Sun. Dec 8th, 2019

मृत्यु–उत्सव का वो क्षण…: गौरीशंकरलाल दास 

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हिमालिनी  अंक  सितंबर  2019 | पेशे से मेडिकल डाक्टर हैं– गौरीशंकरलाल दास । लेकिन आप समाज में एक वरिष्ठ समाजसेवी के रूप में परिचित हैं । नेपाल रेडक्रस सोसाइटी, कुष्ठरोग निवारण संघ, प्रौढ़ कल्याण संघ, राष्ट्रीय ज्येष्ठ नागरिक महासंघ, इम्प्याक्ट नेपाल, वीपी आई फाउण्डेशन, चित्रगुप्त प्रतिष्ठान जैसे दर्जनों सामाजिक संस्थाओं में आप की सक्रिय सहभागिता रही । उम्र के हिसाब से आप ९६ साल के हो चुके हैं, लेकिन आज भी कई सामाजिक संस्थाओं में आपकी सक्रिय सहभागिता है । आप का जन्म वि.सं. १९८१ साल आश्विन महीने में सिरहा जिला स्थित इनरुवा गांव में हुआ है । आप के पिता जी स्व. जनार्दनलाल दास और माता जी स्व. भवानी देवी हैं । डाक्टरी पेशा और समाजसेवा के अलावा आप की विशेष रुचि ट्रेकिङ और वाद्यवादन (बासुरी और ढोलक) भी है । आपके लिए प्रस्तुत है, डॉ. गौरीशंकरलाल जी का जीवन–सन्दर्भ–
प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

पारिवारिक पृष्ठभूमि
हम लोगों का घर (सिरहा, इनर्वा) बोर्डर के पास में ही था । बचपन इनरुवा में ही बीत गया । उस समय अपने गांव में कोई भी स्कूल नहीं था । जब मैं स्कूल जाने के लायक हुआ तो मैं भारत में रहने लगा था । पिता जनार्दनलाल जी जमीनदार थे । पहले वे भारत के जमीनदार थे, बाद में नेपाल आए, जमीन खरीदा और नेपाल में ही जमीनदार बन गए । नाना जी स्व. सोनेलाल चौधरी, भी जमीनदार ही थे । आज के लोगों की भाषा में कहें तो हम लोगों का परिवार ‘सामन्ती’ परिवार है । विशेषतः कम्युनिष्ट लोग जमीनदार लोगों को ‘सामन्ती’ कहते है, हम लोग उसी परिवार से हैं । उस वक्त का सामाजिक परिवेश ही वैसा था । आज हमारी जमीनदारी नहीं है । लेकिन कुछ जमीन तो गांव में आज भी बांकी है ।

डॉ. गौरीशंकरलाल दास, समाजसेवी

शिक्षा–दीक्षा
मेरी प्रारम्भिक शिक्षा–दीक्षा जयनगर से दक्षिण स्थित राजनगर (बिहार, भारत) में हुई । राजनगर में एक मीडिल स्कूल था, मेरी प्रारम्भिक शिक्षा–दीक्षा वही से शुरू हुई थी, रामेश्वर हाई इंगिलिस स्कूल से मैंने सन् १९४१ में मैट्रिकुलेशन पास किया । उसके बाद मैं भागलपुर चला गया, आईएसी करने के लिए ।
उस समय मैं नहीं जानता था कि मुझे क्या बनना है । अपनों ने और साथियों ने कहा कि हम लोगों को साइन्स पढ़ना है । सामान्य चर्चा–परिचर्चा में ही भागलपुर स्थित तेजनारायण जुब्ली कॉलेज में जाकर साइन्स विषय लेकर मैं आईएसी में भर्ती हो गया । हां, एक बात दिमाग में थी कि साइन्स पढ़ेगे तो डाक्टर भी बन सकते हैं और इन्जीनियर भी । इसी सोच के साथ साइन्स विषय को लेकर मैं भर्ती हो गया था । वहीं से मैंने आईएसी पास किया, नम्बर अच्छा ही रहा । बीमार होने के कारण तुरंन्त बाद बैचलर के लिए मैं कहीं भी दरखास्त नहीं दे पाया ।
मैं बचपन से ही कालाजार से पीडित था । आयुर्वेदिक दवाई खाते थे । शायद मैं ७–८ साल का था, उस समय सूख कर कांटा जैसा हो गया था । सिर्फ मैं ही नहीं, गांव के कई लोग उस समय कालाजार से प्रभावित थे । आईएसी पास होने के बाद भी मैं बीमार पड़ गया । उस वक्त लम्बे दिनों तक बुखार रहा, टाइफाइड (म्यादी ज्वर) से मैं पीडित रहा । ठीक होने के बाद फिर मैं तेजनारायण जुब्ली कॉलेज में ही बीएसी के लिए भर्ती हो गया । हमारे बैंच में विद्यार्थियों की संख्या ३०–४० ही थी । उसी कॉलेज से मैंने डिस्टिङ्सन लाकर बीएसी पास किया । बीएसी करने के बाद इन्जीनियरिङ और मेडिकल दोनों क्षेत्र से सम्बद्ध कॉलेजों ने मुझे भर्ती के लिए बुलाया गया । पटना मेडिकल कॉलेज ने भी बुलाया था । उस वक्त प्रिन्स ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज कहा जाता था । लेकिन मुझे डाक्टर बनना है या इन्जीनियर ? इसका तय नहीं हो रहा था । मैथ विषय को लेकर मैंने सन् १९४५ में बीएसी किया था । ऐसी ही पृष्ठभूमि में परिजनों ने कहा कि आप को मेडिकल में ही जाना है । बायोलॉजी ना होने के कारण मेडिकल पढ़ने से पूर्व ‘प्रि मेडिकल’ क्लास लेना पड़ता था । एक साल की ‘प्रि मेडिकल क्लास’ लेकर मैं एमबीबीएस में भर्ती हो गया । यह सन् १९४७ साल की बात है । उस वक्त कॉलेज के प्रिन्सिपल थे– डॉ. टी.एन. बनर्जी । उन्होंने ही भर्ती होने से पहले मेरी अन्तवार्ता ली थी ।
८ाक्६री कमाने के लिए नहीं !

अन्तवार्ता लेते वक्त बनर्जी ने मुझे पूछा कि आप क्यों मेडिकल में आना चाहते हैं ? उन्होंने अप्सन दिया था– पैसा कमाने के लिए मानव सेवा के लिए ! मैंने कहा– दोनों । उन्होंने फिर कहा कि ऐसा सोचना और कहना गलत है, अगर आप इस तरह सोचते हैं तो आप का डाक्टर बनना ठीक नहीं है । उन्होंने कहा कि हर डाक्टर के दिमाग में मानव सेवा ही सबसे ऊपर होना चाहिए, अर्थोपार्जन नहीं । उन्होंने कहा था कि पैसा कमाने के लिए तो अन्य काफी क्षेत्र हैं । उनका यह कथन मुझे आज भी याद है । अपनी पूरी सेवा अवधि में मैं उनके इस कथन से प्रभावित रहा ।

सन् १९५१ साल में मैंने एमबीबीएस पास किया । उसी कॉलेज में १ साल का इन्टर्नसीप भी किया । उसके बाद मैं काठमांडू आया । मैं जिस हाईस्कूल में पढ़ा, उसी हाइस्कुल में एक टीचर थे– हरिनारायण लाल दास । उनके दामाद शिव नारायण दास सरकारी कर्मचारी (एसिस्टेन्ट सेक्रेटरी) थे, वह काठमांडू में रहते थे । उन्होंने कहा था कि आप काठमांडू में आइए, वीर अस्पताल में एक सीट खाली है, आप को वहां नौकरी करनी है । उनकी सलाह से मैं पहली बार काठमांडू आया । यह वि.सं. २००९ साल की बात है । वि.सं. २००८ साल में ही लोकसेवा आयोग की स्थापना हो चुकी थी । लोकसेवा आयोग ने पदपूर्ति के लिए विज्ञापन प्रकाशित किया था, मैंने भी परीक्षा दी । खड् गमान सिंह मल्ल आयोग के सचिव थे । स्वास्थ्य विभाग के डाइरेक्टर जीतसिंह मल्ल थे । उन्होंने ही मेरी अन्तरवार्ता ली थी । उनका प्रश्न था कि टॉन्सिल बढ़ जाता है तो उसका ऑपरेशन कैसे करेंगे आप ? मैंने जो जवाब दिया, उससे वह सन्तुष्ट हो गए, मैं तुरन्त सेलेक्ट हो गया । वि.सं. २००९ साल फाल्गुन १८ के दिन आवासीय चिकित्सक के रूप में मेरी पोस्टिङ वीर अस्पताल में हो गयी ।

दो वीर अस्पताल
आज आप जो वीर अस्पताल देखते हैं, उसका नाम एक ही है  । लेकिन उस समय दो वीर अस्पताल थे । एक का नाम ‘पुरुष वीर अस्पताल’ था और दूसरे का नाम ‘महिला वीर अस्पताल’ था । पुरुष और महिला दोनों में अलग–अलग दो प्रशासक भी थे । मैं पुरुष वीर अस्पताल में था । पुरुष वीर अस्पताल के सुपरिटेंडेन्ट में डॉ. एस.सी. मजुमदार थे, वह बंगाली थे । बाद में दोनों अस्पतालों को मिलाकर एक बनाया गया ।
उस समय डाक्टर बहुत ही कम थे । प्याथोलॉजी में डॉ. दिनेशानन्द वैद्य थे, इसीतरह डॉ. एस.एल. दास गुप्ता, यज्ञराज जोशी और डॉ. भवानी भक्त भी थे । लेकिन डॉ. भवानी भक्त पढ़ने के लिए बाहर गए थे, अस्पताल में कार्यरत नहीं थे । उन लोगों के साथ मिलकर ही मैंने काम शुरू किया ।
वीर अस्पताल में रहते वक्त मेरी एक अविस्मरणीय घटना है । मैं नया–नया ही था । घटना वि.सं. २००९ साल की ही है । उस वक्त वीर अस्पताल में सामान्य ऑप्रेशन होता था, कोई भी बड़ा ऑप्रेशन सम्भव नहीं था । सामान्यतः हाइड्रोशील और हर्निया का ही ऑपरेशन होता था । इसी क्रम में एक हाइड्रोशील ऑपरेशन का केस आया । डॉ. मजुमदार ऑप्रेशन के लिए तैयार हो गए । संयोगवश मैं उस वक्त अस्पताल में नहीं था, अपनी ड्युटी खतम कर व्यक्तिगत काम से न्यूरोड गया था । बाद में मुझे पता चला कि डॉ. मजुमदार ने मरीज को देखाते हुए अपने सहयोगी (कंपाउन्डर) से कहा कि हाइड्रोशील का ऑप्रेशन करना है, इसको एनेस्थेसिया (बेहोश बनाने की दवा) दो, आदेश अनुसार उन्होंने दिया भी । दुर्भाग्य ! ऑप्रेशन के लिए टेबल पर एनेस्थेसिया देने के दौरान ही पेसेन्ट का निधन हो गया । जिसका निधन हुआ, वह परोपकार संस्था से संबंधित था । उसका निधन एक बहुत बड़ी चर्चा–परिचर्चा का विषय बन गया, हंगामा हो गया । एनेस्थेसिया ज्यादा होने के कारण ही उनका निधन हो गया था ।
आज के परिवेश में देखते हैं तो हाइड्रोशील का ऑपरेशन एक सामान्य ऑपरेशन है, इसमें खास कोई भी जोखिम नहीं है । लेकिन उस वक्त हाइड्रोशील ऑप्रेशन के कारण भी जान जाती थी । ऑपरेशन करनेवाले डॉ. मजुमदार के विरुद्ध आवाज उठने लगी । उनकी जान इसलिए बची कि वह तत्कालीन प्रधानमन्त्री मातृका प्रसाद कोइराला के ‘पर्सनल फिजिसियन’ भी थे ।

एक साल में ही तबादला
वीर अस्पताल में मैं पूरा एक साल भी काम नहीं कर पाया और मेरा तबादला हो गया । काठमांडू के उत्तरी क्षेत्र टोखा में क्षयरोगियों को लक्षित कर एक स्वास्थ्य संस्था निर्माण की गई थी, जो बुढानीलकण्ठ से ३ किलोमिटर की दूरी में रहे पश्चिमी पहाड़ की ओर था, जहां उस वक्त कोई गांव भी नही था । उसको ‘टोखा स्वास्थ्य निवास’ कहते थे । मेरा ट्रान्सफर वही हो गया ।
इसके पीछे भी एक कहानी है । एक दिन डॉ. दिनेशानन्द वैद्य और मैं वीर अस्पताल में एकसाथ रहकर बात कर रहे थे । उसी समय डॉ. जीतसिंह मल्ल जीप लेकर आ गए । उन्होंने कहा– ‘चलिए घूमने के लिए ।’ वह स्वास्थ्य विभाग के डायरेक्टर थे । मैंने सोचा कि डायरेक्टर ही कहते हैं तो मैं क्यों ना जाऊँ ! जीप में बैठ कर मैं उनके साथ चला गया । कहां ले जा रहे हैं, उसका पता भी मुझे नहीं था । चलते–चलते हम लोग एक पहाड़ी इलाके में पहुँच गए, प्राकृतिक रूप से वह एक रमणीय और बहुत सुन्दर जगह थी । देखते ही मुझे भा गई । जीप से उतरने के बाद डॉ. मल्ल जी ने कहा– ‘यह है– टोखा स्वास्थ्य निवास । यहां टी. वी. (क्षयरोग) के मरीज आते हैं, क्या आप यहां काम करेंगे ?’
उस वक्त वीर अस्पताल में मेरा मासिक पारिश्रमिक १८० रुपए था, भत्ता स्वरूप २० रुपया अधिक मिलता था । यानि कि मेरा पारिश्रमिक २०० रुपए था । डॉ. मल्ल ने यह भी कहा कि अगर आप यहां (टोखा स्वास्थ्य निवास) काम करेंगे तो २५० रुपया अतिरिक्त भत्ता भी मिलेगा । मेरे मन में आया कि अगर मैं यहां काम करूंगा तो मासिक ४५० रुपया कमाउंmगा । इसतरह मैं लोभ–लालच में पड़ गया । उनका प्रस्ताव मैंने तुरन्त स्वीकार किया । इसतरह मेरा तबादला टोखा स्वास्थ्य निवास में हो गया था । डॉ. मल्ल मुझे क्यों वहाँ ले गए ? इसके पीछे भी एक कहानी है ।

उस वक्त टोखा स्वास्थ्य निवास में जो डाक्टर थे, उन्होंने मरीजों को मिलनेवाला राशन (खाद्य सामग्री) गोलमाल (भ्रष्टाचार) किया था । इसीलिए यहां के मरीज लोग आन्दोलन में उतर आए थे, हड़ताल कर रहे थे । जिसके चलते डॉ. मल्ल जी तनाव में थे, वहां कार्यरत डाक्टर को हटाकर मुझे ले जाना चाहते थे । लेकिन इसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था । जब मैं वहां काम करने के लिए राजी हो गया, तब इसके बारे में मुझे पता चला । मेरे जाने के बाद मरीजों की हड़ताल भी खतम हो गई, वे लोग मुझसे खुश भी थे । वहां मैंने लगभग १० साल काम किया ।

टोखा स्वास्थ्य निवास में मेरा योगदान
टोखा स्वास्थ्य निवास में रहते वक्त ही नातिकाजी, बच्चु कैलाश जैसे गायक एवं संगीतकारों से मेरी जान–पहचान हो गई । टोखा में सिर्फ जनता के लिए ही नहीं, राणाओं के लिए विभिन्न कॉटेज का भी निर्माण किया गया था । उस वक्त ए, बी, सी क्लास में राणाओं का वर्गीकरण होता था । ए वर्ग के राणाओं के लिए ‘ए कॉटेज’, बी वर्ग के लिए बी कॉटेज और सी वर्ग के लिए राणाओं के लिए ‘सी कॉटेज’ निर्माण किया गया था । लेकिन वि.सं. २००७ साल के बाद राणाओं का वर्चस्व नहीं रहा, यहां से राणा लोग चले गए थे । इसीलिए बच्चु कैलाश ‘सी’ कॉटेज में कुछ दिनों के लिए रहे थे, वहीं ‘बी’ कॉटेज में ठूली–रानी साहेब (राजा त्रिभुवन की भाभी) भी रहती थी । वह लोगों को मनोरञ्जन प्रदान करने के लिए बच्चु कैलाश के साथ नातिकाजी, पुष्प नेपाली, शिव शंकर जी जैसे कलाकार वहां आते थे । इसतरह उन लोगों के साथ जान–पहचान और घनिष्ठता हो गई । प्राकृतिक सुन्दरता के दृश्यावलोकन के लिए भी वे लोग यहां आना चाहते थे । जब भी वे लोग आते थे, उस वक्त हम लोग टोखा स्वास्थ्य निवास में ही स्थित एक हॉल में सांगीतिक कार्यक्रम रखा करते थे, जिससे यहां के सारे कर्मचारी एवं मरीज लोग भी खुश होते थे । आस–पास कोई गांव नहीं था, हम लोगों को लगता था कि यहां एक अलग दुनिया है । डाक्टर, नर्स, कर्मचारी तथा मरीजों के लिए यहां रहने की अच्छी व्यवस्था की गई थी ।

बाद में मैंने स्वास्थ्य निवास में ही एक लाइब्रेरी शुरू किया । इसके लिए नेपाल स्थित भारतीय राजदूतावास में कार्यरत शिवमंगल सिंह सुमन का योगदान रहा । सुमन जी दूतावास में सांस्कृतिक सहचरी (एट्याची) के रूप में कार्यरत थे । वह भी टोखा स्वास्थ्य निवास भ्रमण के लिए आए थे । उनका भी सहयोग पुस्तकालय के लिए मिला था । मेरे निवास आने से पहले तक यहां के मरीजों के लिए निराशजनक वातावरण था । लेकिन सांगीतिक कार्यक्रम और पुस्तकालय स्थापना जैसे कार्याें से मरीजों में एक प्रकार का उत्साह आ गया । इसी क्रम में हम लोगों ने एक हस्तलिखित पत्रिका भी शुरू की थी । पत्रिका का नाम ‘संगम’ रखा था । नेपाल भाषा (नेवारी), नेपाली और हिन्दी भाषा में प्रकाशित होने के कारण ही हम लोगों ने इसका नाम ‘संगम’ रखा था ।

स्वास्थ्य निवास में मेवा देवी नाम की एक मरीज थीं । उनके पति कैलाश राम का घर भोटाहिटी में था । पत्नी से मिलने के लिए वह टोखा बराबर आते थे । उनकी जान–पहचान बड़े–बड़े साहित्यकारों से थी । उनकी ही प्रेरणा से हम लोगों ने ‘संगम’ निकालना शुरू किया । संगम की वजह से ही हम लोग टोखा से काठमांडू आते थे । कंप्युटर, फोटोकॉपी मशीन कुछ भी नहीं था । जितने भी लोगों को पत्रिका देनी है, सब हाथ से लिखना पड़ता था । इसीलिए पत्रिका में लेखकों की संख्या जितनी है, सामान्यतः उतनी ही संख्या में पत्रिका निकलती थी । पत्रिका वितरण और आगामी अंक के खातिर कविता, कथा तथा साहित्यिक रचना संकलन के लिए हम साइकिल से काठमांडू आते थे । सिद्धिचरण श्रेष्ठ, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, चित्तधर हृदय, हृदयचन्द्र सिंह प्रधान जैसे साहित्यकारों के पास पहुँचकर संगम के लिए रचना मांगते थे । एक साल तक हम लोगों ने संगम निकाला । इस अवधि में लगभग ५–७ अंक निकल चुका था । उसके बाद मेरा तबादला हो गया, पत्रिका भी बंद हो गयी । बाद में गृष्मबहादुर देवकोटा ने ‘पत्र–पत्रिका का इतिहास’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित किया, उस पुस्तक में संगम की भी चर्चा है ।
इतना ही नहीं, टोखा स्वास्थ्य निवास में हम लोगों ने भोकेशनल थेरापी भी शुरू किया । मरीजों को हरदम निराश होकर नहीं रहना पड़े और कुछ आमदनी भी हो, ऐसी सोच के साथ यह कार्य शुरू किया गया था । इसके लिए इन्टरनेशनल विमेन ऑर्गनाइजेशन का महत्त्वपूर्ण योगदान है । इस ऑर्गनाइजेशन के लिए काठमांडू प्रतिनिधि (अध्यक्ष) थी– मिसेस ल्याडोर । वह इजरायली राजदूत की पत्नी भी थीं । इसीतरह अमेरिकी राजदूत की पत्नी मिसेस स्टेबिन्स, होटल द्वारिकाज की संस्थापिका अम्बिका देवी उस संस्था में सदस्य के रूप में थीं । हम लोगों ने टोखा स्वास्थ निवास आकर प्रस्ताव किया कि हम लोग मरीजों को हस्तकला सिखाएंगे । और यह भी कहा कि मरीज लोग जो भी हस्तकला का सामान बनाएंगे, उसको लेजाकर हम लोग ही बेच देंगे । हस्त–निर्मित विविध सामग्री निर्माण, स्वेटर, सिलाई आदि तालीम उन लोगों को दिया गया था । मरीजों से जो हस्तनिर्मित सामान बन जाता था, वह भी वे लोग ले जाकर बेच देते थे ।

टोखा से फिर का७मां८ू
वि.सं. २०१७ साल में देश में फिर पञ्चायती व्यवस्था शुरू हो गई । डॉ. नागेश्वर प्रसाद सिंह स्वास्थ्य मन्त्री थे । सिंह जी मेरे क्लासमेट थे । मेडिकल पढ़ते वक्त मैं और सिंह जी एक ही क्लास में थे, साथ मिलकर भॉलिबल भी खेलते थे । बाद में वह राजनीति में चले गए, मैं डाक्टरी की ओर । एक दिन उन्होंने मुझे कहा– ‘शहर से इतनी दूर गांव में क्यों रहते हो ! आप काठमांडू आइए ।’ वीर अस्पताल के पास ही में ‘सेन्ट्रल चेष्ट क्लिनिक’ (केन्द्रीय उरस चिकित्सालय) नामक एक स्वास्थ्य संस्था थी । डॉ. यज्ञराज जोशी उसमें मेडिकल सुपरिटेंडेन्ट थे । डिपुटी मेडिकल सुपरिटेंडेन्ट पोस्ट क्रियट कर मुझे सेन्ट्रल चेष्ट क्लिनिक में तबादला कर दिया गया । यह वि.सं. २०१८ साल की बात है । इतना ही नहीं, टोखा स्वास्थ्य निवास और केन्द्रीय उरस चिकित्सालय को मर्ज कर एक ही संस्था बना दी गई । बाद में डॉ. यज्ञराज जी स्वास्थ्य विभाग में डायरेक्टर हो गए, मुझे सुपरिटेंडेन्ट बना दिया गया ।
बाद में विष्णुकुमार तुम्बाहांफे स्वास्थ्य मन्त्री बने । उनकी पत्नी क्षयरोग से पीडि़त हो गई थीं । मैं चेष्ट क्लिनिक में था इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि इनको जहां भी ले जाना है, ले जाइए और ठीक कर दीजिए । उनका कहना था कि मैं उनकी पत्नी को उपचार के लिए भारत ले जाऊं । मैंने दक्षिण भारत (भेलोर) में ले जाकर उपचार करवा दिया, मन्त्री जी खुश हो गए । जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने डॉ. यज्ञराज को चेष्ट क्लिनिक में वापस कर मुझे स्वास्थ्य विभाग में डायरेक्टर बना दिया । वैसे तो यह एक प्रकार की विकृति भी है । व्यक्तिगत रूप में मुझे खुशी भी हुई । लेकिन दो साल के बाद फिर मेरे विरुद्ध षडयन्त्र होने लगा । यज्ञराज जी को ही डायरेक्टर बनाने की बात शुरू हो गयी । लेकिन विभाग में मेरा रिकार्ड अच्छा था, हटाना उतना सहज नहीं था । कई लोग मुझे हटाना भी नहीं चाहते थे । इसीलिए नियम संशोधन कर नयी व्यवस्था की गई । उससे पहले तक डायरेक्टर प्रथम श्रेणी का पद था । उसको यथावत रखते हुए डायरेक्टर जनरल का पोष्ट क्रियट किया गया और उसके लिए विशिष्ट श्रेणी का पद निर्धारण कर यज्ञराज जी को विभाग में ही लाया गया । अकबर और बीरबल की कहानी यहां देखने को मिली । इसतरह यज्ञराज जी को डाइरेक्टर जनरल बना दिया, मैं डाइरेक्टर के डाइरेक्टर ही रहा । इसतरह की राजनीति कल तो थी ही, आज और भी चरम सीमा पर है । हां, बाद में मुझे भी डीपुटी डायरेक्टर जनरल बना दिया ।
प्रथम दीर्३कालीन स्वास्थ्य योजना
सम्भवतः वि.सं. २०३३ साल की बात है । स्वास्थ्य मन्त्री थे– गेहेन्द्रजंग राजभण्डारी । हरिहर जंग सचिव थे । उसी समय विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लुएचओ) ने सुझाव दिया कि हरेक मन्त्रालय में एक योजना शाखा होनी चाहिए । डब्लुएचओ के ही सुझाव अनुसार ही स्वास्थ्य मन्त्रालय में भी एक योजना महाशाखा बनी । उसके लिए मैं प्रथम प्रमुख योजना अधिकृत बन गया । उस के बाद ही प्रथम बार नेपाल में दीर्घकालीन स्वास्थ्य योजना लिखित रूप में बनाई गई, जो मेरे ही नेतृत्व में बनी । उक्त योजना तत्कालीन राजा वीरेन्द्र शाह के समक्ष हम लोगों ने पेश की थी ।
त्यागपत्र अस्वीकृत
वि.सं. २०३३ साल की बात है, स्वास्थ्य विभाग से मैं स्वास्थ्य मन्त्रालय होते हुए ‘सामाजिक सेवा राष्ट्रीय समन्वय परिषद्’ में आ गया । जिस समय मैं मन्त्रालय में था, उस वक्त स्वास्थ्य सचिव थे– मनमोहन लाल सिंह । हम लोगों को स्वास्थ्य मन्त्रालय अन्तर्गत लक्ष्य और प्रगति के बारे में राष्ट्रीय योजना आयोग में पेश करना पडता था । हम लोगों द्वारा पेश किए जाने पर योजना आयोग से जो टिप्पणी की गई थी, उसके लिए जवाफ देने मन्त्रालय में आकर तैयारी कर रहे थे । सिंह उम्र और अनुभव के हिसाब से भी मुझसे जुनियर थे । उन्होंने आकर कहा कि आप लोग आयोग से भागकर आए हैं । उनका यह भी कहना था कि हम लोग ‘काम–चोर’ हैं । उनकी इस तरह की अभिव्यक्ति और व्यवहार मुझे शोभनीय नहीं लगा । जिसके चलते मैंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया । उस वक्त तुलसी गिरी मन्त्रिपरिषद् के अध्यक्ष थे । मेरा त्यागपत्र उनके हाथ तक पहुँच गया । उनके साथ मेरी अच्छी जानपहचान थी । मेरा त्यागपत्र देखते ही उन्होंने मुझे संपर्क किया और कहा– ‘आप अपना त्यागपत्र वापस कीजिए, आप जहां बोलते हैं, वही आप को ट्रान्सफर मिलेगा ।’ उस वक्त रेडक्रस के अध्यक्ष प्रिन्सेप शाह ने भी मुझे कहा कि आप सामाजिक सेवा राष्ट्रीय समन्वय परिषद् में आइए । प्रिन्सेप शाह परिषद् की स्वास्थ्य सेवा समन्वय समिति में सभापति थी । वि.सं. २०२० साल से ही मैं रेडक्रस से आबद्ध होने के कारण मैं प्रिन्सेप शाह से नजदीक था । इसीलिए उन्होंने स्वास्थ्य समिति में आने के लिए कहा । परिषद् में ६ समिति में से एक स्वास्थ्य समन्वय समिति भी थी, उसके सदस्य सचिव के रुप में मुझे काम करना था । वहां मैं एक साल तक ही रहा ।

लोकसेवा आयोग का सदस्य
‘सामाजिक सेवा राष्ट्रीय समन्वय परिषद्’ में एक साल बिताने के बाद मेरी नियुक्ति लोकसेवा आयोग में हो गई । यहां से मेरी डाक्टरी सेवा संबंधी पेशा औपचारिक रूप में समाप्त हो गई । लोकसेवा आयोग में मैंने सबसे ज्यादा १२ साल काम किया । यहां से रिटायर्ड होने के बाद राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में भी सदस्य के रूप में काम करने का मौका मिला था ।

जान बच गई
देश में माओवादी का सशस्त्र युद्ध चल रहा था । मैं राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में सदस्य था । मानवअधिकारवादी के रूप में आयोग के हम दो सदस्य रुकुम भ्रमण में गए थे । वहां (खारा) माओवादी ने दो पुलिसकर्मियों को मार दिया था । उसके बाद सरकारी सुरक्षाकर्मियों ने अन्धा–धुन्ध गोली चलाई । ६० से अधिक घरों में आग लगाई गई थी । सरकारी सुरक्षाकर्मियों की ओर से बहुत सारे सर्वसाधारणों की हत्या की गई थी । चर्चा यह भी थी कि माओवादी नियन्त्रण में भी कुछ पुलिस और सर्वसाधारण हैं । ऐसी अवस्था में हम लोग अनुगमन के लिए गए वहां थे । वहां पहुँचते ही हम लोगों को लगा कि माओवादी से भी मिलना जरूरी है । मैं मानव अधिकार आयोग के अन्य सदस्य सुशील प्याकुरेल जी के साथ में गया था । वह कुछ हद तक निडर भी थे । प्याकुरेल जी का संपर्क माओवादी के कुछ नेताओं के साथ था । लेकिन उस जगह माओवादी के संपर्क में कैसे पहुँचूं ? इसका संपर्क सूत्र नहीं मिल रहा था ।
इसीलिए एक स्कूल में अध्ययनरत विद्यार्थियों से हम मिले और उनके ही सहयोग से माओवादी के सम्पर्क में पहुँच गए । खबर मिलते ही तत्कालीन जिला नेता हम लोगों के पास आए और हम लोगों से स्कूल के पास मिले । आते वक्त उन लोगों की ओर से सुरक्षा प्रदान की गई, जो मेरे लिए भयावह रही  ! चारो ओर हथियारधारी माओवादी कार्यकर्ता दिखाई देते थे । लगता था कि बंदूक हमारी ओर ही तनी हुई है । कहीं मिस–फायर तो नहीं होगी, मुझे ऐसा ही लग रहा था । मुझे यह भी लगा कि माओवादी से बातचीत करने से महत्त्वपूर्ण हमारी जान बचनी है । प्याकुरेल जी तो माओवादी नेताओं से बात कर रहे थे, लेकिन मेरा ध्यान माओवादी सेना और उनकी बंदूक की ओर था ।
धीरे–धीरे मनःस्थिति सामान्य बनती गयी । उस रात हम लोग माओवादी सुरक्षा घेरा में रह गए । रात का खाना पीना माओवादी की ओर से हुआ । मुझे तो लगा था कि हम लोग सामान्य खाना खाएंगे, लेकिन हमारे साथ जो कर्मचारी थे, उसने कहा कि मुर्गा का मांस भी खाना है । माओवादी की ओर से उसकी भी व्यवस्था हो गई । जिस घर में नमक निकालने की आर्थिक हैसियत नहीं दिखाई देती थी, उस घर में हमारा स्वागत अच्छी तरह से हुआ । मांस, दही और खाना मिल गया । उसके बदले हम लोग कुछ पैसा देना चाहते थे । लेकिन माओवादी और गांववासियों ने इन्कार किया और कहा– आप लोग वहां से आए हैं, क्या हम लोगों को इतना सत्कार करने का अधिकार भी नहीं है ? हम लोगों के पास जवाब नहीं था । इसतरह वहां से हम लोग काठमांडू वापस हो गए । कुछ दिनों तक मुझे लग रहा था कि कहीं मिस–फायर हो गया होता तो ।. !
५ वर्षीय कार्यकाल (वि.सं. २०५७–०६२) में मैं पाँचथर, खोटाङ आदि कई जगहों पर मानव अधिकारवादी और अनुगमनकर्ता के रूप में पहुँचा हूँ । द्वन्द्वकाल में माओवादी और सरकारी सुरक्षाकर्मी दोनों की ओर से मानवअधिकार का उल्लंघन हुआ है । रामेछाप जिला के दोरम्बा में तो सरकारी सुरुक्षाकर्मियों की ओर से गम्भीर मानवअधिकार उल्लंघन हुआ था, यहां माओवादिओं को नियन्त्रण में लेकर और हाथ–पैर बांध कर गोली मार दी गई थी ।

 मृत्यु उत्सव
सन् १९३४ साल की बात है, उस समय मैं ५वीं क्लास में पढ़ता था, मेरी उम्र १० साल की थी । एक दिन (माघ २ गते) भूकंप आया । इस भूकंप को आज भी हम लोग ‘९० साल का भूंकप’ के नाम से जानते हैं । उस दिन हम लोग स्कूल की ५वीं कक्षा कोठा में ही थे । अंग्रेजी विषय की पढाई हो रही थी । मास्टर साहेब थे– नत्थुलाल दास । जब भूकंप की गड़गड़ाहट शुरू हुई, चारों ओर से ‘भागो– भागो’ की आवाज आने लगी । लोग कह रहे थे कि नवग्रह इकठ्ठा हो रहा है, प्रलय होने जा रहा है, आपत्ति आनेवाली है । भूकंप क्या है ? नवग्रह इकठ्ठा होने का मतलब क्या है ? कुछ भी पता नहीं था, लेकिन ‘भागो–भागो’ की आवाज के साथ हमलोगों ने भी भागना शुरू किया । सब विद्यार्थी एक ही बार भागने के कारण बरामदा से गिरने लगे । एक के ऊपर दूसरे गिर रहे थे । जिसके चलते कुछ विद्यार्थी घायल भी हो गए । तब भी भाग रहे थे हम लोग । विद्यालय भवन परिसर से बाहर तो निकल गया, लेकिन बाहर आने पर पता चला कि धरती फट रही थी, वहां से पानी निकलने लगा था । लोग कह रहे थे– अब प्रलय होने जा रहा है, अब हम लोग डूब जाएँगे । हमलोगों ने ऊँची जगह तलाश की और स्कूल के पास ही एक भगवती मंदिर परिसर में चले गए । वहाँ पहुँचने के बाद देखा कि मन्दिर का ऊपरवाला भाग टूट रहा है । वहां भी हम लोग नहीं रह पाए । लगने लगा कि हमारा जीवन अब इतना ही है । मेरे जीवन के लिए सबसे त्रासदीपूर्ण घटना सम्भवतः यही है, जो मैंने बचपन में ही भोगा, महसूस किया ।
मेरे साथ एक ममेरे भाई और एक फुफेरे भाई भी थे । हम लोग एक ही स्कूल में पढ़ते थे । हम लोग मन्दिर से निकल गए । स्थानीय बहुत लोगों का घर टूट गया था । मन्दिर के पीछे खाली जमीन में हम लोगों ने बांस और साड़ी–बगैर टांगकर अस्थायी निवासस्थान बना लिया । रातभर हम लोग उसी में रहे । आंख में नींद नहीं थी । मन में एक प्रकार का डर बना रहा था । लेकिन एक प्रकार से मनोरंजन भी हो रहा था, यूं कहे तो हम लोग सम्भावित मृत्यु से पहले का ‘मृत्युत्सव’ मना रहे थे । मुढ़ी, लाई (तिलवा और भूजा से निर्मित लड्डु) जो कुछ भी मिलता था, सब खा रहे थे । क्योंकि हम लोग सोच रहे थे कि अब प्रलय होनेवाला है, हम लोग जीवित रहनेवाले नहीं है, जो कुछ है, सब खां लो !
हां, खाने चीज की कमी तो नहीं थी, लेकिन पीने के पानी का अभाव रहा । जो भी कुआँ था, भूकंप के कारण उसमें से बालू निकल रहा था, गांव के ही पास में एक कुँआ था, जो ठीक था । उसी से पानी का काम चला । बाद में हम लोगों ने देखा कि भूकंप के कारण वहां की जमीन फट गई थी, दरार पड़ गई थी, वहां गीदड़ ने अपना घर बना लिया था ।
सबसे दुःखद ३६ना
मैं टोखा स्वास्थ्य निवास में था । मेरे क्वाटर–कंपाउन्ड के भीतर मानव निर्मित पानी का झरना था, जो बहुत ही सामान्य और छोटा ही था । उसके नीचे छोटा–सी पोखरी थी । कोई भी कल्पना नहीं कर सकता था कि यहां कोई डूब सकता है । क्योंकि उसमें घुटनों के डूबने लायक भी पानी नहीं था । एक दिन मैं शिवनारायण दास (सहायक–सचिव) के साथ बात कर रहा था, उसी वक्त बर्मा (म्यानमार) के लिए राजदूत प्रकाशचन्द्र ठाकुर जी भी आ गए । जान–पहचान होने के बाद ठाकुर जी ने मुझसे पूछा– आप की पत्नी गर्भवती है क्या ? मैंने कहा– हाँ । उन्होंने फिर पूछा– कितने महीने चल रहे हैं । मैंने कहा– ६ महीना । उन्होंने फिर पूछा– आप के घर–कंपाउन्ड में पानी का तलाब है क्या ? मैंने कहा– ‘जी, पानी का तलाव तो नहीं है । लेकिन एक छोटा–सा झरना जैसा है, उसके नीचे पानी जमा हुआ है । उन्होंने फिर कहा– छोटे बच्चे के लिए यह भी डेन्जरस हो जाता है ! उसके बाद बात यही खतम हो गयी ।
लगभग ४ महीने के बाद मेरी पत्नी गंगा देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया । उसका नाम हम लोगों ने ‘हरिशंकर’ रखा था । बच्चा डेढ़ साल का हो रहा था । उसकी देखरेख के लिए एक माली भी था । एक दिन हम लोग घर के भीतर आराम कर रहे थे । माली काम के लिए कहीं गया था । बच्चा खेलते–खेलते पानी (झरना) तक पहुँच गया । जब हम लोगों को पता चला, वह बेहोश हो चुका था । बहुत कोशिश करने बाद भी हम लोग उसको नहीं बचा पाए । जीवन में यह मेरे लिए सबसे दुःखद घटना रही है ।
लेकिन यहां एक आश्चर्य और संयोग की बात है, जो प्रकाशचन्द्र ठाकुर और उनके कथन से जुड़ी हुई हैं । उन्होंने शुरू में ही मुझे सम्भावित भवतव्य के बारे में सचेत करवाया था, लेकिन उस वक्त मैं इसे समझ नहीं पाया । बाद में जब दुःखद घटना घटी, तब मुझे खयाल आया । फिर यह भी सुनने को मिला कि ठाकुर जी ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने, मातृका प्रसाद कोइराला, विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला और गिरिजाप्रसाद कोइराला को फोटो में देखकर कहा था कि यह तीनों नेपाल के प्रधानमन्त्री बननेवाले हैं, जो सच हो गया । ठाकुर जी के पास विशेष दैवीशक्ति अथवा ज्योतिषीय ज्ञान थी, ऐसा नहीं है । सम्भवतः पूर्वाभास से उन्होंने कुछ कह दिया, जो बाद में सच हो गया । लेकिन आज भी जब उस घटना में खो जाता हूं, दुःखित और आश्चर्यचकित हो जाता हूँ ।
सम्भवतः वि.सं. २०२० साल की बात है । मैंने काठमांडू में पहली बार घर खरीद लिया, जो मिट्टी से बना हुआ था । एक दिन भारी बारिश होने के कारण घर गिर गया । जमीन तो थी, लेकिन घर बनाने के लिए पैसा नहीं था । जीना तो पड़ेगा ही, क्या करें ! रेडक्रस से टेन्ट मंगाया और उसी टेन्ट में रहने लगा । दो साल तक मैंने टेन्ट में रहकर जीवन बिताया है । शायद यह भी मेरे लिए दुःखद क्षण ही है ।

सामाजिक सेवा
वि.सं. २००४ साल में परोपकार संघ नामक एक सामाजिक संस्था बनी । उस समय काठमांडू में हैजा फैला हुआ था, उसको नियन्त्रण करने में परोपकार संघ का महत्वपूर्ण योगदान है । वि.सं. २०१० साल में रमेश शर्मा की सक्रियता में नेपाल क्षयरोग निवारण संस्था नामक दूसरी संस्था बनी । उस संस्था के अध्यक्ष मातृका प्रसाद कोइराला जी थे, जो उस वक्त प्रधानमन्त्री भी थे । प्रधानमन्त्री जैसे व्यक्ति नव–गठित संस्था के अध्यक्ष ! आश्चर्य की बात थी । बाद में जब नागेश्वर प्रसाद सिंह स्वास्थ्य मन्त्री बने, उसके बाद कोइराला जी ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया और नागेश्वर जी को ही अध्यक्ष बना दिया । संस्था में प्रत्यक्ष रूप में आबद्ध होने की इच्छा होती थी । लेकिन टोखा जैसे दूर गांव में रहने के कारण सम्भव नहीं रहा । जब वि.सं. २०१८ साल में मैं काठमांडू आया, उसके बाद मुझे सामाजिक संस्था में आबद्ध होने का अवसर मिलने लगा । वि.सं. २०२० साल में मैं क्षयरोग निवारण संस्था में औपचारिक रूप में सदस्य कें रूप में प्रवेश किया, जहां मैंने कार्य समिति सदस्य बनकर काम किया ।
वि.सं. २०२० साल भाद्र १९ गते नेपाल रेडक्रास नामक संस्था भी स्थापित हो गई । रेडक्रास की प्रथम अध्यक्ष प्रिन्सेप शाह (राजा महेन्द्र के मझले भाई की पत्नी) थीं । रेडक्रास की प्रथम बैठक में मैं सहभागी नहीं हो पाया । लेकिन प्रथम चुनाव के बाद ही मैं रेडक्रस कार्य–समिति में सदस्य के रूप में चयन हो गया । उसके बाद वि.सं. २०५८ साल तक मैं रेडक्रास में विभिन्न पदों पर रहा हूँ । रेडक्रास तथा क्षयरोग निवारण संस्था की ओर से ही मैंने प्रारम्भिक सामाजिक कार्य शुरू किया । बाद में दर्जनों सामाजिक संस्थाएं मेरी ही सक्रियता में खुली, अन्य दर्जनों सामाजिक संघ–संस्था में प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष सहभागी होकर काम किया ।
शाही खानदान आततायी नहीं हैं
रेडक्रास में रहते वक्त मैंने कम्युनिटी डेभलपमेन्ट, पदपूर्ति समिति आदि में सभापति के रूप में रह कर काम किया है । इस संस्था में शुरू से ही राजपरिवार से जुड़े हुए लोगों की बाहुलता थी । अध्यक्ष प्रिन्सेप शाह भी राजपरिवार से ही जुड़ी हुई महिला थीं । उनके अलावा राजपरिवार से जुड़े हुए अन्य सदस्यों से भी मेरी जानपहचान रही । उन लोगों का कई व्यवहार और संस्कार मैंने करीब से देखा है, अनुभूति की है । राजनीतिक परिवर्तन के बाद आम लोगों में आज एक हल्ला है कि राजपरिवार अर्थात् शाही खानदान आततायी होते हैं, निरंकुश होते हैं, हिंसक होते हैं, न जाने इस तरह की कई अफवाहें फैलाई जाती हैं । लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि ऐसा नहीं है । प्रिन्सेप शाह की ही बात करे तो वह बहुत ही मिलनसार थीं । राजपरिवार से होने का उन्हें जरा भी घमण्ड नहीं था, सामान्य नागरिकों की तरह पेश आती थीं । रेडक्रस से होनेवाले राहत वितरण में कई बार मैं उनके साथ राहत क्षेत्र में गया हूँ ।
उनके कार्यकाल में ही ७५ जिलों में शाखा विस्तार की गई थी । साधारणसभा में आनेवाले सभी जिलों के प्रतिनिधियों से वह भेट करती थीं, जहां राज–खानदान का रुआब नहीं दिखाई देता था । आज तो समाचार में यह भी आ रहा है कि रेडक्रास में बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार हो रहा है । लेकिन हमारे समय में जब केन्द्रीय कार्य समिति बैठक होती थी, उस में सिर्फ एक कप चाय मिलती थी, और कुछ नहीं । बाद में भुपेन्द्र नेपाली ने विनती की कि, चाय के साथ बिस्कुट भी मिल जाए तो ठीक रहेगा । उसके बाद ही चाय के साथ बिस्कुट भी आने लगा था । अर्थात् हमारे समय में रेडक्रस में भ्रष्टाचार शून्य था, सुशासन कायम था । हम लोग निःस्वार्थ भाव से सामाजिक कार्य करते थे । लेकिन आज तो सुनने में आ रहा है कि भूकंप पीडितों के लिए जो राहत आया, उसमें भी भ्रष्टाचार हुआ है ।
यहां सुशासन का एक और उदाहरण पेश करता हूं । मैं रेडक्रस में पदपूर्ति समिति का सभापति था । हेलेन शाह संस्था की सभापति थीं । उस समय रेडक्रस में जितने भी कर्मचारी भर्ती होते थे, वह सब समिति के मातहत ही होते थे । किसी की ओर से गड़बड़ नहीं होती थी । नियमानुसार कर्मचारी भर्ती किए जाते थे । लेकिन हेलेन शाह ने पदपूर्ति समिति की जानकारी बिना ही एक महिला कर्मचारी भर्ती कर दी । कार्य समिति बैठक में इसके बारे में मैंने प्रश्न किया और कहा कि ऐसा करना ठीक नहीं है, पदपूर्ति समिति की जानकारी बिना कोई भी कर्मचारी भर्ती नहीं हो सकता । उसके बाद हेलेन शाह ने माफी मांग ली और प्रतिबद्धता व्यक्त किया कि अब ऐसा नहीं होगा । उस जमाने में राजपरिवार की अधिराजकुमारी ऊपर प्रश्न उठाना, और मुंह से ‘सॉरी’ शब्द निकलना एवं माफी मांगना बहुत बड़ी बात थी । अगर वह चाहतीं तो हर कर्मचारी उनके चाहत के अनुसार भर्ती कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया । लेकिन आज की व्यवस्था में देखते हैं तो हर जगह पहुँचवालों के ही भाई, भतीजे, साली, भांजा आदि दिखाई देते हैं ।
सिर्फ रेडक्रास में ही नहीं, शासन–सत्ता के हर–जगहों में सुशासन कायम करने की कोशिश होती थी । हां, अपवाद तो हर जगह होता है । राजपरिवार और राजपरिवार से संबंधित सदस्यों का नाम लेकर बदमासी करनेवाले लोग उस समय में भी थे । उन लोगों के कारण ही राजपरिवार की बदनामी होती थी । जैसे कि मैं लोकसेवा में रहते वक्त की एक घटना स्मरण करता हूँ । उस समय दरबार में कार्यरत एक कर्मचारी ने मुझे फोन किया और कहा कि उनके एक अपनेजन को लोकसेवा पास करवाना है । वह दरबार के उच्च पदस्थ कर्मचारी थे । उन्होंने चेतावनी भी दी की अगर पास नहीं करवाया तो कुछ भी हो सकता है । ऐसे ही लोग हैं– राजपरिवार को बदनाम करनेवाले । लेकिन राजपरिवार के सदस्यों से मुझे कभी भी इसतरह की धमकी नहीं आई । यहां तक कि गृहमन्त्री की ओर से भी इस–तरह की धमकी आती थी । मन्त्री, राजदरबार के कर्मचारी तथा राजपरिवार से निकट रहे कुछ लोग राजपरिवार का नाम लेकर धमकी देते थे । लेकिन राजा–रानी तथा राजपरिवार के सदस्यो से कभी भी इसतरह का अवैधानिक काम करने के लिए दबाव नहीं आया ।
उस समय जितना भी दबाव हो, मैंने अवैध काम नहीं किया । मुझे विश्वास है कि लोकसेवा आयोग आज भी स्वतन्त्र और निष्पक्ष है, यहां कोई भी गलत बात नहीं होती है । मुझे लगता है कि नेपाल में आज लोकसेवा आयोग की एक मात्र ऐसी संस्था है, जिसमें आज भी आम सर्वसाधारण का विश्वास कायम है ।

रेडक्रास सामाजिक संस्थाओं की जननी
नेपाल में रेडक्रास ऐसी संस्था है, जो बहुत सामाजिक संस्थाओं की जननी है । रेडक्रास की ही सक्रियता में नेपाल कुष्ठरोग निवारण संस्था, आमा मिलन केन्द्र, एसओएस चिल्ड्रेन भिलेज जैसे बहुत सामाजिक संस्थां बनी । कुष्ठरोग निवारण संघ का संस्थापक उपाध्यक्ष मैं ही हूँ । शान्ति सिंह अध्यक्ष थी । इस संस्था में प्रिन्सेप शाह सदस्य थी । लोगों ने कहा कि गौरीशंकरलाल दास उपाध्यक्ष हैं, यह कैसे हो सकता है ? लेकिन प्रिन्से प शाह ने कहा– सामाजिक संस्था में कोई भी प्रोटोकल नहीं होता, मैं सदस्य में ही ठीक हूँ ।
इतना ही नहीं, प्रौढ़ कल्याण संघ, राष्ट्रीय ज्येष्ठ नागरिक संजाल (आज का महासंघ), इम्प्याक्ट नेपाल, वीपी आई फाउण्डेशन, चित्रगुप्त प्रतिष्ठान, सिरहा सेवा समाज, राष्ट्रीय निर्वाचन पर्यवेक्षण समिति, रुद्रराज साहित्य सेवा समिति जैसे कई संस्था बनाकर हम लोगों ने काम किया है । कई संस्थाओं में मैं ही संस्थापक अध्यक्ष रहा, कई संस्था में बाद में अध्यक्ष की जिम्मेदारी ली है । आज भी वीपी आई फाउण्डेशन का अध्यक्ष हूँं, जिसकी जिम्मेदारी हाल ही में मिली है । अन्य सामाजिक संस्थाओं में भी सक्रिय हूँ ।

६«ेकिङ में रुचि, रारा सबसे सुन्दर
मेरा प्रोफेशनल जीवन मेडिकल क्षेत्र रहा है, लेकिन समाजसेवा भी मेरी एक पहचान बन गई । इसके अलावा मेरी रुचि ट्रेकिङ में भी है । नेपाल के कई जगहों में मैं ट्रेकिङ के लिए गया हूँ । पैदल (सिमिकोट, हुम्ला से) ३ बार मानसरोबर स्नान किया और पवित्र कैलाश की परिक्रमा की । गोसाइँकुण्ड ठंडी जगह हैं, जहां मैं माघ महीना (ठंड का मौसम) में भी गया हूँ, जहाँ कई लोग नहीं जा पाते । अरनिको राजमार्ग बनने से पहले ही पैदल चिनियां बोर्डर तक पहुँचा हूँ । रारा भी एक बार पहुँच चुका हूँ । मुझे लगता है कि अगर कोई नेपाल घूमना चाहते हैं तो रारा ताल (मुगु जिला) को देखे बिना उसका नेपाल भ्रमण अधूरा ही रह जाएगा । क्योंकि मैं ट्रेकिङ कर नेपाल की कई जगहों में गया हूं, सबसे अच्छा तो मुझे रारा ही लगा । इसीलिए नेपाल के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखना है तो एक बार जरूर रारा–ताल तक पहुँचना ही चाहिए ।

संक्षेप में कहे तो ट्रेकिङ मेरा शौक था, मैं पूरे एक महीने की छुट्टी लेकर भी ट्रेकिङ में गया हूँ । शारदा शाह (राजा वीरेन्द्र की बहन) के साथ भी मैं ट्रेकिङ पर गया हूँ । ट्रेकिङ के अलावा मुझे संगीत में भी रुचि है । मैं ढोलक और बांसूरी भी बजाता हूँ । लेकिन संगीत और वाद्यवादन संबंधी कोई भी तालीम नहीं ली है । बजाते–बजाते सीख लिया ।
पश्चात्ताप !
मैं एमबीबीएस कर चुका था, इन्टर्नशीप पीरियड चल रही थी । उसी समय भारत में एन्टि–मलेरिया संबंधी कार्यक्रम भी चल रहा था । उस समय की एक घटना है, सन्थाल प्रगना में घटी थी । एन्टि–मलेरिया सेन्टर में मलेरिया से पीडि़त एक मरीज मेरे पास आया । उसके उपचार की जिम्मेदारी मुझे दी गई थी । बहुत लोगों को मैंने ठीक किया है, लेकिन उसको नहीं बचा सका । शायद मेरे जीवन में पश्चात्तापजन्य घटना ही यही है । अन्य घटना तो याद नहीं आ रही है ।
सब चीज नाशवान् हैं
मैं धर्म और अध्यात्म को मानता हूँ । दैनिक ढाई–तीन घण्टा योग और ध्यान में बीत जाता है । लेकिन अधिकांश लोगों की तरह परम्परागत पूजा–पाठ नहीं करता, करनेवालें को रोकता भी नहीं हूँ । धर्म और अध्यात्म, पाप और पुण्य से जोड़ कर देखा जाता है । महर्षि वेदव्यास ने कहा है–
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् । ।
अर्थात् परोपकार सबसे बड़ा धर्म है, किसी को पीड़ा देना सबसे बड़ा पाप है । मैं भी यही मानता हूँ । मैं धार्मिक हूँ, धर्मान्ध नहीं हूँ । रामायण, महाभारत, गीता पढ़ता हूँ । सभी धर्म का सम्मान करता हूँ । सभी धर्म का मूल उद्देश्य परोपकार ही है । जब कोई व्यक्ति धर्म के नाम में इस मर्म को भूल जाता है, तब ही वह हिंसक बन जाता है ।
नहीं भूलना चाहिए कि आप अपने सामने जो भी चीज देखते हैं, वह सब नश्वर है, नाशवान् है । मानव जीवन भी नाशवान् है । हम लोग जिस जगह में रहते हैं, उसको पृथ्वी कहते हैं । यह पृथ्वी भी नाशवान् है । आज मानव जिस तरह प्राकृतिक सम्पदा का दोहन कर रहा है, उससे यहां का तापक्रम बढ़ रहा है । एक दिन ऐसा आएगा, जिससे पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाएगी । जिस को हम लोग प्रलय कहते हैं । जब सारा विश्व और प्राणी नष्ट हो जाएगा, फिर उसके बाद नई सृष्टि शुरू होगी । यही ईश्वर तथा प्रकृति का नियम है ।
हृदय में शान्ति आवश्यक
इतना होते हुए भी, सब कुछ जानते हुए भी आम आदमी सुख और शान्ति के लिए भटकता रहता है । सुख और शान्ति का मूलस्रोत हृदय है । जब हृदय में शान्ति मिलेगी, तब आप को सुखानुभूति होगी । एक कहावत है– सन्तोषम् परम् सुखम् । जीवन के प्रति संतुष्ट रहना ही, सुखानुभूति का मूल कारण है । जिसके पास दस रुपए हैं, वह उसको सौ रुपए बनाना चाहता है, जिसके पास सौ है, वह उसको हजार बनाना चाहता है, जिसके पास हजार है, वह लाख बनाना चाहते हैं, यह शृंखला अनवरत जारी रहेगी । अगर इसतरह की शृंखला में आप फंस जाएंगे तो आप में असन्तुष्टि आने की सम्भावना अधिक है । दुःख का मूल कारण भी यही है । इसीलिए आप के पास जो कुछ है, उसमें सन्तुष्ट होना सीखें, उसी में शान्ति और सुख अन्तर्निहित होता है । तृष्णा ही सबसे खराब है । भौतिक विकास और प्रगति के लिए आकांक्षा होना जरूरी है, लेकिन महत्वाकांक्षा दुःख का कारण बन जाता है । इसीलिए हमारे पास उतनी ही आकांक्षा होनी चाहिए, जो सम्भव हो । असम्भव महत्त्वाकांक्षा रखकर खुद को पीडि़त बनाते हैं तो जीवन में दुःख के सिवाय आप को कुछ भी मिलनेवाला नहीं है ।
राजनीति से दूर
मैं राजनीति के कभी भी नजदीक नहीं रहा । कई राजनीतिक नेताओं से पहचान तो हैं, मैं राजनीति से दूर रहना चाहता हूँ, इसीलिए किसी के साथ भी करीबी दोस्ती नहीं है । वर्तमान परिस्थिति को देखकर एक टिप्पणी करना चाहता हूं– राजनीति भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहिए । राजनीतिज्ञ बन कर रहो या कर्मचारी बनकर, भ्रष्टाचार से दूर ही रहो । आज हमारे देश में जो भी विकृतियां है, उसका मूल कारण भ्रष्टाचार ही है । विकास और समृद्धि में हम लोग क्यों पीछे हैं ? इसके पीछे भी भ्रष्टाचार है । अगर आप भ्रष्टाचार करेंगे तो एक न एक दिन आप की आत्मा आपको धिक्कारेगी । अगर आप को आत्मा धिक्कारेगी तो जीवन में सुख मिलनेवाला नहीं है ।
अन्धानुकर०ा ना करें
हमारी पीढ़ी और आज की पीढ़ी में बहुत कुछ परिवर्तन आया है । सिर्फ राजनीति में ही नहीं, भौतिक विकास, सामाजिक संस्कार, जीवन जीने की शैली, बहुत कुछ में परिवर्तन आया है । परिवर्तन की आवश्यकता भी है । लेकिन परिवर्तन का परिणाम सुखद भी है और दुःखद भी । लोगों को शिक्षित होना, औद्योगीकरण बढ़ना, जनसंख्या और आधुनिक प्रविधियों की बढ़ोत्तरी ने जीवन तो सहज बन रहा है, लेकिन प्राकृतिक स्रोत–साधन की क्षति से ग्लोबल–वार्मिङ भी बढ़ रहा है । सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी कई विकृतियां है, इसीलिए हम लोग जो अनुकरण करते हैं, उसका प्रभाव कैसा है, उसमें भी पुनर्विचार होना जरूरी है । किसी भी जीवन और संस्कृति का अनुकरण करें, लेकिन अन्धानुकरण ना करें । जैसे कि पश्चिमी देशों में भी एक संस्कार है, जहां प्रायः व्यक्ति दूसरों को हेल्प करना चाहते हैं । मेरी ही अनुभूति है । एक घटना याद आ रही है । एक बार मैं विदेश जा रहा था मेरे पास जो लॉगेज था, उसको ढोने के लिए मैं मजदूर ढूँढ रहा था, लेकिन कोई भी मजदूर नहीं मिला । तभी एक विदेशी आकर कहने लगा– मे आई हेल्प यू । इसतरह की भावना और संस्कृति आज हमारे गांव में कहीं कहीं देखने को मिलती है, लेकिन शहर में नहीं है । पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण करते वक्त हम लोगों ने उन लोगों के गलत संस्कार को तो सीख लिया, लेकिन सही संस्कार नहीं सीख पाया ।
आजकल
९६ साल का हो चुका हूँ । सुबह लगभग ५ बजे आंख खुल जाती है । दैनिक सूक्ष्म व्यायाम, प्रणायम, योग सब कुछ करता हूँ, जिसके लिए ढाई–तीन घण्टे लग जाते हैं । धार्मिक ग्रन्थ का अध्ययन भी करता हूँ । वायु–प्रदूषण के कारण मर्निङवाक नहीं करता, लेकिन इभिनिङवाक के लिए निकलता हूँ । दिन विभिन्न कार्यक्रम, सभा–सेमिनार आदि में बीत जाता है । कभी–कभार तो दिन में दो–तीन कार्यक्रम भी पड़ जाते हैं । आज भी कई सामाजिक संस्थाओं संलग्न हूं, जिसमें जाना अनिवार्य होता है ।

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