प्रेम एक आवाज है जो सदियों से सुनी जाती रही है..ललन चौधरी
डा. दीप्ति की कविताओं में एक अलग टीस है जिसे पाने और खोने दोनों शर्तों.पर तौला जा सकता है..दर्द प्रेम में न हो तो उसकी दुनिया ही क्या..प्रेम को कविताओं में दिखाना एक बड़ी रचना की उपलब्धि है..
प्रेम की बेहद खूबसूरत अतीत की सुखद अनूभूतियां जीवन के दर्द और उस दर्द से ऊपजे तमाम सच को बेनकाब करती हैं, सच जो दर्द के तमाम शर्तों को पार कर हदों के उस पार जा गिरती है…जहां दरख्तों के उदास छांहों और खामोशियों के बीच केवल बेचारा दिल.होता है, जिसे दर्द की अनहद अकथ प्रयासों के बीच एक लुभावनी व डरावनी शाम की चित्कार सुनाई पड़ती है..
प्रेम पूजा है..पावन है..दो दिलों के मिलन में देवता निवास करते हैं..प्रेम करने के तरीक बनाये नहीं जाते ..प्रेम का व पल खुद ब खुद एक नयापन लिये आ जाता है..कब तक चलती रहेगी प्रेम कहानियां और प्रेम कविताओं का आना जाना लगा रहेगा…जीवन संग्राम में अगर सबसे बड़ी कोई जीत होती है तो किसी का दिल जीत लेना होता है और सबसे बड़ी हार दिल का टूट जाना होता है..अगर वेहद परिमार्जित व परिष्कृत भाषा में कहें तो प्रेम एक आवाज है जो सदियों से सुनी जाती रही है..
हिंदी कविता में प्रेम की पीड़ा और मर्म को समझने की नयी परिभाषाएं गढ़ी ग ई हैं..यह परिभाषा ही आज की सबसे सशक्त प्रेम कविताएं हैं..प्रेम करना अगर गुनाह मान लिया जाय तो प्रेम हो जाना ईश्वरीय वरदान की श्रेष्ठतम उदाहरण है..
डा. दीप्ति की कविताओं में एक अलग टीस है जिसे पाने और खोने दोनों शर्तों.पर तौला जा सकता है..दर्द प्रेम में न हो तो उसकी दुनिया ही क्या..प्रेम को कविताओं में दिखाना एक बड़ी रचना की उपलब्धि है..आज के समय में गौण हो रहे प्रेम ,और मर रहे प्रेम को फिर से जीवंत बनाये रखने की अलग कोशिश ही दीप्ति की अपनी रचनात्मक प्रतिभा को जन्म देती है..प्रेम करते रहना एकौर उसे उसी रूप में जीवंत बनाये रखने प्रेम को बचाये रखने की बड़ी अर्थपूर्ण जीवन की सार्थकता सिद्ध होगी..
अतीत को सुखद और सुंदर बनाने के बड़े माध्यम प्रेम ही है..हिंदी कविताओं में अतीत के क्षण को वर्तमान में बिठाने और पाने की जो कोशिश दीप्ति की प्रेम कविताओं में हुई है,वह सच में एक नयी परंपरा का मार्ग प्रशस्त कर रही है..आनेवाले समय में जिन हाथों की नरमियां और सांसों की गरमियां की पड़ताल की गई है, वह आज की कविताओं की सबसे बड़ी जरूरत है.।
प्रेम की पुर्नस्थापना तभी संभव है जब अतीत के संचित कोष से.प्रेम को मूर्त रुप देना संभव हो पायेगा.
डा.दीप्ति इस संकट की घड़ी में प्रेम के बहाने सब कुछ यादकर उस अतीत से हमें रू ब रू कराते जरूर हैं,लेकिन अतीत से वर्तमान को बदलने की या पाने की सफलतम उपलब्धि..भी है ।
वक्त जो बह गया
तुम्हें याद है वो दिन
जब किसी दरख्त के तले
तुम्हारे काँधे पर सर रख कर
बैठी थी तुम्हारे हाथों को
कस कर थामे हुए जैसे,
एक डर बैठा हो अन्दर
कि कहीं ये साथ छूट ना जाय,
और तुम्हारे हाथ सहला रहे थे
मेरे बालों को मानो
तसल्ली दे रहे हों
कह रहे हों कि मैं
हमेशा साथ हूँ तुम्हारे ।
रात चाँदनी थी
पर चाँद पूरा नहीं था,
अधूरा चाँद और पत्तों पर
छिटकती चाँदनी
दूब की नोक पर चमकते
थरथराते शीत कण
मद्धम सी हवा का
जिस्म को छूकर
आहिस्ता से गुजर जाना
कितनी मोहक थी वो रात ।
बुदबुदाते हुए मैंने कहा था
देखो न
अधूरा होकर भी चाँद
कितना खूबसूरत है न ?
एक पतली सी हँसी
खिंच गई थी तुम्हारे
होठों के दरमियाँ
हौले से अपने करीब लाते हुए कहा था
हाँ, पर मेरे चाँद से ज्यादा नहीं
जो पूरा का पूरा मेरे पास है ।
अनदेखे पल को सोच
काँप गई थी मैं
क्या सचमुच पूरा का पूरा ?
नहीं ! कुछ भी पूरा नहीं था
न तुम्हारा साथ
न वो वक्त, न वो रात
बीच का वक्त बह गया
अपने साथ कई अहसासों को लेकर ।
चाँद आज भी है उसी तरह
आसमान पर टँगा
पर शायद वो दरख्त सूख गया होगा
हवा आज भी छूकर निकलती होगी
उस सूखे दरख्त को
पर नही सिहरता होगा
अब किसी का तन–मन
क्योंकि न तो वहाँ
किसी की साँसों की गरमियाँ होंगी
और न ही किसी के
नर्म हाथों की नरमियाँ
बस बह रहा होगा
एक खाली सा वक्त
अपने आप में समेटे
जाने अन्जाने अहसासों के
समन्दर के बीच
तन्हा, खामोशी के साथ ।


