Wed. May 27th, 2020

अपमान का दंश झेलता आ रहा मधेस : चन्दन दुबे

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जनकपुर, चन्दन दुबे । सैकड़ो वर्षों से लगातार विभेद और अपमान का दंश झेलता आ रहा मधेस जब भी किसीने आवाज दी सुनते ही मुक्तिपथ पे निःसंकोच, निशर्त और निर्भीक होकर सरपट दौड़ गया।
चाहे वो आवाज़ गजेन्द्र नारायण सिंह की हो कि राजेन्द्र महतो की,चाहे वो आवाज उपेन्द्र यादव की हो कि चन्द्रकान्त राउत (सी के राउत) की वो आवाज मातृका यादव ने दी हो कि बेशक जय कृष्ण गोईत ने ही क्यों न दी हो मधेस और मधेशियों ने आंखे मूंदकर सब पे भरोसा किया है।लेकिन बदले में मधेश और मधेशियोंको क्या मिला इसकी समीक्षा निश्चितरूप से होनी चाहिए।
विभिन्न कालखण्डों में जब जब अधिकारवादी आन्दोलनों का आह्वान किया गया मधेश और मधेशियों ने निःसंदेह उसमे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और प्रत्येक आन्दोलन में तन मन धन यहाँ तक कि वीरों ने सैकडों की तादाद में प्राणों की आहुतियां तक दे दी।
हज़ारों लोग अपाहिज बना दिए गए या राज्य द्वारा फर्जी मुकदमे लगाकर विस्थापित जीवन जीनेको मजबूर कर दिए गए।
तक़रीबन पैंतीस वर्षों में अनेकों बार विभिन्न रूपमें विभिन्न तरीकों से मधेस और मधेशियों को आन्दोलित किया गया या फिर यूँ भी कह सकते हैं कि इस्तेमाल किया गया परन्तु मधेस और मधेसियों ने कभी भी पीठ नही दिखाई।दिखाया तो केवल एक जुनून एक जज्बा जो हमेशा सिर्फ और सिर्फ विभेदरहित अधिकारसम्पन्न और स्वायत्त मधेस के लिए हरेक कुछ न्योछावर कर देने के लिए रहा।
विभिन्न चरण के आंदोलनोंमें जो सैकड़ों लोग शहीद हो गए उनमे से बहुतों के घरों में चूल्हे भी मुश्किल से जलाए जाते हैं उनके परिजन को उनकी जरूरत हमेशा महसूस होती है।कुछ घायलों के ज़िश्म में आज भी सरकारी गोलीयां फँसी हुई है तो कई अपाहिज बना दिए गए हैं और उनकी हालत तो और बदतर है जो फर्जी मुकदमों में अभियुक्त होकर या तो जेल में हैं या विस्थापित हैं और जिनकी हालत पूछने वाला कोई भी नहीं है।
सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि वि. सं.२०६४ से अभी तक हुए हरेक तह के निर्वाचनों में भी मधेशियों ने बार बार मधेशी दलों के पक्ष में बढ़ चढ़ कर मतदान किया जिसका नतीजा ये है की वी.सं.२०६४ के निर्वाचन के पश्चात जब बाबूराम भट्टराई की सरकार बनी थी तो उस मंत्रिमंडल में ५० प्रतिशत से ज्यादा मंत्री चाहे वो किसीभी दल के रहे हों मधेशी थे।सिर्फ इतना ही नहीं डॉ रामबरन यादव को भी देश के प्रथम राष्ट्रपति और परमानन्द झा को प्रथम उपराष्ट्रपति होने का सौभाग्य भी कहीं न कहीं मधेशियों के योगदान के बल पर मिला।मधेशियों ने उन चुनावों को भी आंदोलन के रूप में ही लिया और अपने वोट की ताकत का भी प्रदर्शन किया जिसका परिणाम है कि आज प्रदेश न.२ में राजपा और सपा की संयुक्त सरकार है।
लेकिन क्या इन आंदोलनों के कोई मायने नहीं हैं?क्या इन आंदोलनों से कोई उपलब्धि प्राप्त नही हुई?क्या उन वीरों का रक्तपात बेकार ही जाया हो गया?
आजकल लोग हर गली,मोहल्ले और नुक्कड़ों पर ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर ढूंढते नज़र आते हैं।
वास्तवमें अगर ईमानदारीपूर्वक बात करी जाय तो जिन उधेश्यों और आकांक्षाओं के साथ मधेशियों ने बार बार संघर्ष किया और जितना नुकसान मधेशने उठाया उसकी तुलनामें प्राप्त उपलब्धियां नाकाफ़ी भी है और नामुनासिब भी।
आजकल हरेक मंचसे प्रदेश न.२ सरकारके मंत्रीगण राजपा-सपा के माननीय विधायक एवं स्थानीय तहके निर्वाचित जनप्रतिनिधिगणको संघीयताको मधेस आन्दोलन के उपलब्धि के तौर गिनाते हुए देखा जा सकता है।निश्चितरूपसे संघीयता मधेस आन्दोलन के नींव पे खड़ी हुई है इसमें किसीको कोई संशय नहीं होनी चाहिए।
संघीयता आने के बाद देश मे तीन तह की सरकार कायम हुई है।लेकिन इस संघीयता आने और तीन तह की सरकार गठित होने से आम मधेशियोंको क्या फायदा हो रहा है यह एक अनुत्तरित प्रश्न अब मधेशके हरेक चेतनशील और बुद्धिजीवियों के मन मे घर कर रहा है।
विगत की भाँति ही अभी भी मधेशियों का वोट प्राप्त कर विभिन्न तह में प्रतिनिधित्व कर रहे निर्वाचित प्रतिनिधि सभा सदस्य,प्रदेश सभा सदस्य,नगरपालिका/गाउँपालिका प्रमुख से लेकर वार्ड अध्यक्ष/सदस्य तक सभी पुनः अनियमित तरीके से स्वेच्छाचारी और गैरजिम्मेदाराना प्रवृतिपूर्वक राज्यद्वारा प्राप्त अनुदानका दुरुपयोग करने में मशगूल हो गए हैं।यत्र तत्र सर्वत्र चारो तरफ सिर्फ और सिर्फ ब्रह्मलूट दिखाई पड़ने लगा है।हर जगह सिर्फ सरकारी सुविधाओं का दुरुपयोग और विलासी गाड़ियोंका प्रयोग दिखाई पड़ता है।अपने सगे संबंधियों तथा चापलूस कार्यकर्ताओंको राजनीतिक नियुक्तियों से लेकर सम्भव सुविधाएं देने की होड़बाजी दिखायी पड़नेलगी है।इसके साथ साथ वयापक तौर पड़ कमीशनखोरी के मध्यनजर जन प्रतिनिधियों से लेकर प्रदेश के मन्त्री तक दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं और ठेकेदारोको भी कोटेशन और उपभोक्ता समितियों के नाम पर बजेट बांटने के कामको ही प्राथमिकता देते हुए दिखाई पड़ते हैं।
हर तरफ भ्रष्टाचारक़ा दुर्गन्ध फैलने लगा है।जातिवाद,परिवारवाद,नातावाद, कृपावाद,चापलुशिवाद और ब्रमलूटवाद ने मधेशवादका गला घोंट दिया मालूम पड़ता है।
मधेशियोंने पिछले तीनों तह के निर्वाचनोंमें अधिकारकी लड़ाई लड़ रहे अधिकारवादियों को इस विश्वास के साथ वोट किया था कि नेपाल के संविधानमे संसोधन से लेकर प्रदेश न.२ तक ऐन कानून में मधेशियों के हक अधिकारको मजबूती से स्थापित किया जाएगा।प्रदेश न.२ के सर्वांगीण विकास के लिए हर क्षेत्र के लिए हर सम्भव कानून बनाकर प्रदेश के विकास और समृद्धि के मार्ग को प्रसस्त करने की कोशिशें की जाएंगी।लेकिन उस दिशा में प्रदेश सरकार की नाकामियां किसी से छुपी हुई नहीं है।साईकल बांटने से लेकर ट्रेक्टर बांटने तक और बजेट बांटने से लेकर विलासी सुविधाओं में लिप्त प्रदेश सरकार की मनसा सिर्फ और सिर्फ कमिनसनखोरी और भोगविलास तक ही सीमित है यह बात अब मधेशके लोगों को अच्छी तरह समझ आ रही है।
स्थानीय तह सरकार भी प्रदेश सरकार के नक्शेकदम पर ही चल रही है और उस पर भी दुस्वारियाँ ये है कि आम नागरिकों के ऊपर बेवजह कर बढ़ाकर उस कर से उगाही हुए रकमों का दुरुपयोग ग़ैरमुनासिब तरीके से लिए जा रहे विलासी सुविधाओं के लिए किया जा रहा है।
सच कहा जाए तो २०६४ से अब तक मधेश को बार बार ठगा गया है, मधेशियों के वोटका दुरुपयोग बार बार व्यक्तिगत,पारिवारिक या जातिवाद के भलाई और आर्थिक राजनीतिक फायदे के लिए ही किया गया है।दूसरों के बेटों की क़ुर्बानियों का फायदा नेताओं ने अपने पद प्रतिष्ठा और परिवार के राजनीतिक और आर्थिक फायदों के लिए ही किया है।
आम मधेसियोंमे निश्चितरूपसे ऐसी अराजकताओं और विकृतियों के विरुद्ध घृणा,आक्रोश और असंतोष की भावना ने जन्म ले लिया है। अभी जो हालात पैदा हो गए हैं उसपर मधेशके आम नागरिकों और बुद्धिजीवियों की माने तो नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाली कांग्रेस को नकार चुका मधेस फिर से असमंजस में आ गया है।
इन सभी समस्याओं और परिस्थितियोंको गम्भीरतापूर्वक लेते हुए मधेशके शीर्ष नेतागण एकजूट होकर ईमानदारीपूर्वक स्पष्ट,मजबूत और प्रगतिशील निर्णय लेकर अगर यहां से आगे बढ़ते हैं तो अभी भी वक़्त है मधेस को मजबूत भी किया जा सकता है और गढ़ के रूप में कायम भी किया जा सकता है।

चन्दन दुबे

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