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समाधान का हमेसा बाधक रहा सेकुलरिज़्म : प्रवीण गुगनानी

 

सबसे कठिन है राम हो जाना  

और हम चार सदी तक  राम बने रहे

राम तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा l

आयउ भृगुकुल कमल पतंगा ll  

शत्रु से वाद विवाद मे विजयी होने का ऐसा मंत्र हमें देने वाले श्रीराम के हम वंशज व भक्त हैं। इस नाते हम जानते हैं कि सबसे  दुष्कर, दुरूह व कठिन कार्य है राम होना। श्रीराम जैसा धैर्यवान, शीलवान व मर्यादित बनना, जो हम हिंदू चार सौ वर्षों से बने रहे व आगे भी  बने रहेंगे। अयोध्या विषय मे हिंदू पक्ष से हिंदू संगठनों द्वारा ही हर हाल मे शांति की अपील दुर्बलता लग सकती है, किंतु यह दुर्बलता नहीं वरिष्ठता है। यही वह भाव है जो हमें श्रेष्ठता देता है। अयोध्या निस्संदेह हमारी आस्था का प्रतीक है किंतु यह भी अटल सत्य है कि अयोध्या हमारे युगीन संघर्ष का प्रतीक है। श्रीराम जन्मभूमि हमारे संघर्ष का ऐसा प्रतीक रहा है जिससे यरूशलम के लिए संघर्ष करने वालों ने भी प्रेरणा ली है। हमारी आस्था से अधिक हमारे संघर्ष का प्रतीक हो गई है अयोध्या। जन्मभूमि विषय मे हिंदू समाज के 77 वें संघर्ष मे मिली सफलता पर मर्यादित रहने का यह सांगठनिक आग्रह विचार कुछ लोगों कमजोरी लग सकता है किंतु यही गरिमा हमारा इतिहास रही है।  इतिहास जय पराजय का एक संकलन है वह बहादुरी , कायरता , विश्वासघात की बात तो करता है लेकिन सामुहिक उत्तरदायित्व , कर्तव्य से जुड़ी विवशता की बात नहीं करता।

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आज यदि हम शताब्दियों के संघर्ष से प्राप्त इस विजय पर उन्मादित होना तो छोड़िए; उल्लास व उमंग मे भी नहीं आ रहें हैं तो इसके पीछे मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा ही है। हम उसी मर्यादा वश इस देवभूमि भारत को केवल अपना राष्ट्र नहीं अपितु मातृभूमि, पितृभूमि व मोक्षभूमि मानते हैं। भारत के उन महान वीरपुत्रों की विवशता समझिये की जिनकी वीरता व पुरुषार्थ के सामने कोई टिक नहीं सकता था किंतु उन्होंने विवश होकर जन्मभूमि विषय को विवेकशील होकर न्यायालय के समक्ष नतमस्तक होकर रख दिया था। उसका एकमात्र कारण था कि हमारे पूर्वज इस राष्ट्र व इसके समाज को अपना समझतें थे। सिकंदर के सामने पोरस के 21 दिनों तक बिना हथियार उठाए खड़े होने की कहानी हो, महाराणा प्रताप हों, शिवाजी हों या सोमनाथ हो, मथुरा-काशी हो या अयोध्या हो हम प्रत्येक कहानी मे राष्ट्र सर्वोपरि के पक्षधर रहें हैं और आज भी दृढ़ता से हैं। हम दूसरों के बोये गए और प्रारंभ किए गए युद्धों का ही सफलता पूर्वक समापन करते चलें आयें हैं। हम कभी किसी युद्ध के प्रवर्तक व नियामक नहीं रहे हैं, हाँ, हम युद्धों के समापनकर्ता अवश्य रहें हैं। आज जन्मभूमि के लिए हमारें पूर्वजों द्वारा झेले गए 76 संघर्षों के बाद 77 वें संघर्ष मे अहिंसक रहते हुये विजयी होने का युगांतरकारी दिवस है। यह हम हिंदुओं की विजय नहीं हैं; यह विजय है भारतीय संस्कृति की, संस्कारों की, युद्धोन्माद से दूर रहने की और राष्ट्र सर्वोपरि के अनुपम भाव की। हम हमारी अगली पीढ़ी को जो विश्वगुरु की ओर बढ़ता व अखंड भारत की विरासत देना चाहते हैं, यह उस भाव मात्र की विजय है।

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    एक बात का स्मरण और करना आवश्यक है, वह यह कि, जन्मभूमि विवाद कहने मात्र को हिंदुओं व मुस्लिमों के मध्य रहा है। वस्तुतः इस विषय मे एक तीसरा अप्रत्यक्ष पक्ष सदैव सक्रिय रहा जिसने कभी इस विषय का समाधान परस्पर चर्चा से नहीं होने दिया उस तीसरे पक्ष का नाम है सेकुलरिज़्म। सेकुलर शक्तियों ने विशुद्ध भारतीयता की शैली से व चर्चा के माध्यम से इस समाधान को नहीं होने दिया व राष्ट्र मे अंतर्निहित शक्तियों का ह्रास व क्षरण किया। मीडिया मे, अकादमिक संस्थानों मे, विधिक संस्थानों मे, सत्ता मे सदैव बड़ा हिस्सा लेकर चलने वाले ये सेकुलर ही इस विवाद के वाहक रहें हैं और इस रूप मे हमारे भारतीय समाज के अप्रत्यक्ष खटमल या पिस्सू बने रहें हैं।  आगामी समय मे इस अयोध्या मे भव्य मंदिर का निर्माण मात्र ही हमारा लक्ष्य नहीं है, इसके साथ साथ इस विवाद मे खर्च हुई हमारी धार्मिक समरसता की शक्तियों का संधान भी हमारा प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए।  

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