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मधेश आंदोलन परिणाम विहीन क्यों हुआ ? : जय प्रकाश गुप्ता

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माओवादी आंदोलन के समापन के बाद, मधेश में शस्त्र समूहों का विकास हुआ

jp-guptaहिमालिनी, अंक- दिसंबर 2019 ।वर्तमान अवस्था में हम पाते हंै कि, मधेश एक अलगाव की स्थिति झेल रहा है । इतना बड़ा आंदोलन जो सफलता के नजÞदीक पहुंच गया था, आज हम देखते है कि, वह एक प्रकार से परिणाम विहीन है । ऐसा क्यों हुआ ? इसका कारक तत्व क्या रहा है ? इसकी एक वस्तुनिष्ठ विवेचना करना आवश्यक है । मैं दो तीन बातों में जोर देना चाहूँगा, सबसे पहली बात, पिछले समय में मधेश आंदोलन को सबसे बड़ा नुकसान पंहुचा, मधेश से अलग देश की मांग के कारण, प्रारम्भ में एक धार, शस्त्र समूह का रहा था, जो हथियार के माध्यम से क्रांति करके, स्वतंत्र मधेश देश की कल्पना करता था, चुकि उसका अभ्युदय ऐसे समय पर हुआ जबकि शस्त्र के द्वारा परिवर्तन किया जा सकता है, यह मान्यता ही समाप्त हो चुकी थी ।

पहले मधेश आंदोलन से दूसरे मधेश आंदोलन तक आते–आते मधेश आंदोलन के कई आधारभूत मांगो को स्वीकार कर लिया गया था और उन आधारभूत मांगों पर समाज ध्रुवीकृत नहीं था

 

माओवादी आंदोलन के समापन के बाद, मधेश में शस्त्र समूहों का विकास हुआ था, माओवादी आंदोलन की समाप्ति की प्रमुख वजह ये रही कि शस्त्र बल के द्वारा अपनी मांगों को पूरा करवाया जाना नामुमकिन है, माओवादी आंदोलन का पड़ाव इस बात को साबित किया था और माओवादियों की असफलता, जिन वजहों से हुई उसी वजह और उसी माध्यम को पकड़ कर मधेश का शस्त्र समूह आगे आया । आम लोगो में ये धारणा बनी कि जिस माध्यम से मधेश का शस्त्र समूह आगे बढ़ रहे हैं उससे कोई सफलता नहीं मिलेगी, इसीलिए शस्त्र आंदोलन व्यापक सहभागिता का विषय नहीं बन पाया और वह अध्याय समाप्त ही हो गया ।

शस्त्र समूह की समाप्ति के बाद, ठीक उस वक्त जब मधेश को अपनी मांग पूरा करवाने के लिए व्यापक विचार विमर्श के लिए एक मंच पर प्रस्तुत होना था, एक राष्ट्रीय मंच पर तार्किक तरीके से अपनी मांग को, न्यायोचित ठहराते हुए, मांग पूरा करवाना था, उस समय अलग राज्य, अलग देश और स्वतंत्र मधेश के मांग के साथ नए घटनाक्रम का विकास हुआ और उस विकास की वजह से पूरे देश की राजनीति मधेश के संदर्भ में धुर्वीकृत हो गई । मैं इस बात को इस रूप में जोर देना चाहता हूँ कि पहला और दूसरा मधेश आंदोलन समाप्त हो चुका था, इन दो चरणों के आंदोलनों में असंख्य उपलब्धियाँ हुई थी, सबसे पहले संविधान का पहला संशोधन हो कर मधेश के बीस (२०) जिले को मधेश के रूप में मान्यता मिली थी, वह एक बुनियाद थी, जिस बुनियाद की नींव पर पूर्व झापा से पश्चिम कैलाली–कंचनपुर तक एक मधेश बनने की आशा जगी थी, इसके बाद संघीयता की मान्यता को देश ने स्वीकार किया था, एक राष्ट्रीय सहमति बनी थी कि, अब संघीयता मजबूत बने या कमजोर लेकिन देश में संघीयता आएगी ।

समावेशीकरण की मान्यता को स्वीकार किया गया था, प्रतिनिधित्व के वैज्ञानिक प्रणाली को स्वीकार किया गया था, मैं संक्षेप में ये कहना चाहूँगा की पहले मधेश आंदोलन से दूसरे मधेश आंदोलन तक आते–आते मधेश आंदोलन के कई आधारभूत मांगो को स्वीकार कर लिया गया था और उन आधारभूत मांगों पर समाज ध्रुवीकृत नहीं था, सत्ता पक्ष भी मजबूर थे कि ये हमारी प्रतिबद्धता है और इसे पूरा करना होगा, यह मनोविज्ञान देखा जा रहा था ।

मगर जब ऐन वक्त पर इन बातों को संविधान में मसौदा करने को आगे बढेÞ थे, वहां संविधान के मसौदा में सूचीकृत करवाना था, ठीक उस समय सी.के. राउत वगैरह के द्वारा जो स्वतंत्र मधेश की बात को आगे लाया गया और स्वयं मधेश से इस बात को हवा दी गयी, बढ़ावा दिया गया, मीडिया के द्वारा इस बात को अति प्रचारित किया और स्वयं मधेश के नेताओं के द्वारा एक उदाहरण के बतौर व्यक्त किया गया ।

मधेश के अच्छे–अच्छे नेता, स्थापित नेता यह कहने लगे कि यदि हमारी बात नहीं मानोगे तो देश का विखंडन ही एक मात्र विकल्प रह जायेगा । इससे नेपाली समाज धुर्वीकृत हुआ, राज्य में गंभीर पकड़ रखने वाले जिसे हम राज्यवर्ग कहते है उसको बहुत बड़ा सगुपÞmा मिल गया की, मधेश आन्दोलन का लक्ष्य अंततः देश का विखंडन ही है । वह इस प्रकार के तमाम उदाहरणों को प्रस्तुत करके यह कहने लगे कि, आज मधेश की मान्यता एक प्रादेशिक मान्यता मात्र नहीं है, यह स्वतंत्र देश का अर्थात अखंडित नेपाल में बिखंडन का आधार रखने जैसा होगा । यह तर्क और आशंका राज्य पक्ष को और उसके जनमत को भाया ।

उस धुर्वीकरण में बहुसंख्यक लोग इस पक्ष में खड़े हो गए कि मधेश को अधिकार देने का अर्थ है, नेपाल के विभाजन को स्वीकार करना और हमलोग उसको प्रतिकार नहीं कर पाए । हमलोग एक किनारे आ गए और दूसरे किनारे जो लोग थे उनकी संख्या बड़ी थी, वह राज्य का नीति निर्माण में प्रभाव डालने वाले सभी पक्षों में पकड़ रखने वाले लोग थे, जैसे सबसे महत्वपूर्ण पक्ष संविधान सभा, उस धुर्वीकरण से संविधान सभा प्रभावित हुआ और सभी राजनैतिक दल (मधेशी दल के अलावा ) मधेश की मांग के खिलाफ में चले गये । दूसरा सेना, तीसरा पुलिस, चौथा निजामती प्रशासन, पांचवा न्याय प्रशासन, छठा उद्योगपति, सातवाँ नेपाल में गहरी दिलचस्पी रखने वाला अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, राज्य के नीति–निर्णय को प्रभावित करने वाले ये सातों निकाय या हो सकता है एक दो और गिनती कर सकते है, इस धुर्वीकरण में सब एक जगह खड़े हो गए और उनका एक ही स्वार्थ बना की देश का विखंडन ना हो या ऐसा कोई भी काम नहीं करे जिससे देश के विखंडन की नींव पड़े । तो इस धुर्वीकरण को हमलोग तोड़ नहीं पाए और बहुसंख्यक शक्तिशाली समूह हमारे खिलाफ में आ गया और हम जो विजय का दस्तावेजÞ लिख रहे थे, जहां हम एक सफल परिणाम को संविधान में अंकित करने की दिशा में बढेÞ थे, प्रतिरक्षात्मक हो गए और हम उस समय यह कहने लगे की प्राप्त उपलब्धियों का संरक्षण ही आज का कार्यभार है । जहां हम विजयी होकर अपने अनुकूल संविधान लिखवाने में सामर्थ्यवान हुए थे, अचानक हम इतने पीछे आ गए की, जो छोटी–मोटी उपलब्धियाँ है, उसको संस्थागत करने के लिए अथवा उसकी सुरक्षा करने के लिए समझौता करना होगा, ऐसे प्रतिरक्षात्मक स्थिति में आ गए ।

आज सी.के. राउत वगैरह राजनीतिक पार्टी बना करके और इसी वर्तमान यथास्थिति में निर्वाचन में सहभागी हुए, मगर भावी समय इसका मूल्याङ्कन करेगा की मधेश जो दुष्प्रभाव झेल रहा है उसके कारक तत्व ये लोग हैं । दूसरी बात, पहले संविधान सभा से मधेश के लोग अपने को शातिर चुनाववादी पार्टी और नेता के रूप में प्रस्तुत किया, पहला संविधान सभा मधेश के पार्टी और मधेश के नेतागण जनाधार का विस्तार को सर्वाधिक महत्व का विषय माना अर्थात निर्वाचन के आधार से अपने जनाधार को अटूट कैसे रखे, उसका निरंतर विश्वास कैसे हो, इस रास्ते पर मधेश की पार्टी आगे बढ़ गयी, मैं इसे दूसरा भीमकाय त्रुटि मानता हूँ, इस वजह से मधेश का जनाधार बढ़ाने के लिए मधेशी पार्टियों में बढ़–चढ़ कर जातिवाद को बढ़ावा दिया, आज मुझे यह लिखते हुए रत्ती भर भी संकोच नहीं हो रहा है, कि पहला संविधान सभा का निर्वाचन, जो की निर्वाचन के रूप में सदभावना पृष्ठभूमि को यदि अपवाद मानते है तो सभी के लिए नया निर्वाचन था, पहले निर्वाचन से ही मधेश में मधेशी पार्टियों ने जातिगत आधार का निर्माण किया, उपेंद्र जी कुछ जाति बिशेषों का समीकरण बना करके और अपने को निर्वाचन के राजनीति में सदैव दिग्विजयी बनाने की सोच बनाए, उसके प्रति उत्तर में महंथ जी राजेंद्र जी ने भी दूसरा जातिगत जनाधार ढूँढना शुरू किया, परिणामतः इस दोनों जातीय जनाधार से थारू लोग सहमत नहीं हो सके, दलित वर्ग सहमत नहीं हो सके और आज हम पाते हैं कि, मधेश जातिवादी राजनीति से पूर्णरूप से विभाजित है और मधेश के नामी–गिरामी पार्टी, जातीय आधार पर अपने को संगठित कर रहा है, यह दूसरी सबसे बड़ी कमजÞोरी रही है ।

तीसरा, मधेश में अन्तरसमुदायिक अन्तक्रिया नहीं हो सका, जिसका एक ठोस आधार, सभी मधेश का जितना भी सामुदायिक गुच्छा (क्लस्टर) है, उसका राजनीतिक मसला है,उसको एक जगह लाने का प्रयास नहीं किया, मधेश ठीक उसी रास्ते पर चल पड़ा जैसा की कांग्रेस और एमाले कहते थे,की ‘आइए, आप अलग से मधेश की राजनीति क्यों करते है, यह बड़ी पार्टी है, पुरानी पार्टी है,आप इसी में आइए और हम आपके मसला को देखेंगे, आपके सवाल को हम आगे लाएंगे‘ जैसा सात साल(०७) से त्रिसठ साल (०६३) तक कांग्रेस किया, जैसा लम्बे समय तक एमाले ने किया, हमारी भी भूमिका भी ठीक वैसी ही हो गई । हम दलित,थारू और मुसलमानों को यह कहने लगे कि यही फोरम, यही सदभावना,अथवा यही तमलोपा, वह पार्टी है जो आपके मसलों को समाधान करेगा । हम समाधान प्रस्तुत करने लगे, हम खुद–ब–खुद अपने तरफ से उनको समाधान दिखलाने लगे, बशर्ते हमे यह करना चाहिए था कि, उनके साथ बैठकर एक भागीदारी के आधार पर राजनीतिक एजेंडा को तय करते । हम लोग यह नहीं किए, इससे एक नया धुर्वीकरण मधेश में हुआ, जिसके कई पक्ष थे, नेपाल के तेरह प्रतिशत ( १३५) दलितों में जहां तकरीबन नौ प्रतिशत ( ९५) मधेशी दलित है, वो मधेशी पार्टी से दूर चले गये, थारू जो एक सामुदायिक रूप से मधेश का सबसे सशक्त समुदाय माना जाता है, उसके साथ मधेशी पार्टियों की उठ–बैठ या भागीदारी नहीं हो सकी और मुसलमान भी डरे हुए, सहमते हुए, अलग तरीके से समाधान का खोज किए, इसका सबसे बड़ा लाभ राज्य पक्ष ने उठाया और राज्य पक्ष ने मधेश के नाम से जो गुच्छा (क्लस्टर) बन रहा था, मधेश के नाम से जो भावना बनती उसमे बिखंडन का अवसर दिया । उसके बाद हम देखते हैं मधेश के नाम पर एक बड़ा समुदाय बनना चाहिए था, बड़ा पक्ष बनना चाहिए था, वहां थारू एक पक्ष के रूप में उभरा, दलित दूसरा पक्ष के रूप में उभरा और मधेश के नाम पर एक अलग पक्ष का निर्माण हुआ, तो मैं ये सबसे बड़ी कमी–त्रुटि देखता हूँ ।

इसके बाद चौथा, धुर्वीकरण राज्य का यह दृष्टिकोण की यही एक माकूल मौका है कि, हम मधेश के मांगों को सदा के लिए समाप्त कर दे, इसके लिए न्यायोचित बात, जो देश में आने वाली समस्या को देखकर, उसका अनुमान करके, जो समाधान करना चाहिए था, उससे वह पीछे हट गया और वह अपने शर्तों पर मधेश को सहमत करने की दिशा में आगे आया और अंतिम ये कि संविधान समय पर नहीं बन पाया और पहला संविधान सभा की असफलता और दूसरे संविधान सभा का निर्वाचन इसमे जो दूरी है, इसको मैं पहले के कमी कमजÞोरी का जो बूंदा है उसमें जोड़ता हूँ कि, इससे जनाधार में बहुत बड़ा परिवर्तन आया और दूसरे संविधान सभा में पहुंचते–पहुंचते मधेश की शक्ति क्षय हो गयी । मधेश कमजोर रूप में प्रस्तुत हुआ, हम पहले वाला परिणाम हासिल नहीं कर सके, फलतः आम लोगों में यह धारणा बनी कि मधेश उस शक्ति का सुस्थिर स्थिति में नहीं है, मधेश क्षयकरण के अवस्था में है अर्थात मधेश वह शक्ति है जिसमे निरंतर क्षय होता जा रहा है और आने वाले समय में ये पूरे क्षयकरण की दिशा में चला जाएगा । इस मनोविज्ञान के निर्माण से हम जिस सशक्तता के साथ अपनी बात को रख सकते थे वो नहीं रख सके ।

सबसे अंतिम में मैं कुछ अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के बारे में कहना चाहूँगा, जिसमें सबसे बड़ी भूमिका भारत की थी, भारत प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मधेश आंदोलन के मांगों के साथ अपने को खड़ा दिखाता रहा, वह निर्णायक नहीं अपितु एक सशक्त पक्ष था हमारे पीठ पर, जिससे हम शक्ति लेते थे और उम्मीद करते थे कि भारत का कूटनीतिक प्रयास हमारी मांगों को पूरा कराने की दिशा में कामयाब रहेगा, सहयोगी रहेगा, मगर दूसरा संविधान आते–आते और उसके बाद भी, हम क्या पाते हैं कि, भारत का नेपाल में जो वर्षो से उसका एजेंडा रहा है, उसका आर्थिक,व्यापारिक, सुरक्षा, सामरिक एजेंडा को पूरा करवाने के लिए भारत राज्य के साथ जैसा की उसका परंपरागत ताल्लुक रहता आया है, उसी दिशा में भारत आगे बढ़ गया, यह राज्य को सबसे बड़ा सुविधाजनक मौका मिल गया और संविधान निर्माण से पहले तक यह देखे कि भारत की भूमिका मधेशियो के लिए मात्र इस तरह रही कि ‘रोटी का यह टुकड़ा, तुम्हारे लिए एक अभूतपूर्व वरदान है, इसे ग्रहण करके तुम संतुष्ट रहो’,मधेश आंदोलन की जितनी भी आधारभूत मांग थी जिसमें की भारत सहमत रहा था या उसमें भारत की सहानुभूति दिखाई देती थी उससे भारत मुकर गया, वह राज्य के साथ अपनी बेहतर समझदारी निर्माण के दिशा में मधेश की मांगों को छोड़ दिया और राज्य के साथ हाथ मिलाना शुरू किया, तो राज्य को ये तय करने का मौका मिला कि आज भारत भी मधेश के साथ नहीं है । दूसरा संविधान सभा संविधान के आधारभूत विषयों का निष्कर्ष निकालते समय तक मधेश बहुत कमजोर हो चुका था, तो भारत की ये भूमिका भी हमारे लिए बहुत उल्लेखनीय रहा, आज भी हम पाते है की मध्य का कुछ अपवाद छोड़कर, नाकाबंदी के समय वगैरह को छोड़कर, भारत का अपना जो स्वार्थ है नेपाल के संदर्भ में उसको पूरा करवाने में लगा है, नाकाबंदी के बारे में भी मधेशियो में बहुत बड़ा भ्रम है कि, नाकाबंदी के समय भारत ने जो मुद्दा उठाया था, वह मुद्दा संविधान में हमारी उन मांगों को व्यवस्थित कराने के लिए उठाया था, जिसके लिए हम वर्षो से लड़ते आ रहे है, मेरा मानना है कि वह बात नहीं थी, संविधान जारी होते वकÞ्त भारत ने जिस मुद्दा को उठाया और जिसको नाकाबंदी का आधार कहा जाता है, वो हकीकÞत नहीं थी, उस मुद्दा के नाम पर भारत अपने कई एजेंडा को नेपाल के द्वारा सहमत करना चाहता था और मुझे लगता है कि भारत को उसमे सफलता मिली भी, भारत को जो हासिल करना था भारत ने हासिल किया । नाकाबंदी की कुछ बदनामी और दोषारोपण भारत पर लगा, मगर आज भारत नेपाल के केंद्रीय सत्ता के साथ बेहतर सम्बन्ध के रूप में, बेहतर सहयोग और सरोकार के साथ आगे बढ़ रहा है । और मधेश इन सभी कारणों और अपनी कमजोर नीतियों की वजह से उसके परिणाम को भुगत रहा है ।

अतः मैं इस प्रकार से दोहराता हूं की पहली बात तो बहुसंख्यक समुदाय मधेश से जो विखंडन का मांग उठा, उसके कारण से ध्रुवीकृत हो गया और वह हमे किसी भी सूरत में स्थापित होने देना नहीं चाहा, दूसरा कारण की मधेश के राजनीतिक पार्टी अविच्छिन्न विजय के लिए, सदा–सर्वदा विजय के लिए एक शक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए, जातिवादी राजनीति को बढ़ावा दिया, तीसरे, मधेश का अन्तरसमुदायिक अन्तरसंवाद से स्वरूप बनता, मधेश उस दिशा में आगे नहीं बढ़ सका । चौथा, अंतर्राष्ट्रीय अदाकारों भूमिका और पांचवा, निर्वाचन के माध्यम से दूसरे संविधान तक आते–आते मधेशी शक्तियों का क्षय होना । इन कारक तत्त्वों के आधार पर हम ये विश्लेषण करते है की, आज मधेश का जो भी हश्र है या जिस हालत में मधेश जी रहा है, उनका प्रमुख सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष यह है और मुझे लगता है की इसका समुचित विवेचना आज के लिए इस हेतु आवश्यक है कि कल यदि हम कोई रास्ता करेंगे अथवा फिर कोई मार्ग का निर्माण करते है तो पहले इसका विवेचना करना हमारे लिए आवश्यक है तो इस विषय पर मधेश में गंभीर छलफल हो, फिर उसके बाद ही हम आगे बढ़ सकते है ।

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