Sun. Dec 8th, 2019

चीन का वर्चस्व कितना हितकारी ?

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हिमालिनी  अंक  अक्टूबर 2019 |नेपाल सही मायने में बड़ा भाग्यशाली है, क्योंकि इसके दोनों तरफ से विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों का कवच है । दो बडेÞ राष्ट्रों के बीच नेपाल की अवस्था देखने योग्य है । कभी दक्षिणी कवच से तो कभी उत्तरी कवच से, दोनों कवचों से नेपाल अपने आपको सुरक्षित करना चाहता है । पर सवाल यह उठता कि उत्तरी कवच से नेपाल कितना सुरक्षित है ? इनके सहयोग से नेपाल की जनता कितना लाभान्वित हो सकती है । इसी सन्दर्भ में हम बात करते हैं चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की जो हाल फिलहाल ही नेपाल भ्रमण करने आये थे ।

 

बहुप्रतिक्षित और बहुप्रचारित इस भ्रमण के लहर की गन्ध नेपाल में अभी मौजूद है । क्योंकि यह भ्रमणकाल लगभग अढाई दशकों के बाद हुआ है । सन् १९९६ में चीन के राष्ट्रपति नेपाल आए थे । २३ वर्ष के अन्तराल में लगभग दो वर्ष की प्रतीक्षा तथा महीनों तैयारी के बाद यह कार्य सफल हो पाया है । औपचारिकता के लिये नेपाली प्रधानमन्त्री खड्गप्रसाद ओली ने सम्पूर्ण नेपाली को इस कार्य को सफल बनाने के लिये धन्यवाद दिया । इस भ्रमण से सत्ताधारियों में एक अलग प्रकार की आशा उत्पन्न हुई है । उनके अनुसार नेपाल अब समृद्ध हो सकता है ।

नेपाल के प्रथम जननिर्वाचित प्रधानमन्त्री विश्वेसरप्रसाद कोइराला सन् १९६० के १८ मार्च कोचीन भ्रमण के लिये गये थे । उस समय वहां के अध्यक्ष माओ था । वहां अध्यक्ष माओ ने नेपाल के प्रधानमन्त्री विश्वेसरप्रसाद कोइराला से सगरमाथा शिखर के सार्वभौमिकता के सम्बन्ध में चर्चा किया । उन्होंने कोइराला समक्ष प्रस्ताव रखा कि सगरमाथा का एभरेष्ट नाम पश्चिम ने दिया है जो हमारी मित्रता के लिये उपयुक्त नहीं है । इसका नाम दो देश के मित्रता का प्रतीक चीन–नेपाल मैत्रीशिखर देते हैं ।

 

पर उस समय उनके प्रस्ताव के अनुसार यह नाम स्थापित नहीं हो पाया । परन्तु हाल में ही चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग नेपाल भ्रमण के क्रम में नेपाल–चीन बीच के दौत्य सम्बन्ध को सगरमाथा के शिखर तक ले जाने के लिये प्रतिबद्ध हुये हैं । उन्होंने कहा है कि इस मित्रता को एक अद्भुत पहचान देंगे । शी ने कहा कि इस मित्रता को सगरमाथा की चोटी तक पहुंचाने का दायित्व हम सबका है । अब प्रश्न यह उठता है कि सही में नेपाल–चीन मित्रता सगरमाथा की ऊंचाई तक पहुंच पायेगी ? ठीक है अगर पहुंच भी गया तो, अगर नेपाल को उस ऊंचाई से गिराने का प्रयास किया जाय तो नेपाल की स्थिति कैसी होगी ? इसी प्रकार के बहुत सारे प्रश्न नेपाली जनता के मन में उथल–पुथल मचा रहे हैं । इस मित्रता को लेकर सभी असमन्जस में हैं कि दो देशीय सम्बन्ध तथा आपसी सहयोग से भौतिक तथा मौद्रिक इकाई में कितना सफल और असफल होगा ।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक रंगमन्च पर चीन अभी संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद दूसरा महाशक्ति राष्ट्र है । आर्थिक विकास, सैन्य बल, अर्थतन्त्र के आकार से चीन बहुत ही विशाल और मजबूत है । और नेपाल एक छोटा सा देश । दोनों की मित्रता को संदेहपूर्ण दृष्टि से देखा जायेगा । क्योंकि कहा जाता है कि मित्रता बराबर वालों में होती है । परन्तु रष्ट्रपति शी चिनफिंग अपनी सहृदयता दिखा रहे हैं । सड़क और इन्टरनेट के सन्जाल को दोनों देशों से जोड़ने की बात की है, हिमालय के साथ जुड़े हुये सारे जिलों को विकास की ओर अग्रसर की बात की है ।

 

ऐसे विभिन्न १४ प्रयोजनों को नेपाल समक्ष प्रस्तुत करेंगे जिससे नेपाली जनता खुशहाल होगी । सत्ताधारी पक्ष राष्ट्रपति शी के व्यवहार से फूले नहीं समा रहे हैं । उनको लग रहा है कि हमने कोई बड़ा शिकार कर लिया है । अब नेपाल को समृद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता । नेपाली राजनीतिकवृत में चीन प्रति सकारात्मकता दिखाई देती है । चीन के विगत के कार्यों को अंगुली पर गिनकर बैठे हैं । कहते हैं कि सन् १९५५ अगस्त में दौत्य सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद चीनी सरकार के सहयोग से नेपाल में बहुत कुछ निर्माण हुआ । अरनिको राजमार्ग, पृथ्वी राजमार्ग, चक्रपथ, सुनकोशी जलविद्युत परियोजना, बांसबारी छालाजूता कारखाना, हेटौंडा कपडा उद्योग, हरिसिद्धी इंटा टायल कारखाना, भृकुटी कागज कारखाना, वीरेन्द्र अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन केन्द्र, सिविल हास्पिटल इत्यादि ।

 

इसी आधार पर राजनीतिक नेतृत्व से लेकर नेपाली कूटनीतिज्ञों और निजामति क्षेत्र के कुछ व्यक्तित्वों द्वारा चीन की मुक्त कंठ से प्रशंसा की जा रही है । जबकि यह सहयोग नेपाल–चीन द्विीपक्षीय दौत्य सम्बन्ध की आन्तरिक बात है । यह कोई अनुग्रह नहीं है । इसके अतिरिक्त द्विीपक्षीय सहयोग के सम्बन्ध में चर्चा करते समय चीनी सहयोग का विहंगम उल्लेख करने की शैली नेपाली समाज में व्याप्त है । दो पक्षीय सहयोग के सन्दर्भ में नेपाल ने चीन के हित में क्या सब किया इस विषय पर नेपाली समाज कभी भी प्रकाश नहीं डालेंगे । जबकि नेपाल का भी चीन के लिये सहयोग कम महत्वपूर्ण नहीं है । सन् १९६० में खम्पा विद्रोहियों जो चीनी को तिब्बत से खदेड़ कर दलाईलामा को फिर से शासक बनाना चाहता था । जो चीन के लिये खम्पा विद्रोही एक चुनौती थी । उस समय नेपाल ने अपनी सेना परिचालन कर उस विद्रोहियों का नायक वांगदे को मारकर उसपर नियन्त्रण पाया था । जो चीन के सहयोगार्थ नेपाल का एक उदाहरणीय कार्य रहा । इसी प्रकार चीन के साथ हमेशा नेपाल ने भी सहयोग किया है जिसका मूल्यांकन होना आवश्यक है ।

चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कहा कि नेपाल को हम भूपरिवेष्ठित राज्य से भूजडि़त राज्य बनाने के लिये सहयोग करेंगे । उन्होंने नेपाल की राष्ट्रपति भण्डारी के राजकीय भोज में कहा कि दोनों देशों के बीच ज्यादा से ज्यादा नाका को खोलकर हिमालय के आर पार बहुआयामिक कनेक्टिभिटी सन्जाल का निर्माण करेंगे । जिससे नेपाल भूपरिवेष्ठित से भूजडि़त राज्य बनेगा । सबसे पहले तो नेपाल के नागरिकों को चीनी राष्ट्रपति के आगमन पूर्व उनका नाम सीखने में ही कुछ समय लग गया । पता नहीं अब नेपाली नागरिक शी के वक्तव्य से कितना खुश हैं या कितनी चिन्ता में हैं ? लेकिन इस खुशी के साथ साथ चिन्ता भी कम नहीं कि नेपाल का भविष्य अब किधर जा रहा है ?

समग्र में हम यह कह सकते हैं कि नेपाली जनता देश के उज्जवल भविष्य का सपना देख रही है । उस सपना को साकार करना नेपाल के शासक के हाथ में है । नेपाल–चीन रणनीतिक साझेदारी सफल हो । पड़ोसियों के निःसर्त सहयोग के बिना चीन की परिधीय कुटनीति सफल नहीं हो सकती । नेपाल में जितना घनिष्ठ सम्बन्ध दक्षिणी पड़ोसी का है उतना उत्तरी पड़ोसी का नहीं है । दो पड़ोसियों का सम्बन्ध जितना सन्तुलन में होना चाहिये था उतना नहीं है । नेपाल से पीछे वाले देशों ने अपना विकास करने में नेपाल से कहीं आगे पहुंच चुका है । सिर्फ नेपाल ही एक ऐसा देश है जो औरों के पीछे–पीछे कूद रहा है । जो अशोभनीय है । उसका भी अपना अस्तित्व है । कहा जाता है कि अपना विकास स्वंय करना चाहिये । पड़ोसी तो पड़ोसी ही होते हैं । दुख–सुख में पड़ोसी को स्मरण करना चाहिये । वरना अपना काम तो खुद ही करना पड़ता है । शी के नेपाल भ्रमण को एक अवसर के रूप में ही लेना चाहिये । पड़ोसी राष्ट्रों के साथ अच्छा और संतुलित सम्बन्ध बनाकर हम देश का सपना साकार बना सकते हैं ।

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