेताओं के मुताबिक यह देश भी अब सेटेलाईट में चला गया है । अब यह सेटेलाईट कैसा है किसी नें देखा नहीं । ड्रोन कैमरे को भी इस देश की अंधी बहरी जनता सेटेलाईट समझ लेती है । इसी लिए देश को चने की झाड पर चढाते हुए सरकार ने सेटेलाईट पर भेज दिया । काश देश यहीं पर रहता और इस देश के सारे निकम्मे नेता सेटेलाईट पर चले जाते तो कितना अच्छा होता ? पर इस देश का ऐसा भाग्य कहां ? यहां तो हर समय इन्ही नेताओं को देखना और झेलना है । यदि इस देश से सच में सेटेलाईट भेजा गया होता तो उस के बारे में पहले से ही जानकारी मीडिया में आती ही । पर कहीं कोई सुराग दिए बिना ही गुपचुप तरीके से सेटेलाईट बना कर भेज भी दिया ? जब सच में सेटेलाईट बनाया था तो उसे अपने ही देश से अंतरीक्ष में क्यों नहीं भेजा गया । जाहिर है उस के लिए स्टेशन चाहिए सेटेलाईट को स्पेश में भेजने के लिए । वहां से सेटेलाईट पल, पल की जानकारी भेजेगा अपने देश में । जाहिर है जब कोई सेटेलाईट बना हीं नहीं तब कैसे उसे भेजा जाएगा और क्यों चाहिए उसके लिए स्टेशन । हमेशा की तरह इस बार भी सरकार ने बाबाजी का ठूल्लू बनाया अपने देश के नागरिकों को । और वैसे भी इस देश के नागरिक तीन सौ ६५ दिन ही अप्रिल फूल बनती है सो इस बार भी बन गयी वह भी अप्रील के ही महिनें में । खूब मजा आया होगा न । सरकार सेटेलाईट बनाने या उसको स्पेश में भेजने के काम को इतना मामूली समझ रही है जैसे कि किसी कारखानें में डिस होम या डिस एटेंना बना कर उस को छत पर चढा दिया और मजे से टीवी में सारे चैनल देखने लगे । वैसा ही साधारण सा डिस टिवी का छाता समझ लिया अक्ल के दुश्मन इस सरकार नें । बालुवाटार का सरकारी जमीन व्यक्ति के नाम में करने जैसा मामूली काम नहीं है कि दूसरों का बनाया सेटेलाईट को अपने नाम से स्पेश में भेज दिया । वह भी जापान से ? और जापान क्यों देगा किसी और देश को अपने स्पेश स्टेशन से सेटेलाईट भेजने को ? सभी को अपनी तरह का मुर्ख और कांइया समझ लेती है नेपाल की सरकार । बेचारा क्या करें जो कभी आईना देखता ही नहीं । आईना देखे तब न पता चले सरकार को कि वह कितने पानी और कितने सूखे में है । सरकार बेचारी भी क्या करे ? कभी मोनो या मेट्रो रेल का सपना दिखाया । कभी हवा से बिजली निकालने का झांसा दिया । कभी गैस पाईप से गैस घर, घर में आने और बिस्तर में ही सभी को तैयार खाना मिलने का आश्वासन दिया । छोटी सी नाव को बडा सी पानी जहाज बना कर सभी को उसी में बैठा कर समुद्र की सैर करवाने के सपने दिखाए । पर सभी सरकारी योजना सिर्फ सपने ही बन कर रह गए और हवा में ही उडने लगे तब सरकार अपने मतदाताओं को मुँह दिखाने के काबिल भी नहीं रही । इसी लिए सेटेलाईट बनाने ओैर भेजने में हम काबिल हो चुके है यह बता कर या भरमा कर अपने बांकी सभी आश्वासनों या एब को जबरदस्ती छुपा रही है सरकार । चुनाव के समय किए हुए अपने वादों को पूरा नहीं कर पायी सरकार । वृद्ध भत्ता को २ हजार से ५ हजार बनाने का आश्वासन दे कर मुकर गयी सरकार । अब सुनने में आया है कि वृद्ध भत्ता को ही  हटाना चाहती है सरकार । सब से जरुरी आधारभूत आवश्यक्ता में से एक है सडक का दुरुस्त होना । पर इतने जरुरी काम को भी अनदेखा कर के हर साल बरसात में बिना समुद्र के ही इस देश में पानी जहाज का मजा देती है । जीर्ण सडक को तो मर्मत करने की कोई कवायद नहीं पर उन्ही जीर्ण सडक और नाले में बरसात में भरे हुए पानी में नाव चला कर उसी को मैग्नीफाइंग ग्लास से सरकार पानी जहाज बना कर दिखा रही है । और मुर्ख जनता भी सरकार की हां में हा मिला कर खुश है । क्यों कि जनता यह सोचती है इस देश में बुरा देखना, बुरा सुनना और बुरा बोलना पाप है । इस देश की आधी आवादी से ज्यादा तो विभिन्न राजनैतिक दल के पवनपुत्र और वराहपुत्र बन कर अपना जीवन यापन कर रहें है । पवनपुत्र तो किसी उंचे स्थान या पेड में रहता है उस को धरती के लोगों से क्या वास्ता । और वराहपुत्र का वास स्थान तो सभी जानते ही हैं कहां होता है ? ईन को तो सभी जगह और वस्तुएं अच्छी और सच्ची लगता है । बेचारे भादो में अंधे हुए बैल जो हैं । और सरकार इन्ही पवनपुत्रों और वराहपुत्रों से घिरी हुई है । सभी समस्याओं और अपने दिए हुए आश्वासनों से निजात पाने के लिए सरकार कुछ नयां बहाना बना कर देश के नागरिकों का दिमाग डायवर्ट करना चाहती थी सो कर दिया । अब सरकार खुश है अपने नागरिको कों चकमा दे कर । विदेशों में साईन्स के स्टुडेंटों को प्रोजेक्ट वर्क के तौर पर सेटेलाईट बनाने का काम दिया जाता है । यह प्रोजेक्ट वर्क के तौर पर वहां सेटेलाईट बनाना कोई बडी बात नहीं हैं । पर इस को बना कर प्रयोग में लाने के लिए स्पेश स्टेशन चाहिए । किसी नेपाली विधार्थी ने जापान में मिले प्रोजेक्ट वर्क में एक छोटा मोटा सेटेलाईट बना दिया तो सरकार को लगा यह तो बहुत बडी बात हो गयी । और उसी को हाई लाईट कर के सेटेलाईट बनाने का श्रेय खुद लेना चाहती है यह निकम्मी सरकार । यदि सेटेलाईट सच में बनी है तो वह अब से देश में होने वाली प्राकृतिक विपत्तियों के बारें में पहले से ही आगाह करेगी । क्या सरकार यह दावा कर सकती है कि अब से ईस देश में होने वाले कोई भी महा विपत्तियों की सूचना जनता को दी जाएगी ? यह भी सरकार का कोरा गप ही हैं मेट्राे मोनो रेल, हवा से बिजली और पानी जहाज के ही जैसा । बोलने और सुनने में मजा आता है पर हकीकत में कुछ होता नहीं है । यह सेटेलाईट नहीं है यह देश और जनता को बेवकुफ बना कर अधेरें को उजाला दिखाने का एक साधारण लाईट है जिस के उजाले से आंख चुधियां कर देश के नागरिकं अंधे हो गए है । वैसे गूंग और बहरी तो ईन देश की जनता पहले से ही थी अब सेटेलाईट से अधीं भी हो गई है ।

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