Tue. Oct 22nd, 2019

राजनीतिक क्षेत्र में युवाओं की बढ़ती असंतुष्टि : अंशु झा

हिमालिनी पत्रिका, अंक जुलाई । राजनीति शब्द दो शब्दों के मेल से बना है (राज+नीति ) राजनीति । राजनीति का शाब्दिक अर्थ है राज पाट चलाने की नीति । मनुष्य जब सभ्य हो गये तो उसे अपने परिवार, समाज व राष्ट्र को चलाने के लिये एक मुखिया, प्रमुख की आवश्यकता हुई । प्रमुख की आवश्यकता इसलिये हुई ताकि उस परिवार, समाज व राष्ट्र को एक सूत्र में बांधकर आगे की ओर ले जाय । मनुष्य को हमेशा प्रगति की ओर बढ़ना ही चाहता है । क्योंकि आगे बढते रहना, संतुष्ट न होना मनुष्य का स्वभाव है । इसी स्वभाव के कारण मनुष्य आज यहां तक पहुंच पाया है अर्थात विकाशोन्मुख है ।  इस प्रकार उस समय लोगों ने एक प्रमुख का चुनाव कर उसे अपने समाज व राष्ट्र के हित में कुछ निर्णय लेने का अधिकार दिया । वही निर्णय अपने देश अपनी ही जनता के हित के लिये जो नीति नियम बना वही राजनीति कहलाया । परन्तु वर्तमान में यह सारी बातें जनता के अहित में ही हो रही है ।
नेपाल में जनता ने अपनी स्वतन्त्रता तथा अधिकार के लिये बार बार युद्ध किया । कितनी मांओं की गोदें सुनी हुयी, कितनी महिलाओं के मांग उजड़ गए । कितने बच्चों के पिता छीन गए । परिणामश्वरुप वि.सं. २००७, २०३६, और २०४६ के सशस्त्र संघर्ष और जनआंदोलन से जनताओं ने सीमित अधिकार प्राप्त किया । परन्तु वह सीमित अधिकार भी वि.सं. २०१७, २०३६ और २०५८ में छीन लिया गया । वही छीना गया अधिकार प्राप्त करने के लिये जनता को बार बार संघर्ष करना पड रहा है । जनयुद्ध और जनआंदोलन के मिलावट से वि. सं. २०६३ का परिवर्तन संविधान द्वारा संस्थागत हुआ । परन्तु संविधान कार्यान्वयन होने से पहले ही राजनीतिक धरातल पर काला साया मंडराने लगा ।
२०७२ साल के आश्विन ३ गते को नयां संविधान जारी किया गया । नेपाल की संपूर्ण जनता उस संविधान से संतुष्ट नहीं हुयी । उस दिन किसी ने खुशिया मनाई तो असंतुष्ट पक्ष ने मातम मनाया । कहीं पर दीप जलाया गया तो कहीं काला दिवस । इन सारी उलझनों के बाबजुद भी जनता में कहीं न कहीं कुछ आशा की किरण अवश्य झलक रही थी । उनमें एक नयापन तो दिखा, जो भी हुआ अब हमारे देश का भविष्य अच्छा हो यही आश सबके मन में थी । नया निर्वाचन में बामपंथी गठबन्धन भारी मतों से विजयी हुआ, क्योंकि जनता परिवर्तन चाहती थी । नेकपा सत्तारुढ हुआ । फिलहाल नेकपा के अध्यक्ष केपी ओली के नेतृत्व की सरकार चल रही है । वह रात दिन अपने काम में लगे हुये हैं । दूसरे अध्यक्ष प्रचण्ड भी व्यस्त ही दिखते हैं । विपक्षी दल कांग्रेस भी विभिन्न जागरण अभियान द्वारा सक्रिय दिख रहे हैं । अन्य पार्टी भी खूब मेहनत कर रही है । परन्तु जनता में आशा की किरण कहीं दूर–दूर तक नजर नहीं आ रही है । सभी में निराशा का बोध हो गया है । नेताओं के प्रति जनता तथा कार्यकर्ता में विश्वास समाप्त हो गया है । युवाओं में राजनीति के प्रति वितृष्णा आ गई है । पार्टी संचालन का रबैया तथा नेतृत्व वर्ग की कार्यशैली एवं आचरण को देखकर युवाओं में राजनीति के प्रति खिन्नता का बोध हो रहा है । अतः स्वाभाविक है कि राजनीति में युवावर्ग की सहभागिता कम होना ।
अब सवाल यहां यह उठता है कि अगर युवावर्ग राजनीति में सहभागी न हो तो राजनीति का भविष्य कैसा होगा ? भविष्य में देश को कौन चलायेगा ? देश का भविष्य तो युवा ही होते हैं । एक तो हमारे देश में बेरोजगारी के कारण युवाओं की संख्या न्यून ही हो गई है । प्रायः युवा रोजगार को ढूंढते ढूंढते खाडी मुल्क की ओर प्रस्थान कर रहे हैं । क्योंकि भूख तो मनुष्य को मजबुर बना देता है और दरबदर की ठोकर खाना होता है । क्योंकि हमारा देश किसी भी क्षेत्र में किसी भी दृष्टिकोण से सुरक्षित नहीं है । चाहे वह रोजगार हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या कुछ भी । सभी क्षेत्र में मैच फिक्सिंग रहता है । योग्यता का महत्व तो यहां नहीं के बराबर है विद्यावारिधी योग्यता हासिल करने के बाद भी यहां रोजगार पाना असम्भव है ।
इस प्रकार की परिस्थिति लाने का जिम्मेदार कौन है ? यह सब किसने किया ? हम उेसे सवालों का उत्तर कभी कभी ढूंढने लग जाते हैं और इसमें उलझ कर रह जाते हैं । क्योंकि इसका जबाब ढूंढ पाना बहुत मुश्किल है । इस प्रकार की परिस्थिति लाने में सायद किसी एक पार्टी या कोई एक नेता से सम्भव नहीं हो सकता है । इसके लिये सभी जिम्मेदार है । परन्तु कोई स्वीकार नहीं करते । सब एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपना दामन साफ करना चाहते हैं ।  अगर ये लोग अपनी–अपनी कमजोरी को सुधारने की हिम्मत नहीं करेंगे तो प्रतिक्रान्ति की पुनरावृति अवश्म्यभावी है ।
निष्कर्षतः युवा देश का, राजनीति का मेरुदण्ड होता है । फिलहाल राजनीति में विकृति आने के कारण युवाओं की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही है । वह इससे दूर भाग रहे हैं । और यह भी स्पष्ट है कि युवाओं की सहभागिता बिना सूचना संचार और ज्ञान का भण्डारण और उसका प्रयोग करना सम्भव नहीं है । आज तक देश में जितनी भी क्रान्ति आई है, सभी में सबसे महत्वपूर्ण योगदान युवाओं का ही है । जितना भी रक्त बहा वह सब युवा का ही था । अर्थात् युवाओं के बिना देश हांकना असम्भव है । दुख की बात तो यह है कि इतने सारे बलिदान देने के बाबजूद भी युवाओं का स्थान सुरक्षित नहीं है । देश को उसी पुराने विचार, संगठन और कार्यशैली के आधार पर चलाया जाता है । इतने सारे संघर्ष व त्याग के बाद  भी वही रुढिवादी विचारों को स्थापित रखा जाता है । कुछ परिवर्तन नही होता । अतः हम कह सकते है कि युवा जो देश के कर्णधार होते हैं वही इस राजनीतिक गतिविधि से असंतुष्ट है । देश का भविष्य अन्धकार की ओर जा रहा है ।

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