विकास के पथ पर धर्म का प्रवेश : रणधीर चौधरी
मधेश की जनता को अगर स्वास्थ्य उपचार करबाना हो तो धरान, काठमांडू की यात्रा करने पर विवश है
जाति बिशेष के नाम पर दलान का निर्माण करना कितना उचित माना जा सकता है ? दलित दलान बनाने से यह पता चलता है की ऊँची कहलाने वाली जातियों के लिए दलान है!

हिमालिनी अंक जुलाई २०१९ | पश्चिमी दार्शनिक फ्रेडरिक नित्से को सबसे ज्यादा अगर कुछ पसन्द नही था तो वह था यूरोप मे चल रहे क्रिश्चिन धर्म का आडम्बर । वे चर्च का हिसाब किताब रखना चाहते थे । चर्च शुद्धता की तलाश नित्से किया करते थे । नित्से का मानना था कि पादरी भगवान का भजन गा कर लोगों को ठग रहे हैं । तत्कालीन पादरी पैसा और प्रतिष्ठा के स्वार्थ मे बखूूबी डूब चुके थे । कथनी और करनी से उनलोगों का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नही होता था । दूसरों को पवित्रता का प्रवचन देने वाले पादरी खुद भीतर से बिगडेÞ हुए होते थे । उस समय यूरोप एक यात्रा पर आगे निकलना चाह रहा था ।
जलेश्वर जिला अस्पताल को अगर उदाहरण माना जाय तो अस्पताल खुद बीमार है ऐसा कहा जा सकता है
कुछ हद तक आगे निकल भी गया था । वह यात्रा थी नई सोच को युरोप मे लागु करने की । युरोप मे एक नए भविष्य का निर्माण हो रहा था जो बेतुके बातोंं के बहस में न उलझ कर बेहतर प्रामाणिक बातों में विश्वास कर देश की यात्रा को आगे बढाने की थी । अठारहवीं शताब्दी का चहलपहल एक सुन्दर सपना जैसा था और उन्नीसवीं सदी में उस वक्त का सपना साकार बनते देखा । विकास की रफ्तार चरम सीमा पर पहुँचना शुरु हो गया । यातायात हो या औद्योगिक क्षेत्र, पशुपालन हो अथवा खेतीपाती सभी क्षेत्र मे नई सोच दिखने लगी थी । परंतु नेपाल अभी भी धर्म के नाम पर अनावश्यक निवेश करने से नहीं कतराता है । नेताओं का क्या कहना, यहाँ की जनता की मानसिकता भी वही है । जैसी जनता वैसी नेता ।
विकास, संमृद्धि जैसे आयाम बड़े अमूर्त होते हैं । सड़क निर्माण को अगर विकास माना जा सकता है । परंतु वैज्ञानिक हिसाब से अगर सडक निर्माण नही किया जाय तो उसे विकास कहा जाना चाहिए या नही ? खानेपानी का व्यवस्थापन करना विकास हो सकता है पर उस का व्यवस्थापन अगर अर्थपुर्ण नही हो पाया तो उसे विकास माना जाना चाहिए ? विकास के लिए किया जाना वाला निवेश तो आखिर जनता के लिए ही किया जाता है न ? और सरकार या निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा किया जाने वाला निवेश भी जनता के लिए ही किया जाता है । और वह निवेश आमजनता के जीवन मे अगर अर्थ नही रखता हो तो उसे विकास के किस नमूना अन्र्तगत रखा जाना चाहिए ?
देश अभी धर्मनिरपेक्ष है (सैद्धान्तिक हिसाब से) फिर भी धर्म किसी भी देश के धरोहर के रूप में माना जाता है । परंतु आज के इस उत्तर आधुनिक युग मे भी धर्मरक्षार्थ किसी भी जनप्रतिनिधि के द्वारा मठमन्दिर, मस्जिद और गिरजाघर के भौतिक निर्माण मे बजट की नदी बहाता हो तो क्या उसे जनलोकहित कारी निवेश कहा जा सकता है, नेपाल जैसे गरीब मुल्क में ? पिछले समय कुल पाँच दिन के लिए अपने गृह जिला महोत्तरी मे समय व्यतीत करने का मौका प्राप्त हुआ । और मैंने अभी जिला में चल रहे विकास की हवा को महसूस करने की कोशिश की थी ।
महोत्तरी मे चार संसदीय निर्वाचन क्षेत्र मे मठमन्दिर, ब्रम्हबाबा (गाँव के कुलदेवता), दलित दलान जैसे जगह के लिए विकास बजट का अत्याधिक निवेश किया जा रहा है । क्षेत्र नं ४, ३, २ में कड़ोड़ों रकम मन्दिर और मस्जिद में लगाया जा रहा है । तुलनात्मक रूप में क्षेत्र नं । १ जहाँ से नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी से गिरिराजमणी पोखरेल निर्वाचित हैं वहाँ रे शुद्ध खानेपानी मे निवेश किया गया है । कारण यह है कि महोत्तरी के उत्तरी भाग मे पड़ने वाले इलाकों में पानी का सदाबहार समस्या । वरना पोखरेल के पार्टी के सुप्रीमो ने तो क्रिश्चन धर्म गुरु के हाथ से ‘होली वाइन’ पान कर के देश मे चर्चा कमाने मे सबको पीछे छोड़ा है ।
जिस तरह विकास के नाम पर धार्मिक स्थलाें मे पैसा निवेश किया जा रहा है उसे देख अभी नेताओ से ज्यादा उम्मीद भी नहीं किया जा सकता है । यह प्रवृति सिर्फ संघीय साँसदो का नहीं है अपितु प्रदेश के मन्त्री, नेता और स्थानीय सरकार के प्रतिनिधियाें का भी वैसा ही है । ऐसा कर के न जाने महोत्तरी के नेतागण क्या सिद्ध करने के प्रयास में लगे हुए हैं । वैसे महोत्तरी एक प्रतिनिधि जिला है अवस्था कमोवेस सभी जिलों में एक ही जैसा है । आए दिन समाचार मे ऐसे विकास का समाचार पढ़ने को मिलता है हमें ।
देश में संघीयता की जननी कहलाने वाली मधेशवादी दलों को प्रदेश सरकार को दिए गए अधिकार ही आमजनता को संघीयता की अनुभूति करबा सकता था । प्रदेश २ में मधेशवादी दलाें की सरकार है । स्थानीय सरकार मे भी अधिक स्थान पर मधेशवादी दलों का ही कब्जा है । मानव जीवन से सम्बन्धित प्रत्यक्ष सरोकार का क्षेत्र जैसे की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा में बजट का वैज्ञानिक निवेश न कर के कमीशन की गोली खा कर न किसी प्रदेश का कल्याण हो सकता है और ना ही किसी देश का ।
अब चर्चा करे दलित वा सामुदायिक दलानो में बजट का । अभी का युग ग्लोबल विलेज’ का युग माना जाता है । जाति बिशेष के नाम पर दलान का निर्माण करना कितना उचित माना जा सकता है ? दलित दलान बनाने से यह पता चलता है की ऊँची कहलाने वाली जातियों के लिए दलान है । तो क्या समाज इतना पीछे चल रहा है कि समाज के हर एक लोग एक ही दलान में एक साथ रह नहीं सकता ? क्या ऐसे भेदभाव को रोकने के लिए प्रदेश सराकार को अग्रसरता लेने की आवश्यकता नही है ? राजनीति मे धर्म का अगर मिलन हो जाए तो आम जनता को दुख झेलना पड़ता है । जैसे उपर उल्लेख किया गया है युरोप मे भी अवस्था वैसी ही थी । धर्म की आड़ में देश पीछे जा रहा था । परंतु समय पर सचेत होने के बाद युरोप प्रगति की राह पर चल पाया था ।
हमारे सन्दर्भ मे भी कुछ ऐसा करना आवश्यक है । अभी का समय पूजा पाठ और अर्थहीन दानदक्षिणा का युग नही है । धर्म सेवामुखी होना चाहिए । गरीब जनता के जीवन मे कैसे खुशियाली आ सकती है उस दिशा में धर्म का रास्ता आगे बढना जरुरी है । मधेश की जनता को अगर स्वास्थ्य उपचार करबाना हो तो धरान, काठमांडू की यात्रा करने पर विवश है । मधेश की बीमार जनता बडे पैमाने पर भारत जाने को भी विवश होते हंै । जलेश्वर जिला अस्पताल को अगर उदाहरण माना जाय तो अस्पताल खुद बीमार है ऐसा कहा जा सकता है । अस्पताल मे आधुनिक उपरकणो का अभाव है । रेडयोलोजी से सम्बन्धित चिकित्सक नियुक्त हैं परंतु उपकरण के अभाव मे लोगों को सेवा नही दिया जा रहा है । अस्पताल के शवगृह मे खड़ा होने की आवस्था नही है । शुद्ध खानेपानी तक का अभाव है जलेश्वर अस्पताल में । उच्च शिक्षा के लिए मधेश के विद्यार्थी काठमांडू या भारत पलायन होने को मजबूर हंै ।
मठमन्दिर मे निवेश करना बिल्कुल गलत नही हो सकता है । परंतु सवाल है कि प्राथमिकता किस चीज को देनी चाहिए ? अभी युग वैश्य युग है । धर्म संस्कृति का संरक्षण करना तो अच्छी बात है परंतु क्या उसमे हम वैज्ञानिकता नही ला सकते है ? युग के मुताबिक राज्य की ओर से किए जानी वाले हरेक निवेश की उपलब्धि आना अतिआवश्यक माना जाता है । जो दिख नही रहा है, धार्मिक निवेश में ।
दुनिया की दौड़ में रहना है तो हमें कर्मकाण्ड से परहेज रखना होगा । और विश्व के सामने नमूना बनने की चेष्टा करनी होगी ।

