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भजन क्यों नहीं होता ?

हिमालिनी अंक जुन २०१९ |भगवान एक, उन्हीं से अनंत जगत की जगत के समस्त चेतना भूतों की उत्पत्ति हुई है, उन्ही में सब का निवास है, वे ही सबमें सदा सर्वत्र व्याप्त है, अतः उनकी भक्ति का, उनके ज्ञान का और उनकी प्राप्ति का अधिकार सभी को है । किसी भी देश, जाति, धर्म, वर्ण, वर्ग का कोई भी मनुष्य–स्त्री–पुरुष अपनी अपनी विशुद्ध पद्धति से भगवान का भजन कर सकता है और उन्हें प्राप्त कर सकता है । परन्तु भजन में एक बड़ी बाधा है, वह बाधा है– भगवान में अविश्वास और संस्कार के भोगों में, विश्वास । बस, इसी कारण इसी मोह या अविद्या के जाल में फंसा हुआ मनुष्य भगवान का कभी स्मरण नहीं करता और भोग विषयों को लिए विभिन्न प्रकार के कुकार्य करने में अपने अमूल्य जीवन को खोकर आगे के लिए भयानक दुःख भोग के अचूक साधन उत्पन्न कर लेता है ।

मनुष्य में कमजोरी होना आश्चर्य नहीं, वह परिस्थितिवश पापकर्म भी कर सकता है, परन्तु यदि उसका भगवान पर विश्वास है, भगवान के सौहार्द और उनकी  कृपा पर अटूट और अनन्य श्रद्धा है तो वह भगवान का आश्रय लेकर पाप–समुद्र से उबर जाता है और भगवान की सुखद गोद को प्राप्त कर लेता है, परन्तु जो भोगों ही जीवन का एक मात्र ध्येय और सुख का परम साधन मानकर उनके आश्रय प्राप्ति के प्रयत्न में तल्लीन रहता है, उसका जीवन तो पापमय बन जाता है, वह कभी भगवान को भजता ही नहीं । भगवान ने गीता में दो प्रकार के पापियों का वर्णन किया है ।




न मा दष्कृति नो मूढ़ा प्रपधन्ते नराधमाः ।
मायापहतज्ञाना आंसुरं भावमाश्रिताः ।। गीता (७।१५)

वे पापकर्म करनेवाले मनुष्य तो मुझको (भगवान को) भजते ही नहीं, जो मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य (भगवत प्राप्ति) को भूलकर प्रमाद तथा विषय सेवन में लगे रहने की मूढ़ता को स्वीकार कर चुके है, जो विषयाशक्ति तथा विषय कामना के वश होकर नीच कमों में ही लगे रहते है और अपने मानव जीवन को उश्रम बना चुके है, माया के द्वारा जिनका विवेक हरा जा चुका है और जो असुरो के भाव, काम, क्रोध लोभ आदि का आश्रय लेकर जीवन को आसुरी बना चुके है, ऐसे लोग न तो भगवान में श्रद्धा रखते हैं और न भजन की ही आवश्यकता समझते है, वे दिन–रात नये–नये पाप कर्मों में प्रवृत्त होते रहते है? विविध प्रकार के पाप करके गौरव का अनुभव करते और सफलता का अभिमान करते हैं एवं पापों को ही जीवन का सहारा मानकर उत्तरोत्तर गहरे भव समुद्र में डूबते जाते हैं ।
दूसरे वे पापी हंै, जो परिस्थिति या दुर्बलता के कारण बडेÞ से बड़ा पापकर्म तो कर बैठते हैं, परन्तु वे उस पाप को पाप समझते है, पाप करके पश्चाताप करते है, पाप उनके हृदय में शूल से चूभते है और वे उनसे त्राण पाने तथा भविष्य में पापकर्म सर्वथा न बने, इसके लिए चिन्तित और सचेष्ट रहते है, ऐसे लोग कही आश्रय, आश्वासन न पाकर अन्त में भगवान को ही परम आश्रय मानकर करुणाभाव से उनको पुकारते हैं । भगवान कहते हैं–

अपि चेत्सुदुराचारी भजते मामननाभाक ।
साधुरेव स मन्तवा सम्यग्त्यर्वासतो हि सेः ।।
क्षप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति निगच्छति ।
कौन्तेय प्रति जानी हि न में भक्तःप्रणशयति ।।

गीता ९ (३०–३१)
अत्यन्त दुराचारी (पापकर्म मनुष्य) भी यदि मुझ (भगवान) को ही एक मात्र शरणदाता परम आश्रय मानकर दूसरे किसी का कोई भी आशा–भरोसा न रखकर (पापनाश और मेरी भक्ति की प्राप्ति के लिए) केवल मुझ को ही भजता है, आर्त होकर एक मात्र मुझ को ही पुकार उठता है, उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने एक मात्र मुझ (भगवान) को ही परम आश्रय मानने और केवल मुझको ही पुकारने का सम्यक निश्चय कर लिया है । केवल मानने की ही बात नहीं, वह तुरन्त ही धर्मात्मा पापकर्म से बदलकर धर्मस्वरुप बन जाता है और भगवान प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त होता है । अर्जुन ! तुम यह सत्य समझो कि मुझ को इस प्रकार भजने वाले धमाका कभी नाश (अधःपात) नहीं होता ।

इन दोनों प्रकार के पापियों में यही अन्तर है कि पहला पाप को पाप न मानकर गौरव तथा अभिमान की वस्तु मानता है, वह काम–क्रोध लोभादिरूप असरभाव को ही परम आश्रय समझकर उसके परायण रहता है तथा नीच कर्मो की सिद्धि में ही सफलता का अनुभव करता है और दूसरा पापी पाप को पाप मानकर उनसे छूटना चाहता है और शरणगतवत्सल भगवान को ही एक मात्र परम आश्रय मानकर परम श्रद्धा के साथ उनका भजन करना चाहता है, इसी से वह भगवान को प्राप्त कर लेता है ।
पाप बनने में प्रधान कारण है पाप में अज्ञानपूर्ण श्रद्धा या आस्था । मनुष्य की विषयों में आशक्ति तथा कामना होती है और संग दोष से वह पापों को ही उनकी प्राप्ति तथा संरक्षण सवद्र्धन में हेतु मान लेता है । फिर उत्तरोत्तर अधिक से अधिक पापों में ही लगा रहता है । संसार बन्धन से छूटने के लिए निष्कामभाव से तो वह भगवान को भजने की कल्पना भी नहीं कर पाता, सकाम भाव से भी भगवान को नहीं भजता, उधर उसकी वृत्ति जाती ही नहीं और वह दिनरात नये–नये पापों में उलझता हुआ सदा–सर्वदा अशान्ति का अनुभव करता है तथा परिणाम में घोर नरकों की यातना भोगने को बाध्य होता है । भगवान ने स्वयम् कहा–
आसुरी योनिगापन्नामुढ़ा जन्मनि जन्मनि ।
कामप्राण्यैव कान्तेय ततो यान्त्यधमा गतिम ।।

(गीता १६।२०)
अर्जुन ऐसे मूढ (मनुष्य) जन्म के चरण और परम लक्ष्य मुझ (भगवान) को न पाकर जन्म–जन्म में हजारों लाखों बार आसुरी योनियों के प्राप्त होते हैं । तदनन्तर उससे भी अधम गति में नरकों में जाते है ।
घर प्रबल मोह की ही महिमा है कि बार–बार दुःख का अनुभव करता हुआ भी मनुष्य उन्ही दुःखदायी भोगों को चाहता है । गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है–
ज्यो जुवती अनुभवति अति दारुन दुःख उपजै,
है अनुकूल बिसारी सूल सढ पुनि खल पति हि भजै ।।
लोलुप भ्रम गृहपसु ज्यो जहाँ–तहँ सिर पदत्रान बजे,
तदपि अधम बिजरत तेहि मारग कबहु न मुढ लजै ।।
जैसे युवती स्त्री संतान–प्रसव के समय दारुण दुःख का अनुभव करती है, परंतु वह मूर्खा सारी वेदना को भूलकर पुनः उसी दुःख के स्थान पति का सेवन करती है । जैसे लालची कुत्ता जहां जाता है, वही उसके सिरपर जूते पड़ते है, तो भी वह नीच पुनः उसी रास्ते भटकता है, उस मूढ़ को जरा भी लाज नहीं आती, बस यही दशा मोहग्रस्त मानव की है, बार–बार दुःख का अनुभव करने पर भी वह उन्ही विषय में सुख खोजता है । इसी मोह के कारण वह भगवान का भजन नहीं कर पाता ।
जहां काम, तहँ राम नहीं, जा राम नहीं काम ।
तुलसी कबहुँ कि रहि सकै रवि रजनी इक दाम ।।

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