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“अन्धेर नगरी चौपट राजा” लाहान के मेयर साहब इससे अलग नहीं

मनोज बनैता, लाहान, ९ सेप्टेम्बर ।

मनाेज बनैता

अंधेर नगरी भी ऎसी ही एक काल्पनिक जगह है जहां सब कुछ विचार हीन है । कोई तर्क नहीं चलता, कोई विचार नहीं कोई औचित्य नहीं । स्थानियों के हाथ में इतनी शक्ति भी नहीं की वह मेयर को सुधार सके। राजा प्रजा का मुखिया होता है । अगर वही चौपट है, तो प्रजा उसी के हाँ में हाँ मिलाएगी और विचार हीन, न्याय हीन रहेगी । जहां का मुखिया और उसके फालोअर्स तर्क संगत बातें न करें, विचार को तिलांजलि दे दें, उनके सन्दर्भ में उपरोक्त कहावत कही जाती है । मेयर सुगठित प्रशासन, भौगोलिक समृद्धि और समाजिक न्याय के लिए जाने जाते है । जिस नगर का  मेयर बिना विवेक के, बिना विचार के, बिना उचित न्याय के, बिना नगरवासी के हित को सोच कर कार्य करता है वह चौपट मेयर कहलाता है । मेय रका “मूड” किस बात पर बिगड़ जाए, किस बात पर बन जाए, कहा नहीं जा सकता । अपने कार्य-कलापों में वह unpredictable तथा, विचार हीन होता है, जिसकी सज़ा मासूम नगरवासियोंको को भी भुगतनी पड़ती है । एक निर्दोष सज़ा पा सकता है और एक दोषी सम्मान । अगर लाहान नगरपालिका का अवस्था देखें तो यह नगरपालिका अन्धेर नगरी से कुछ कम नहीं और यहाँ के मेयर साब चौपट दिखाई दे रहे हैं । यहाँ की जनता जनप्रतिनिधियो से बहुत ही पीडित है । इसकी मुख्य वजह है मेयर लगायत के जनप्रतिनिधि का नेतृत्वदायी नहीं होना । दरअसल नेतृत्व करना खुद में एक कुशलता है । हर व्यक्ति हर एक चीज़ नहीं जान सकता, लेकिन जो नेतृत्व करना जानते हैं वे व्यक्तियों के होशियारी और टैलेंट को सही समय पर निकाल कर उपयोग कर सकते हैं। पर यहाँ पर ऐसा कुछ देखने काे नहीं मिल रहा है । ड्म्पिङ्ग विवाद को मेयर अपने कुशलता से समाधान कर सकता था पर हुवा नहीं । उनके दम्भ ने समस्या को और जटिल बना दिया है । अगर वह चाहते तो लक्ष्य का निर्धारण, टैलेंटेड और होशियार व्यक्तियों की तलाश, समझने की क्षमता, परियोजना की समस्याएँ और सुधारने के उपाय, लोगों में विश्वास जगाना, बातचीत करने की कुशलता , अनुशासन तथा उचित समय का उपयोग कर सकते थे । नेतृत्व करने वाले हमारे मेयर साहेब को चाहिए कि पूरी घटना को एक सम्यक रूप में देखे फिर उसके लिए इकाई चुनें कि किससे क्या काम कराना है । कौन सी क्षमता कहाँ कारगर होगी । उसके बाद कार्य करने की इकाई को हर एक टैलेंटेड और होशियार व्यक्तियों में बाँट दें । फिर उन व्यक्तियों से कार्य के प्रगति का फीडबैक लेते रहें और कोई सुधार की आवश्यकता होती है तो बताते और समझाते रहें । लेकिन मेयर साब जब देखो दमन करके लोगो की सही आवाज को दबाने की कोशिश में अपनी उर्जा खर्च कर रहे होते है । सत, रज, तम ये तीन मानव प्रकृति के गुण हैं. “अहंकार” तमस गुण का प्रतीक है. वैसे तीनों गुण हर एक व्यक्ति में रहते हैं और कुछ ज़्यादा कुछ कम के संतुलन से मनुष्य का स्वभाव बनता है । एक सीधा सादा व्यक्ति, जिसमे सत गुण अधिक हों, किसी सत्ता, धन या और भी लालच के प्रभाव में “तमस” गुण से अकस्मात प्रभावित हो सकता है । उस समय उसका सत गुण कम हो जाता है और तम गुण बढ़ जाता है । ”अहंकार” का बढना इसी प्रकृति के आधीन है । जब व्यक्ति अपने को औरों से तुलना कर के अपने को उच्चता की श्रेणी में रखने लगता है, उसके विचार तामसिक गुण या “अहंकार” को बढाने लगते हैं । मेयर साबका अहंकार कुछ वैसा ही है । वह अपने आपको और जनप्रतिनिधियो से तुलना करते है और फिर उनके ज्ञान को अहंकार अपने चादर मे लपेट लेता है ।

ये लेखक के अपने विचार हैं

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