नेपाल और श्रीलंका की राजनीतिक विचारधारा में चीन की साम्यवादी विचारधारा हावी
चाहे बात नेपाल की करें या श्रीलंका की, भारत से सटे इन दोनों पड़ोसी देशों की राजनीतिक विचारधारा में चीन की साम्यवादी विचारधारा हावी हो रही है। जहां नेपाल में सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) चीन के साथ कदमताल करने की कोशिश में हैं, तो वहीं श्रीलंका में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों के उम्मीदवार गोतबाया राजपक्षे भी चीन के साथ फिर से संबंध बहाली के पक्षधर हैं।
रानिल विक्रमसिंघे हैं भारत समर्थक
असल में श्रीलंका की राजनीति भी भारत-चीन के आसपास घूमती रही है। श्रीलंका के वर्तमान प्रधानमंत्री यूनाइटेड नेशनल पार्टी के रानिल विक्रमसिंघे को भारत समर्थक माना जाता है, तो वहीं पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को चीन समर्थक माना जाता है। राजपक्षे ने इस बार राष्ट्रपति चुनावों के लिए अपने भाई गोतबाया राजपक्षे को श्रीलंका पीपुल्स फ्रंट पार्टी से उम्मीदवार के तौर पर खड़ा किया है। गोतबाया भी अपने भाई की तरह चीन के कट्टर समर्थक हैं।
गोतबाया को चीन का समर्थन
वहीं गोतबाया का कहना है कि अगर वे 16 नवंबर को होने वाला राष्ट्रपति चुनाव जीतते हैं, तो वे चीन के साथ संबंधों को मजबूती देंगे। श्रीलंका के मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने जनवरी 2015 में राष्ट्रपति बनने के बाद देश में चीन के निवेश वाली सभी परियोजनाओं पर रोक लगा दी थी। उनका कहना था कि चीन की कंपनियों को दिए गए इन प्रोजेक्ट्स में भ्रष्टाचार, ज्यादा कीमत और सरकारी प्रक्रियाओं की धज्जियां उड़ाई गईं। लेकिन कुछ वक्त बाद सिरिसेना सरकार ने कुछ बदलावों के बाद उन प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दे दी। लेकिन दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं।
गोतबाया पर भ्रष्टाचार के आरोप
पूर्व रक्षा सचिव और रक्षा मंत्री रह चुके गोतबाया राजपक्षे का कहना है कि अब हमें चीन दूसरी नजरों से देख रहा है और वे चीन से संबंध बहाली के लिए तैयार हैं। वहीं सिरिसेना ने हाल ही में एक बयान देकर वहां की राजनीति में तूफान ला दिया है। उन्होंने दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा लोटस टावर बनाने के लिए चीनी कंपनी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। जिसके बाद वहां की संसद में बवाल मच गया। इसका खंडन न तो चीन की कंपनी ने किया और न ही वहां स्थित चीनी दूतावास ने।
अमेरिका की नागरिकता लेने का आरोप
गोतबाया राजपक्षे के हवाले से उनके एक सलाहकार का कहना है कि अगर हम चीन को नाराज करके ये सोचते हैं, तो पश्चिमी देश हमारे यहां सोने के भंडार लेकर आएंगे, लेकिन इनका आप कभी इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। गोतबाया पर पहले से ही कई भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं और उन पर अमेरिका की नागरिकता लेने का आरोप है, क्योंकि श्रीलंका में दोहरी नागरिकता को मंजूरी नहीं है। वहीं उन पर अल्पसंख्यकों और मानवाधिकारों के हनन के भी आरोप लगे हैं।
भारत ने भी दी थी चेतावनी
साथ ही, भारत से भी गोतबाया के संबंध ठीक नहीं हैं। 2014 में चीनी पनडुब्बी चांगझेंग-2 एक बार श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट पर आकर रूकी थी, जिसपर भारत ने नाराजगी जताते हुए तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने उस दौरान रक्षा मंत्री गोतबाया को चेतावनी दी थी। राजपक्षे का यह चीनी प्रेम पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले महिंद्रा राजपक्षे के ही कार्यकाल में हंबनटोटा बंदरगाह को चीन को कई वर्षों की लीज पर दिया गया था, साथ ही कोलंबो के बंदरगाह को बनाने और चीनी पनडुब्बियों को श्रीलंका के बंदरगाह तक आने की अनुमति दी थी।
राजपक्षे पर विक्रमसिंघे सरकार को कमजोर करने का आरोप
इससे पहले महिंद्रा राजपक्षे ने साजिश रच कर राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना के जरिये मौजूदा प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को पद से हटा कर खुद प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली थी। जिससे वहां संवैधानिक संकट पैदा हो गया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायलय के दखल के बाद राजपक्षे ने पद से इस्तीफा दे दिया था। माना जाता है कि इस तख्तापलट के पीछे चीन का हाथ था। हालाकिं राजपक्षे भाजपा नेता सुब्रमण्यन स्वामी के बुलावे पर भारत आ चुके हैं, साथ ही श्रीलंका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भी राजपक्षे से मुलाकात की थी। वहीं अगर उनके भाई गोतबाया राष्ट्रपति बनते हैं, तो मौजूदा सरकार पर फिर संकट के बादल गहरा सकते हैं और हिंद महासागर में चीन के लिए दरवाजे एक बार फिर खुल सकते हैं।
अमर उजाला से साभार

