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राजनीति, धंधा नहीं सेवा है : डा. बाबुराम भट्टराई

हिमालिनी अंक जुन २०१९ | देश में संविधान जारी हुए चार वर्ष हो चुके हैं । संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र का संविधान नेपाली जनता ने पहली बार संविधानसभा से पाया है जो निःसन्देह एक युग का परिवर्तन है । किन्तु इसके बाद जिस दिशा में देश को जाना चाहिए था वह नही जा पाया है ।  पिछले चुनाव के बाद एमाले और प्रचण्ड  ने मिलकर दो तिहाई की सरकार बनाई । किन्तु जनता जो आमूल परिवर्तन चाहती थी उसे वह अनुभूत नही कर पा रही है । विकास और समृद्धि की जो परिकल्पना थी वह कहीं खो गई है जिसके कारण जनता में निराशा की भावना बैठती जा रही है और वह असमंजस में है ।

अधूरी क्रांति की पीड़ा : पुरानी शक्ति हावी

नेपाल में २००७ में शुरु हुए आन्दोलन माओवादी जनयुद्ध के समय उत्कर्ष में पहुँचा था । उसी के बल पर संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र बना । आज जो स्थिति है जो निराशा है वह कहीं ना कहीं अधूरी क्रांति की पीड़ा है ।
जैसे युरोप, अमेरिका, रुस, चीन आदि देश में क्रान्तिकारी शक्तियाें ने पूर्ण विजय हासिल की । तथा उस समय के राज्यसत्ता का आमूल रूपान्तरण किया । यह रुपान्तरण सिर्फ राजनीतिक ऊपरी संरचना मात्र नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढाँचा, न्यायालय, सुरक्षा संयन्त्र, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना को बदल कर नया बनाया गया । जो कम समय में उसके विकास का आधार बना ।
क्रान्ति का असर जैसे–जैसे कम होता गया वैसे–वैसे माओवादी, मधेसवादी, जनजाति, थरुहट आन्दोलन से  सम्बन्धित क्रान्तिकारी शक्ति  कमजोर होती गई ।  स्थिति यह है कि फिर से पुरानी शक्ति काँग्रेस और एमाले देश की राजनीति पर हावी हो गया । जो गणतन्त्र, संघीीयता, धर्मनिरपेक्षता, समावेशिता का विरोधी शक्ति था, उन्हीं के सत्ता में आने से परिवर्तन का सही सही कार्यान्वयन नही होना स्वाभाविक ही था ।
२००७ का आन्दोलन बार बार सम्झौता में समाप्त हुआ । माओवादी जनयुद्ध हमने क्रांति को पूर्णता देने के लिए शुरु किया था । कुछ हद तक हम सफल भी हुए थे । इतना तो जरुर हुआ कि राजतंत्र समाप्त हुआ और गणतंत्र आया । एकात्मक राज्य का संघीीय ढाँचा में पुनर्संरचना किया गया । नेपाली जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा संविधान जारी हुआ यह युगान्तकारी परिवर्तन था ।  किन्तु यह पूर्ण जीत हासिल कर के हुआ परिवर्तन नही था । राजतंत्र को सबने मिल कर हटाया था ।  पर काँग्रेस और एमाले  पुरानी संसदीय व्यवस्था और राजतन्त्र के साथ जाने वाली प्रतिबद्ध शक्ति थी,पर वे माओवादी जनयुद्ध, मधेस आन्दोलन और जनजाति आन्दोलन के बल में संघीीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र में जाने के लिए बाध्य हुए ।  यह अधूरे क्रांति का ही परिणाम था ।

नेतृत्व ठीक ढंग से स्थापित नही होना
इस विषय पर भावुक होकर बात करने से कुछ नही होगा । राजनीतिक क्रान्ति तत्काल विद्यमान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति सन्तुलन को भी निर्धारित करती है । राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय परिस्थिति, देश का भीतरी वर्गीय, जातीय, क्षेत्रीय, लैङ्गिक संरचना, आर्थिक, सांस्कृतिक स्तर इसका निर्धारण करती है । इस नजर से देखने पर एक हद तक माओवादी जनयुद्ध को सम्झौता से संघीीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र तक पहुँचाना आवश्यकता और बाध्यता थी । उस सिद्धान्त को गलत नही कह सकते किन्तु गलती यह हुई कि माओवादी शक्ति अपने नेतृत्व को सही तरीके से स्थापित नही कर पाई ।
मैं स्वयं इसका प्रमुख हिस्सेदार था और यह गलती मैं स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ किन्तु प्रमुख गलती मेरी नही थी ।  कामरेड प्रचण्ड मुख्य नेतृत्व में थे । दो दशक से ज्यादा वो नेतृत्व में रहे । उनके आत्मकेन्द्रित, अस्थिर और ढुलमुल चरित्र के कारण वो सम्झौता में तो आते थे पर हमेशा अपने नेतृत्व और पद को केन्द्र में रख करसोचने की आदत के कारण परिवर्तन का मुख्य मुद्दा ही हाशिए पर चला गया ।  मेरे और किरण जी जैसे अनेक ईमानदार साथी भी सही काम नही कर सके ।
केपी शर्मा ओली इस परिवर्तन के सबसे बड़े विरोधी थे, माओवादी जनयुद्ध के सबसे प्रखर विरोधी वही थे । शान्ति प्रक्रिया में भी उनकी कोई खास रुचि नही थी । संघीयता उन्हें पहले भी पसन्द नही थी  और आज भी नही है ।  उनके साथ प्रचण्ड जी का जाना मुद्दे का खत्म करना था और यही कारण हुआ कि पुरानी शक्ति हावी हो गई ।
ममै.ने काफी कोशिश की उनसे स्पष्ट कहा कि माओवादी आन्दोलन ने हमें यहाँ तक लाया है पर आगे इस विचारधारा के साथ आगे नही बढ़ा जा सकता । आज के युग के साथ हमें अपनी सोच परिवर्तित करनी होगी इसे समाजवादी रूप देना होगा । पर उन्होंने मेरी बात नहीं मानी । मैंने उनसे कहा था कि आइए हम समाजवादी पार्टी बनाएँ ।  उपेन्द्र यादवजी और मैनें उनसे कहा कि अभी रुकिए एमाले में मर्ज मत होइए पर उन्होंने नहीं माना । दूसरी बार २०७४ असोज १७ गते एमाले के साथ चुनावी गठबन्धन होने के समय में भी मैंने फिर अपनी बात दुहराई थी पर इस बार भी मेरी बात उनहोंने नहीं सुनी । तीसरी बार ०७५ साल जेठ ३ गते एमाले के साथ औपचारिक रूप में पार्टी एकता घोषणा होने से पहले भी मैंने पुनm कोशिश की पर उन्हें समझाने में सफल नहीं  हो पाया । अभी के समय में उपेन्द्रजी और मेरी ०५२ साल के अग्रगामी शक्ति, ०६२।०६३ के जनआन्दोलन और उसके बाद का अग्रगामी, प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक और समाजवादी शक्ति एक जगह आकर एक शक्तिशाली समाजवादी केन्द्र बनाने का प्रयत्न है । यही राह अभी के समय में सही और उपयुक्त है ।

अमेरिका, चीन और भारत की रणनीति के बीच नेपाल
गणतन्त्र नेपाल के मार्गचित्र की अगर बात की जाय तो सबसे पहली बात यह है कि इसमें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आदि पक्षों का अन्तरनिहित होना है । अभी का विश्व अति अन्तरसम्बन्धित है । नेपाल का अत्यन्त जटिल भू–राजनीति है । चीन महाशक्ति के रूप में आगे बढ रहा है । भारत महाशक्ति होने के क्रम में है ।  अमेरिका भी इस क्षेत्र में अपनी दिलचस्पी दिखा रहा है । चीन की बीआरआई नीति, भारत की हिमाल मेरा है की नीति, अमेरिका की इन्डोप्यासिफिक स्ट्राटेजी, इन तीन नीतियों के बीच नेपाल है ।
इस अवस्था में सम्पूर्ण देशभक्त शक्ति और अग्रगामी शक्तियों को एक होना आवश्यक है ।   इसके लिए हिमाल, पहाड और तराई में रहने वाले आदिवासी जनजाति, मधेसी, थारु, खस आर्य, महिला दलित  समुदाय बीच में मजबूत एकता कायम कर, नेपाल के बाह्य भूराजनीतिक दखल को देखते हुए नेपाल के राष्ट्रीय स्वाधीनता की सुरक्षा करना हमारा दायित्व है ।

देश में बढ़ते द्वन्द्व का खतरा और संविधान संशोधन
संघीीयता के कार्यान्वयन में हुई देरी और संघीीयता विपरीत ऐन बना कर संघीीयता को कमजोर बनाने की जो  स्थिति है उससे देश में द्वन्द्व बढ़ने का खतरा बढ़ रहा है  ।
नेपाल के राज्य को संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र में रूपान्तरण किया गया है । इसको मजबूती के साथ सम्भाल कर गणतन्त्र, संघीयता और समावेशिता के पक्षधर शक्ति के बीच में एकता कायम करना होगा । संविधान की अपूर्णता को संविधान संशोधन के द्वारा दूर करना होगा । तब कहीं जाकर देश में शांति आ सकती है ।

सुशासन की आवश्यकता
देश में कुशासन, भ्रष्टाचार बढ रहा है । कल के क्रांतिकारी आज सत्ता दोहन में लगे हुए हैं । नौकरशाही, कमीशन के ऐजेन्ट में फँसना, हर निकाय में भ्रष्टाचार होना यह सब देश को विनाश की ओर ले जा रहा है । इसे रोकना और सुशासन लाना आज की अनिवार्यता है । जनता की गरीबी, बेरोजगारी, देश का आर्थिक विकास यह सभी ज्यों के त्यों हैं इन सबको दूर करना होगा तभी जनता के मन से निराशा का भाव निकलेगा । राजनीति के प्रति जो वितृष्णा का भाव जनता के मन में आ गया है उसे निकालना होगा । कल सभी पार्टी क्रांतिकारी थे पर आज सत्ता में पहुँच कर वो सिर्फ सत्ता का भोग कर रहे हैं । राजनीति आज धन्धा बन गई है । हमने जनता के मन में जो परिवर्तन और विकास का सपना भरा था आज सब अधूरा है । यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है । राजनीति निजी व्यवसाय नही है यह सेवा है पर आज इसका उल्टा ही दिख रहा है । हमें निरन्तर क्रांति की राह पर अग्रसर रहना चाहिए ।  युवाओं को राजनीति में दिलचस्पी लेने का माहोल बनाना चाहिए यही आज की आवश्यकता है ।

(रातो पाटी डटकम में प्रकाशित आलेख)

अनुवादकः डा. श्वेता दीप्ति

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