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जी हाँ मैं लहर हूँ : पुष्पलता सिंह

 

जी हाँ मैं लहर हूँ : पुष्पलता सिंह

सागर के सीने से उठकर
साहिल पर आकर
बिखर जाती हूँ,,
पÞmना हो जाती हूँ
पिÞmर उसी अपने
सागर की आगोश में,
जिसके सीने में
दिन रात मौजे
भरती हूँ,
हम एक दूजे
बिन अधुरे हैं !
न रंग जुदा है,
न रूप ।
हर समय
अठखेलियाँ
करते, सदियाँ
गुजर गई ।
मैं कभी जुदा
नही हो पाई,
कैसे हो जाऊँ ?
मानती हूँ,,मेरे
बिखर जाने के बाद
कोई दूसरी लहर
सीने से उठेगी ओर
वो भी साहिल पर आकर
बिखर जायेगी,
मैं पिÞmर से,,अपना
वही रूप लेकर आऊंगी
अपना कुछ अंश
सागर के वजूद में
छोड़ आऊंगी,
हर बार वही रूप
रखके आऊंगी, सागर के
सीने से उठूँगी
और साहिल पर
जाकर बिखर जाऊंगी !
शायद! यही एक नारी
का प्यार है, अपने प्रेमी
से जुदा होके,किसी दूसरे
की नही हो सकती,
टूटकर बिखर जायेगी,
मगर पुरुष ! किसी दूसरी
स्त्री के लिये अपने प्यार को
भूल जाता है,जैसे सागर
एक लहर को साहिल पर
छोड़कर दूसरी लहर का
हो जाता है ।

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