Mon. Sep 16th, 2019

भारत के लोगों पर नेपाल सरकार द्वारा पाबंदी, विशेष सम्बन्ध पर प्रहार : ललित झा

ललित झा, जयनगर, बिहार भारत । आज के समय में भारत नेपाल संबंध की दशा -दिशा और इसके मनोबिज्ञान को समझने की जरूरत है। कुछ तथ्यों पर गौर करने की जरूरत है, हाल ही सम्पन्न भारत नेपाल संयुक्त आयोग की बैठक में भारत सरकार ने नेपाल के भूकंप पीड़ित लोगों के घर के पुनर्निर्माण हेतु 2.45 बिलियन तथा मधेस मे सड़क नेटवर्क के निर्माण तथा बिस्तार हेतु 1.29 बिलियन रुपया नेपाल सरकार को मदद स्वरूप दिया है ताकि आम नेपाली लोगों की मदद और विकास हो सके , इसके उलट नेपाल की सरकार ने भी एक कार्य किया है, उसने 18 अगस्त से भारत के लोगों पर एक पाबंदी लगाया है, अब भारत के लोग अपनी गाड़ी लेकर नेपाल एक वर्ष मे 30 बार से अधिक नेपाल नही जा सकेंगे, 30 बार से अधिक न निजी वाहन लेकर जा सकेंगे और न ही कॉमर्शियल वाहन, यानी की भारतीय लोगों के नेपाल यात्रा को सीमित करने का प्रयास हो रहा है,

नेपाल सरकार के इस निर्णय का मतलब ये है कि अब भारत या फिर सीमावर्ती इलाके के लोग अब अपनी नेपाल में ब्याही बेटीयों, और बहनों के यहाँ अपनी गाड़ी से एक साल में 30 से अधिक बार नही जा सकेंगे,

पूर्व में भी नेपाल सरकार ने भारत से ब्याह कर नेपाल जानेवाली लड़कियों पर नागरिकता संबंधी कई प्रतिबंध लगाया हुआ है, जिसका परिणाम ये हुआ है की बिगत 5 वर्षो कालखंड मे भारत – नेपाल के बिच् होनेवाले शादियों मे करीब 25 से 30 प्रतिशत की कमी हो चुकी हैं,
ये कितने विडंबना की बात है कि किसी तीसरे देश के सामानों तथा दिल्ली- काठमांडू के बिच ब्यापार हो सकता हैं लेकिन जनकपुर- जयनगर या सिरहा- जयनगर के किसानों द्वारा उत्पादि कृषि उत्पाद का क्रॉस बॉर्डर ब्यापार नही हो सकता। जनकपुर और सिरहा का आम, जयनगर बिहार में नही बिक सकता और जयनगर का गन्ना और सब्जी सिरहा, जनकपुर मे नही बिक सकता, इसपर अनेक पाबंदियाँ है, क्यों है नही पता?

जब भी नेपाल जाना होता है अपने रिश्तेदार के यहाँ, बाइक से जाने पर प्रतिदिन 120 रुपया की दर से, भंसार पर टैक्स चुकाना पड़ता है और चार पहिया वाहन से जाने पर करीब 300 रुपया देना पड़ता है, यानी हमे अपने बहन, बेटी और ससुराल जाने के लिए टैक्स देना पड़ता है, एक तरह से ये हमारे बिच सदियों से कायम बेटी- रोटी के रिश्ते पर टैक्स है जो मुगलों द्वारा हिंदुओं के धार्मिक यात्रा पर लगाया गया जजिया कर के समान है,

इसके बिपरित भारत में नेपाल के लोगों को भारतीय नगरिकों जैसी सुबिधायें प्राप्त है और नेपाल के लोगों पर समान्यताया किसी तरह की पाबंदियाँ नही है, फिर हमारे ऊपर ऐसी क्रूर पाबंदियाँ क्यों लगाई गई है? क्या यह भारत- नेपाल के बिच् सदियों से कायम बेटी- रोटी के रिश्ते को कमजोर कर खत्म करने की साजिश तो नही? कहीं दोनों देशों के सीमावर्ती इलाके के लोगों के बिच मौजूद सामाजिक आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को खत्म करने का प्रपंच तो नही किया जा रहा है? बरना एक तरफ नेपाल visit nepal-2020 मनाने की तैयारी कर रहा है, सारी दुनिया के सैलानियों को बुलाया जा रहा है फिर भारत के लोगों पर इस तरह की पाबंदियाँ, समझ से परे हैं,। नेपाल सरकार के ऐसे कदमों से, नेपाल की भारत नीति की दशा और दिशा का पता चलता है, वर्तमान में नेपाल की भारत संबंधी नीतियों के दो प्रमुख आयाम है, अधिक से अधिक आर्थिक सहायता प्राप्त करना, और चीन कार्ड खेल कर भारत को नेपाल में हाशिये पर ढकेलना जिसे नेपाल के कुटनीति मे भारत को साइज मे लाना कहते हैं,, बदले मे भारत के तरफ से होने वाले उच्चस्तरिये राजनीतिक भ्रमण मे नेपाल के द्वारा प्रतिकात्मक रूप से कुछ अलंकारिक करके खुश करने का बस प्रयास भर होता है। भारत के राजनीतिक नेतृत्व् की नासमझी कहें या अज्ञानता, दरअसल उन्हें पता ही नहीं की किस तरह से नेपाल की तरफ से भारत नेपाल मैत्री की डोर को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है, लेकिन यह दोनों देशों के बिच् हाल ही मे हुये संयुक्त आयोग की बैठक में कोई मुद्दा नहीं बना, जबकि भारत नेपाल मैत्री संबंध के लिए यह एक जरूरी मुद्दा है जिसपर गंभीरता पूर्वक विचार होना चाहिए लेकिन नही हुआ, विदेश मंत्री श्री एस जयशंकर काठमांडू आये, नेताओं से मिले, पैसा दिया और चले गये,। भारत की नेपाल नीति मे एक अजीब तरह का बेबकुफ़नापन और निश्चिंतता है, जो उस समय उजागर हुआ था जब EPG का गठन हुआ था, जिसका परिणाम सामने है। आजकल नेपाल में भारत का विरोध एक फैशन बन चुका है, जो राजनीति, मीडिया, और बौद्धिक बिमर्शों मे देखा जा सकता हैं, नेपाल के पहाड़ी वर्गों मे भारत के प्रति ब्याप्त असंतोष को आप तथाकथित नाकाबंदी का परिणाम कहें या फिर भारतीय नीति नियंताओ की विफलता का परिणाम, या बामपंथी नेताओं की तथाकथित राष्ट्रवादी राजनीति, लेकिन यह आज की एक बड़ी सच्चाई है कि नेपाल में आज भारत विरोधी एक वर्ग तैयार हो चुका है जो हमेशा उतराभिमुख् रहते हैं और बीजिंग के इशारे पर भारत के खिलाफ माहौल बनाने के लिए तैयार रहते हैं। इस सबका परिणाम आज सबके सामने है, जब नेपाल के तरफ से कश्मीर को लेकर भारत के समर्थन में एक अदद बयान तक ज़ारी नही कर सका क्योंकि नेपाल पर चीन का दवाब रहा होगा अन्यथा कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और उसपर नियम बनाने का भारत को अधिकार है फिर इस पर नेपाल की चुप्पी समझ से परे हैं। अतः कहने का तात्पर्य यह की जहाँ एक तरफ भारत अपने वैश्विक और घरेलु चुनौतियों से निबटने मे सफलतापूर्बक लगा है, मोदी सरकार की “पड़ोसी सबसे पहले” की नीति का नेपाल के संदर्भ में कोई खाश साकारात्मक असर नजर नही आ रहा, वही नेपाल की भारत नीति आज खामोशी से भारत विरोध की राह पर अग्रसर है, जबकि भारत अरबों रुपया प्रति वर्ष नेपाल के विकास पर खर्च कर रहा है। यदि भारत नेपाल मैत्री संबंध को चीन की चुनौतियों के बिच, कालजयी बनकर रहना है तो दोनों देशों और दोनों देश के लोगों को अपने जीवन से जुड़े अपने छोटे छोटे जरुरतों और समस्यायों को समझना होगा और इसके लिए आवाज उठाना होगा, पहल करना होगा वरना यदि हम यूँ ही खामोश रहे तो वह दिन दूर नही जब हमारे बिच युगों से कायम बेटी- रोटी का संबंध इतिहास बन जायेगा। हमे अपने अटुट संबंध को सहेजना होगा, उसे मजबूत रखना होगा, यह संबंध हमे बिरासत मे मिला है जिसे हम सदियों से सींचते आये है और ये हमारी जिम्मेवारी है कि हमारा संबंध युगों युगों तक अटल अटुट बना रहे।

ललित झा बिहार भारत के लेखक तथा पत्रकार है।

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1 thought on “भारत के लोगों पर नेपाल सरकार द्वारा पाबंदी, विशेष सम्बन्ध पर प्रहार : ललित झा

  1. Why is the long process of taking permission from Indian Embassy for Nepal’s vehicle to enter into India? Nepal is very easier as compared to Indian behavior to Nepal. There should be equality.

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