Tue. Oct 22nd, 2019

दुःख ही जीवन की कथा रही क्या कहूं आज जो नहीं कही : निराला

डॉ श्वेता दीप्ति , सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला हिन्दी के छायावादी कवियों में कई दृष्टियों से विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार के रूप में उन्हें पूरा देश जानता है। उन्होंने कई रेखाचित्र भी बनाये। उनका व्यक्तित्व अतिशय विद्रोही और क्रान्तिकारी तत्त्वों से निर्मित हुआ है। उसके कारण वे एक ओर जहाँ अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तनों के सृष्टा हुए, वहाँ दूसरी ओर परम्पराभ्यासी हिन्दी काव्य प्रेमियों द्वारा अरसे तक सबसे अधिक ग़लत भी समझे गये। 21 फरवरी 1896 को जन्मे निराला ने विविध प्रयोगों- छन्द, भाषा, शैली, भावसम्बन्धी नव्यतर दृष्टियों ने नवीन काव्य को दिशा देने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 15 अक्टूबर 1961 को उनका निधन हुआ था।

निराला की मृत्यु के बाद धर्मवीर भारती ने निराला पर एक स्मरण-लेख लिखा था. उसमें उन्होंने निराला की तुलना पृथ्वी पर गंगा उतार कर लाने वाले भगीरथ से की थी. धर्मवीर भारती ने लिखा है:

‘भगीरथ अपने पूर्वजों के लिए गंगा लेकर आए थे. निराला अपनी उत्तर-पीढ़ी के लिए.’ निराला को याद करते हुए भगीरथ की याद आए या ग्रीक मिथकीय देवता प्रमेथियस/प्रमथ्यु की, तो यह आश्चर्य की बात नहीं है.

निराला वास्तव में हिंदी कविता के प्रमथ्यु थे. प्रमथ्यु, मानव जाति का जन्मदाता, जो मनुष्यों के लिए ओलिम्पिस पर्वत से अग्नि उतार लाया था; जिसने अन्याय के खिलाफ, न्याय के पक्ष में मनुष्यों का साथ दिया था! क्या निराला की साहित्यिक साधना भी ऐसी ही नहीं थी?

अपने रंग-रूप और डील-डौल में वास्तव में किसी ग्रीक देवता की तरह नजर आने वाले निराला में क्या वास्तव में ग्रीक देवता प्रमथ्यु की छाया नहीं थी? प्रमथ्यु ने मानवता के लिए असीम कष्ट सहे थे. निराला का कष्ट भी हिंदी जाति और उससे भी बढ़कर मनुष्यता को ऊपर उठाने के लिए सहा गया कष्ट था.

यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि अगर हिंदी को निराला नहीं मिले होते, हिंदी साहित्य वैसा नहीं होता, जैसा कि वह है. निराला ने हिंदी कविता को एक आग दी, जो आज तक जल रही है. प्रमथ्यु को देवताओं के सरपंच जीयस ने पर्वत से बांध देने की सजा दी थी. उसकी सजा में यह भी शामिल था कि एक गिद्ध दिन में उसके कलेजे का मांस खाएगा और रात में उतना ही मांस फिर बढ़ जाएगा. निराला ने भी हिंदी साहित्य के लिए कुछ ऐसी ही यातना सही थी.

निराला की रचनाओं में अनेक प्रकार के भाव पाए जाते हैं। यद्यपि वे खड़ी बोली के कवि थे, पर ब्रजभाषा व अवधी भाषा में भी कविताएं गढ़ लेते थे। उनकी रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति एवं सम्वेदना, कहीं देश-प्रेम का ज़ज़्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध और कहीं प्रकृति के प्रति झलकता अनुराग। इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आईना है। उनका ज़ोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण पर था, सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखांकन उनकी काव्य चेतना की सर्वोच्चता को दर्शाता है –

वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
कोई न छायादार पेड़
वह जिसके तले बैठी हुयी स्वीकार
श्याम तन, भर बंधा यौवन
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार-बार प्रहार
सामने तरू-मालिका अट्टालिका प्राकार
इसी प्रकार राह चलते भिखारी पर उन्होंने लिखा-
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को,
भूख मिटाने को
मुंह फटी पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक कलेजे के करता पछताता।

अपने जीवन के विषाद, विष, अंधेरे को निराला ने जिस तरह से करुणा और प्रकाश में बदला, वह हिंदी साहित्य में अद्वितीय है. रामविलास शर्मा की किताब निराला की साहित्य साधना (भाग-1), निराला के कष्टों से भरे जीवन का मार्मिक चित्र खींचती है.

रामविलास शर्मा द्वारा लिखी गई निराला की यह जीवनी, दुनिया की श्रेष्ठतम जीवनियों में गिने जाने के लायक है. वास्तव में जीवनियां उतनी ही महान होती हैं, जितना महान जीवन होता है. निराला का जीवन भी उनकी कविता की तरह ही विलक्षण है.

निराला ने अपने व्यक्तिगत दुर्भाग्य के साथ दुनिया के इस क्रूर छल और अपमान को भी सहा. लेकिन, फिर भी वे कटु कहीं नहीं हुए. जीवन के विष को पीने को अपना प्रारब्ध मानकर उसे पीते रहे:

जनता के हृदय जिया
जीवन विष विषम पिया

निराला की असंभव संभावनाओं से युक्त कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ के राम वास्तव में निराला खुद हैं. ये निराला जैसे कवि के लिए ही मुमकिन था कि वे अपने राम में खुद को और खुद में राम को उतार लें और उसी राम को किसी औसत मध्यवर्गीय व्यक्ति का भी रूप दे दें. राम के संघर्ष को अपना संघर्ष और अपने संघर्ष को राम का संघर्ष बना दें और इसे आजादी के व्यापक संघर्ष से जोड़ दें.

हिंदी में या संभवतः विश्व की किसी भी भाषा में अर्थ की इतनी छवियां देने वाली कोई अन्य कविता शायद ही हो. यह कविता आज भी टटकी और प्रासंगिक लगती है. निराला ने राम का जो चित्र खींचा है, वह वास्तव में उनका अपना ही स्केच है.

दृढ़ जटा-मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल

और जब निराला राम से यह कहलवाते हैं, ‘आया न समझ में यह दैवी विधान;/रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर… देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक/लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक..’ तब वे हर युग की आवाज बन जाते हैं. हमारे अपने युग की भी. ‘अन्याय जिधर है, उधर शक्ति’- सत्य और असत्य की लड़ाई का समीकरण हमेशा ऐसा ही रहा है.

निराला प्रकाश के प्रति दृढ़ आस्था के कवि हैं. उनकी यह दृष्टि महत्वपूर्ण है कि सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष शाश्वत है. यह कभी समाप्त न होनेवाला, लगातार लड़ा जानेवाला युद्ध है. उनके यहां कोई आखिरी जीत या आखिरी हार नहीं है. लडते रहना ही नियति है. इसलिए राम की शक्तिपूजा में वे ‘राम-रावण का अपराजेय समर’ पद का इस्तेमाल करते हैं. ‘अपराजेय समर’, यानी राम-रावण का ऐसा युद्ध जिसमें कभी भी किसी की निर्णायक तरीके से जीत या हार नहीं होती.

राम की शक्ति पूजा के माध्यम से निराला ने राम को समाज में एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। वे लिखते हैं –
होगी जय, होगी जय
हे पुरुषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुईं लीन।
सौ पदों में लिखी गयी तुलसीदास निराला की सबसे बड़ी कविता है, जो कि 1934 में लिखी गयी और 1935 में सुधा के पाँच अंकों में किस्तवार प्रकाशित हुयी। इस प्रबन्ध काव्य में निराला ने पत्नी के युवा तन-मन के आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को बख़ूबी दिखाया है –
जागा जागा संस्कार प्रबल
रे गया काम तत्क्षण वह जल
देखा वामा, वह न थी, अनल प्रमिता वह
इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान
हो गया भस्म वह प्रथम भान
छूटा जग का जो रहा ध्यान।

निराला की रचनाधर्मिता में एकरसता का पुट नहीं है। वे कभी भी बंधकर नहीं लिख पाते थे और न ही यह उनकी फक्कड़ प्रकृति के अनुकूल था। निराला की जूही की कली कविता आज भी लोगों के जेहन में बसी है। इस कविता में निराला ने अपनी अभिव्यक्ति को छंदों की सीमा से परे छन्दविहीन कविता की ओर प्रवाहित किया है–
विजन-वन वल्लरी पर
सोती थी सुहाग भरी स्नेह स्वप्न मग्न
अमल कोमिल तन तरुणी जूही की कली
दृग बंद किये, शिथिल पत्रांक में
वासन्ती निशा थी

निराला की मौलिकता, प्रबल भावोद्वेग, लोकमानस के हृदय पटल पर छा जाने वाली जीवन्त व प्रभावी शैली, अद्भुत वाक्य विन्यास और उनमें अन्तनिहित गूढ़ अर्थ उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करते हैं। बसंत पंचमी और निराला का सम्बन्ध बड़ा अद्भुत रहा और इस दिन हर साहित्यकार उनके सान्निध्य की अपेक्षा रखता था। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में निराला की काव्य रचना में यौवन का भावावेग दिखा-
रोक-टोक से कभी नहीं रुकती है
यौवन-मद की बाढ़ नदी की
किसे देख झुकती है
गरज-गरज वह क्या कहती है, कहने दो
अपनी इच्छा से प्रबल वेग से बहने दो।
यौवन के चरम में प्रेम के वियोगी स्वरूप को भी उन्होंने उकेरा-
छोटे से घर की लघु सीमा में
बंधे हैं क्षुद्र भाव
यह सच है प्रिय
प्रेम का पयोधि तो उमड़ता है
सदा ही नि:सीम भूमि पर।

निराला के काव्य में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, रहस्यवाद और जीवन के गूढ़ पक्षों की झलक मिलती है पर लोकमान्यता के आधार पर निराला ने विषयवस्तु में नये प्रतिमान स्थापित किये और समसामयिकता के पुट को भी ख़ूब उभारा। अपनी पुत्री सरोज के असामायिक निधन और साहित्यकारों के एक गुट द्वारा अनवरत अनर्गल आलोचना किये जाने से निराला अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में मनोविक्षिप्त से हो गये थे। पुत्री के निधन पर शोक-सन्तप्त निराला सरोज-स्मृति में लिखते हैं-

मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुयी विकल
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूं आज, जो नहीं कही।

यह कहने के बाद भी कि ‘दुख ही जीवन की कथा रही’ निराला दुख से आक्रांत नहीं होते, उसे पार कर जाते हैं. राम की शक्तिपूजा में जाम्बवान राम से ‘शक्ति की मौलिक कल्पना’ करने के लिए कहते हैं, लेकिन वास्तव में शक्ति की यह मौलिक कल्पना निराला की अपनी है.

वेदना सिर्फ उन्हें ही तोड़ पाती है, जिनके पास व्यक्तित्व नहीं होता। निराला की जिस कमाई का हम अभिनंदन करते हैं, वह है, उनका व्यक्तित्व। अपने समय के लेखकों में सूर्यकांत ‘निराला’ में ही व्यक्तित्व दिखाई देता है। वह अक्खड़ थे, स्वाभिमानी थे और परदुखकातर भी थे। उन्हें मर जाना, या जीते जी मर जाना कुबूल था, पर किसी के सामने रिरियाना नहीं। ताप का यह तनाव उनकी रचनाओं में भी प्रगट होता है। हिंदी में वीर रस की रचनाएं उपलब्ध हैं, पर जिसे हम पॉजिटिव अर्थ में मर्दाना या पैरुषेय कह सकते हैं, वह निराला में जितना दिखाई देता है, उतना कहीं और नहीं।

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