Sun. Nov 17th, 2019

उफ ! ये अकेलापन

आज के इस भौतिकवादी युग में हमारे सामाजिक मूल्यों व रहन-सहन में अत्यधिक बदलाव आया है। जहाँ पहले इन्सान अपने दिन की शुरुआत बडÞे-बुजर्ुगाें के आशर्ीवाद से करता था, वहाँ आज का इंसान अपने दिन का शुभारम्भ इन्टरनेट पर माथा टेक कर करता है। पहले वह रिश्तों की गरिमा को बनाए रखने के लिए जद्दोजहद करता था और अब उन रिश्तों से छुटकारा पाने के लिए छटपटाता है। क्योंकि आज उसका रिश्ता व अपनत्व उसके अकेलेपन से जुडÞता जा रहा है। हालही में एक न्यूज चैनल पर प्रसारित ‘आप पर असर क्यों नहीं होता -‘ नामक स्पेशल रिपोर्ट ने मेरे दिल-दिमाग पर गहरा असर किया।
इस रिपोर्ट में दिल्ली व मुर्म्बई जैसे महानगरों में उन लोगों के जीवन पर प्रकाश डला गया, जो अकेलेपन के साये में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ताजुब की बात यह रही कि इन लोगों का हरा-भरा परिवार होने के बावजूद उनका साथी अकेलापन व खौफनाक सन्नाटा ही है। इसमें सबसे पहले नोएडा में रह रही दो बहनों सोनाली व अनुराधा के बारे में दिखाया गया। जिनके भाई ने माता-पिता की मृत्यु के बाद उन्हें अकेला छोडÞ दिया । और दोनों बहनों ने उसी अकेलेपन को अपना सहारा बनाकर खुद को घर में नजरबन्द कर लिया। वे केवल परिवार ही नहीं बल्कि समाज से भी कटकर दो जिन्दा लाशों में तब्दील हो गईं। जब पुलिस ने छानबीन की तो अनुराधा कमरे के एक कोने में मृत मिली और सोनाली भी मौत की कगार पर खडÞी थी। जब इनके पडÞोसियों से बात की गई तो उन्होंने पर््राईवेसी यानी दखलअंदाजी न देने की बात करते हुए अपना पल्ला छाडÞ लिया।
इसी तरह मुबर्ंइ में रहने वाली ‘पल्लवी पुरकायस्थ’ की हत्या भी उस का अकेलापन बताया जाता है। और तो और दिल्ली के रजौरी गार्डन में रह रही मशहूर प्रोफेसर तारा जोकि डÞाँस टीचर भी थी, जिनके घर कभी मशहूर अभिनेत्रियाँ जैसे रेखा, हेमामालिनी नृत्य सीखने आया करती थी। आज उन्हीं प्रोफेसर तारा का वास्ता केवल घर में रखे कबाडÞ, सन्नाटे, धूल, मिट्टी व बदबू से है। इन सभी दिल दहला देने वाली सच्ची घटनाओं ने पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर प्रश्नचिहृन लगाया है, जिनके तले इंसान सम्बन्धों को स्थापित करते हुए परिवार व समाज का निर्माण करता है। दिल्ली और मुर्म्बई जैसे भीडÞभाडÞ वाले इलाकों में भी इंसान अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने को आखिर मजबूर क्यों हो जाता है –
आज सोनाली, अनुराधा, पल्लवी या प्रोफेसर तारा जैसे लोगों की गिनती में इजाफा हो रहा है। पर इनकी बदत्तर जिन्दगी का जिम्मेदार आखिर कौन है – वे खुद, उनका परिवार या समाज – अगर देखा जाए तो सच्चाई यह है कि इन्सान कामयाबी के इस दौर में पहले स्वयं को इतना व्यस्त कर लेता है कि वह परिवार व समाज से दूरियाँ बनाने लगता है। परन्तु वह अकेलापन उसके जीवन को गर्त की ओर ले जाने लगता है तो उसका जीवन नरक बन जाता है और जब उसे परिवार या समाज की कमी महसूस होती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आज इन्सान दिनभर की व्यस्तता के बाद फेसबुक पर तालमेल बनाना तो पसंद करता है परन्तु पारिवारिक व सामाजिक गतिविधियों से मुँह मोडÞ लेता है जोकि रिश्तों की नींव की चूलें हिला देने में काफी है। इसलिए महानगरों में स्थिति गम्भीर होती जा रही है। यदि आज इंसान समय रहते इस समस्या के प्रति जागरूक न हुआ तो वह दिन दूर नहीं, जब यही समस्या महामारी बनकर लोगों के जीवन को लील जाएगी।

 

डा. प्रीत अरोडा

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