खामोशी : रंजना फतेपुरकर
फ़िज़ाओं में बिखरी खामोशी
आवाज़ देकर मुझे पुकारती है
और महकने लगते हैं अहसास
दरख्तों के घने साए में
फलक से उतरकर चाँद
जमीं पर मुस्कराता है
सितारों का कारवां
नीले अम्बर में
यादों की महफ़िल सजाता है
रात के गालों पर
बहने लगते हैं आंसू
और तुम कहते हो
रातरानी की कलियों पर
शबनमी मोती ख्वाब बन
बिखरे हैं
शायद तुम्हारी खामोशी
मुस्कराकर फिर से
आवाज़ देकर मुझे पुकारती है
******
रंजना फतेपुरकर
3,उत्कर्ष विहार
मनीषपुरी
इंदौर एमपी 18
इंडिया
मो 98930 34331


