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कठघरे में ओली सरकार : बाबुराम पौडेल

 

हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |नेपाल के प्रधानमंत्री खड्गप्रसाद ओली की सत्ता के गलियारों में शानदार प्रवेश के एक साल पूरे हो चुके हैं । उसवक्त पूरा देश ओलीमय था । चुनाव में ओली की नेतृत्ववाली कम्युनिष्ट मोरचे को जबरजस्त बहुमत मिली थी । चुनावों में जनता के साथ किए गये वायदों और चुनावी सभाओं में उनकी वाक्पटुता और वाक्तीक्ष्णता ने लोगों को मोह लिया था । क्रान्ति, आन्दोलन और अस्थिरता के लम्बे दौर से उब रही जनता को संवृद्धि की ओर राह दिखानेवाले एक नेता की चाह थी । ओली ने भारत के साथ लोहा लेकर एक बाजी तो पहले ही मार ली थी साथ में उत्तर में चीन के सिगात्से से लेकर काठमाण्डौ होते हुये लुम्बिनी जोड़ने वाली रेलमार्ग, भारत के साथ जोड़नेवाली रेल और जलमार्ग की बात बताकर लोगों को चुनाव के दौरान नए स्वप्नों का सैर कराया था । इसतरह आम लोगों ने ओली के चेहरे पर अपना बिम्ब महसूस किया ।

साल बीतते बीतते प्रधानमंत्री ओली की लोकप्रियता का पारा बहुत नीचे लुढ़कता दिखाई दे रहा है । मतलब, उनके द्वारा दिखाई गई स्वप्निल संसार का यथार्थ में अवतरण का संकेत तक सालभर में लोगों को नहीं देखने को मिला है । शायद संवृद्धि के लिए आतुर जनता की तीव्र चाह की गति की तुलना में प्रधानमंत्री पीछे छूट रहे प्रतीत होते हैं ।

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राजनीति में एक कहावत है कि पपुलिष्ट नारों के बुनियाद पर टिकी राजनीति का सफर बहुत क्षणिक होता है । लोगों में दमित सपनों को भड़काना अक्सर जोखिमपूर्ण होता देखा गया है । बहुत बलिष्ट होते हुये भी नेपाली माओवादी आन्दोलन का बुरी तरह बिखर जाना और मधेश आन्दोलन की किस्ती का मुकाम पर पहँुचने से पहले ही भटकता प्रतीत होना नेपाल के ही सन्दर्भ में मिसाल है । प्रधानमंत्री ओली की चुनावी जीत भी अपवाद नहीं होती दिख रही है ।

वैसे सरकारी दावे का माने तो उन्होंने वायदे एक साल के लिए नहीं किये थे बाकी चार साल में सभी काम पूरे किये जाएँगे । बात सही तो है परन्तु पहले साल में अगर कुछ भी नहीं हो पा रहा है तो बचे चार साल भी खाली न बीत जाए — चिन्ता इसी  बात की  है । यह सही  है कि ओली सरकार को विरासत की सरकारों का साथ भी नहीं मिला । नई संरचना को व्यवस्थित करने, उसके संचालन लिए के कई कानूनों को बनाने और कर्मचारियों को समायोजन करने का काम भी इसी सरकार के कन्धे पर था । ऐसे में काफी दबाव और असमंजसता बरकरार है । प्रदेश और स्थानीय सरकारों को अधिकार देने के मामले में भी ओली सरकार पर अनुदार होने का आरोप है । इसको लेकर संघीयता के भविष्य के प्रति चिन्तित लोगों की तादाद भी छोटी नहीं है ।
विगत की लम्बी अस्थिरता के छाँव में पनपे भ्रष्टाचार और असुरक्षा का माहौल भी ओली सरकार के लिए चुनौती है । उनके सत्तारोहण के बाद भी कई गम्भीर भ्रष्टाचारों के खुलासे होने के कारण भी ओली पर लोगों के भरोसे का सेतु कमजोर पड़ रहा है । इन नये खुलासों को किस तरह निबटाया जायेगा अभी देखना बाकी है । विगत की सरकारें भी दूध से धुली नहीं थी । फिर भी सभी समस्याओं को निबटाने की जिम्मेदारी वर्तमान सरकार की ही है । इससे वह अपना पल्ला झाड़ नहीं सकती ।
ओली सरकार के पास उपलब्धि के नाम पर दिखाने के लिए वैदेशिक सम्बन्ध, सामाजिक सुरक्षा जैसे कुछ मसले हैं जो काफी नहीं समझा जा रहा है । कई ऐसे मसले भी है जो केवल प्रचार के लिए ही सरकार द्वारा उपलब्धि के रूप में गिनाए जा रहे हैं । इतने से ही लोगों के भरोसे को बनाये रखना संभव नही है ।
सत्तारुढ नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी का जन्म दो बड़ी वामपंथी दल नेकपा एमाले और माओवादी केन्द्र के बीच एकता से हुआ है । इन दो पार्टियों के बीच कटुता भरे सम्बन्धों को देखकर कल्पना भी नहीं की जाती थी दोनों में एकता भी हो सकती है । परन्तु जो सोचा नहीं जाता था वही आकस्मिक रूप से संभव हो गया ।  एकता के भी अब तकरीबन साल बीतने को है परन्तु विवादों के चलते निचले तबके तक यह काम अबतक पूरा नहीं हो पा रहा है । तत्कालीन नेकपा एमाले के नेता ओली और माओवादी नेता प्रचण्ड विगत में एक दूसरे के कट्टर आलोचक रहे हैंं । ये दोनों नेता अब एक ही पार्टी के दो अध्यक्ष हैं । ओली नेपाली राजनीति में स्थिर और अडि़यल नेता के रूप में स्थान बना चुके हैं वहीं प्रचण्ड जोखिम उठानेवाले परन्तु अस्थिर नेता के रूप में जाने जाते हैं । दोनों की प्रवृतियों में जमीन आसमान का फर्क है । पार्टी में ही प्रधानमंत्री के रूप में ओली की कार्य शैली की कड़ी आलोचना की जा रही है ।
इतना सब होते हुये भी ओली सरकार समय के उस चुनौतियों से भरे दौर में काठमाण्डौ की सत्ता पर विराजमान है जहाँ उसकी असफलता की कीमत सारे देश को चुकानी पड़ सकती है । लम्बी सियासी उठापटक के बाद की कुछ उपलब्धियाें पर भी प्रश्न चिन्ह लग सकता है । देश को अस्थिरता के गर्त में चाहनेवाले और छोटी स्वार्थ के लिए क्रियाशील ताकत से नेपाल अब भी खाली नहीं है ।

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