समाजवादी, जनमत और राजपा त्रिकोणीय ध्रुवीकरण : अजयकुमार झा
अजयकुमार झा,जलेश्वर, 16 मई । नेपाल के राजनीति में बाबूराम भट्टराई और उपेंद्र यादव के बीच हुए समझौता से एक बात खुलकर सामने आता है कि सी के राऊत और एमाले पार्टी बीच तथा प्रधानमंत्री ओली के द्वारा सीके रावत के संबंध में प्रयोग किए गए विशेषोक्ति से इनदोनो में आतंरिक सांठ गाँठ होने की संभावना है, जो यहाँ के भावी राजनीति को प्रभावित करनेवाली है। उपेंद्र यादव को यह भान हो चूका है कि सीके रावत के स्वराजी आंधियों से अपने को बचाने तथा उसे टक्कर देने के लिए मधेश में बाबूराम भट्टराई लगायात राजपा और इस तरह के अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एकिकरण करके ही लड़ा जा सकता है। इसी को मजबूत करने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया है। उनका मानना है कि आखिरकार हँस के हो यार रोके हो राजपा को भी समाजवादी पार्टी के साथ एकता करना ही होगा।
राजपा के साथ सिर्फ दो संभावनाएं हैं पहला, कि वह मधेश आंदोलन को शिरोधार्य करते हुए मधेसी और मधेश के भावना को हृदयंगम करते हुए समाजवादी के साथ अपने को एकताबद्ध करले। या फिर नेपाली कांग्रेस में अपने को बिलीन कर दे।
वर्तमान समय में राजपा को एक दूरगामी और कठोर कदम चुनना होगा, कठोर निर्णय लेना होगा। हो सकता है इस निर्णय से उसे जनता के बीच अपमानित होना पड़े, उसकी समर्थकों को भावनात्मक रूप में ठेस पहुंचे, परंतु कांग्रेश से एकीकरण या समाजवादी के साथ राजपा के गठवंधन उतना ही महत्व रखता है। मेरे हिसाब से आज जो कांग्रेस की स्थिति है जनता के बीच वह बहुत ही दयनीय है। एक भटका हुआ पार्टी के रूप में है। एक दिशाहीन नेतृत्व के रूप में राजनीति के चौराहों पर खड़ा है।अपनी साख को बचाने के लिए पंख फड़फड़ा रहे कांग्रेस के साथ एकता करने पर यह अधिक संभावना है कि राजपा को सम्मानित स्थान प्राप्त हो। कांग्रेश अपनी अस्तित्व को बचाए रखने के लिए आज नहीं तो कल अर्थात अगले चुनाव तक उसे अपने नीतियों में परिवर्तन लाना ही होगा। मधेश नेपाल का अभिन्न अंग है, मधेसी यहां के आदिवासी नागरिक हैं, और मधेश के बिना देश अधूरा है, मधेसियो के सम्मान, संरक्षण, अधिकार आदि के लिए कांग्रेस को नीतिगत रूप में राष्ट्र के समक्ष उतरना होगा। यहीं से उसका उत्थान शुरू होगा अन्यथा कांग्रेस के लिए नेपाल में अब कोई स्थान शेष सुरक्षित दिखाई नहीं दे रहा है। इस परिस्थिति में राजपा यदि सशक्तरूपमें, एक नेतृत्व में विशेष योजना के साथ कांग्रेस से बात कर समझदारी के एक बिंदु पर पहुंचती है तो मैं समझता हूं कि कल राजपा सिर्फ अपना अस्तित्व ही नहीं समग्र मधेस को सुरक्षित रख पाएगा और नेपाल के लिए महत्वपूर्ण तराइमधेस भाग का नेतृत्व हमेशा उसके हाथ में रहेगा। यहीं से कल राष्ट्रीय नेतृत्व लेने में सहायक होगा भारत के विश्वासपात्र बाबूराम भट्टराई और राजपा के सिरमौर श्रीमान ठाकुर जि इन दोनों के बीच का गठबंधन भी नेपाली राजनीति में एक नया मोड़ या कहें आयाम थप सकता है, परंतु डेमोक्रेटिक धार से आगे बढ़ने वाले नेताओं में राजपा के अधिकांश शीर्षस्थ नेतागण के लिए कांग्रेस राप्रपा लगायत के पार्टियों के साथ का सम्बन्ध ही टिकाऊ और उत्पादन मूलक होगा। वैसे भी मधेश के तीनों शक्तियां राजपा फोरम और सीके रावत या तो आपस में एक जाए जो मधेश के सम्मान, गरिमा, पहचान और विकास के लिए आवश्यक है, और यदि आपस में समझदारी नहीं बना सकते हैं तो इन का विलय भी अवश्यंभावी है। तीनों ही अपने अस्तित्व को खोने जा रहे हैं और इस स्थिति में ये तीनों पार्टियां अपने अपने ढंग से अपने अपने चरित्र के और सोच के साथ सुविधा संपन्न राह को चुनेंगे जिसमें सीके रावत और उपेंद्र यादव जी ने अपना अपना कदम आगे बढ़ा लिया है। बाकी रहे राजपा के नेतागण तो,उन्हें भी किसी न किसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ एकत करना ही होगा फिर देरी किस बात की। कांग्रेस के साथ एक हो जाएं बस! यही एक उपाय है नेताओं को अपने अस्तित्व को और राजनीति को बचाने के लिए। इनमें से किसी भी नेताओं के भीतर अंतस में देश और मधेसियों के प्रति कोई सम्मान नहीं। इन्हें अपने पद प्रतिष्ठा और संप्रभुता से मतलब है। वैसे अब मधेसियो के साथ इमोशनल ब्लैकमेल संभव नहीं है। अतः बलिष्ट के साथ रहना ही एक दाव शेष रह गया है।
अब राजनीतिक जटिलता को ध्यान देकर देखाजाय तो, सी के राउत का वाम गठबंधन के साथ एकता बिजातीय दिखाई देता है, जो किसीभी क्षण टूट जाएगा। एक इंडो प्यासिफिक संयंत्र के संरक्षक तो दूसरा वन बेल्ट वन रोड के संवाहक। एक डेमोक्रेटिक धार के पोषक तो दूसरा कथित साम्यवाद के वाहक है। इसे किसीभी रासायनिक प्रक्रिया से घोला नहीं जा सकता। वैसे राउत जी को मधेसी जनता परखना चाहेगी, लेकिन एमाले के उपस्थिति को मधेसी जनता कितना स्वीकारेगी कहा नहीं जा सकता।
इसी प्रकार नयाँ शक्ति और समाजवादी फोरम के बिच का समीकरण भी अपने आप में अदभुत मिश्रण है। उपेन्द्र यादव, जो मधेस आन्दोलन में नेता के रुपमे फले फुले तो वही बाबुराम जी सफल माओवादी आन्दोलन के असफल नेता के रूप में परिचित हैं। मधेसियो के अधिकार के लिए लड़ने वाले उपेन्द्र जी और मधेसियो के अधिकार को संविधान में हनन करने बाले तत्कालीन अध्यक्ष बाबुराम जी के बीच का समिश्रम किसके हित में होगा कोई नहीं बता सकता। खिचाब और द्वंद्व इनका दिनचर्या रहेगा। या हो सकता है, बाबुराम जी इन्हें फिरसे एमालेमाओ के महाजाल में ही फसा ले। अतः यहाँ भी मधेसी जनता अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता। अब रही बात कांग्रेस की तो, यहाँ यह कहना चाहूँगा कि वैचारिक रूप से राजपा और कांग्रेस का धार एक ही है। इनमें भेद सिर्फ अधिकार और पहिचान का है। कांग्रेस के शासकीय दंभ और राजपा के विद्रोही प्रवृति का है। कांग्रेस के क्षुद्र खासवाद और राजपा के मधेस वाद का है। इसमे कांग्रेस को सिर्फ क्षुद्रता से ऊपर उठाना है, राणायी सोच से मुक्त होना है, अपनी आधार स्थल मधेस से संयुक्त होना है। दोधारी घटिया राजनीतिक मानशिकता से मुक्त होना है। इमानदार नागरिक के हैशियत से मधेसियों के साथ शुद्ध और पवित्र हृदय से साथ निभाना है। इतना काफी है राजपा कांग्रेस गठबंधन को देश पर निष्कंटक शासन करने के लिए। जबतक कांग्रेस अपनी द्वैध चरित्र से मुक्त होकर राष्ट्रीय हित में नहीं सोचेगी तबतक उसका पुनर्जीवन असंभव है। सम्बन्ध सीधा होगा राजपा के साथ कांग्रेस का, तेरा प्रधान मंत्री तो मेरा पार्टी अध्यक्ष, एक तेरा एक मेरा। इससे कमपर समझौता मान्य नहीं होगा। यदि दवाव बस राजपा कमजोर कदम उठाता है तो, वह अपनी आत्म हत्या ही करेगा। और यदि उपरोक्त ढंग से सन्धि करता है तो दोनों के लिए सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। मधेसी नेता बुलंदी के साथ जनता के बीच अपने को प्रस्तुत कर पाएंगे, जिसका सीधा लाभ कांग्रेस को भी मिलेगा। तत्काल यही सर्वोत्तम मार्ग है।
अजय कुमार झा


