क्यों धराशायी होते हैं मधेश के उद्योग –
कैलास दास:जनकपुर। कृषि और कलकारखाना का धनी मधेश आज धराशायी बनता जा रहा है। मधेश में उत्पादित अनाज पर सम्पर्ूण्ा नेपाली निर्भर थे। यहाँ का कलकारखानों से उत्पादित वस्तुएं पूरे देश में जाती थी। मधेशी भी गर्व किया करते थे कि हमारे उत्पादन से सम्पर्ूण्ा नेपाली का जीवन-यापन होता है। लेकिन आज बहुत ही अफसोस हो रहा है कि मधेशी भी अब पर्ूण्ा रुप से भारतीय बस्तुओं पर निर्भर रहता है। इसके लिए सरकार ही दोषी है।

नेपाल कृषि प्रधान देश है। और ७० प्रतिशत से ज्यादा लोग कृषि पर निर्भर हैं। यहाँ के लोग खेती के कामकाज सम्पन्न होने वाद ही उद्योग व्यवसाय में लगते हैं। अर्थात् आम जनता के लिए प्रथम खेती और दूसरे नम्वर पर उद्योगधन्धा है। लेकिन अभी देखा जाए तो खेती के लिए न सिंचाई की व्यवस्था है और न ही उस में पडने वाले मल खाद की। जहाँ तक कलकारखाना एवं संस्थानों की बात है, वे तो पर्ूण्ा रुप से बन्द ही हो चुके हैं।
कुछ ही दिन पहले जनकपुर के कृषि सामग्री संस्थान में करीब एक हजार से ज्यादा किसान वीज और मल खाद के लिए एक-दो दिन ही नहीं पाँच-पाँच दिन तक लाइन में लगे रहे। इतना ही नहीं जब किसानों ने मल खाद के लिए हो हल्ला किया तो पुलिस ने उन पर लाठी भी बरर्साई। इस पर भी उन्हें खाली हाथ ही लौटना पडÞा। यह स्थिति सिर्फमधेश की नहीं पूरे नेपाल की है। किसान मल खाद एवं वीज के लिए वर्षों से आन्दोलनरत है लेकिन सरकार ने आश्वासन के सिवाय समय पर कुछ उपलब्ध नहीं कराया है।
नेपाल के रेल्वे कम्पनी लिमिटेड में आए दिन दर्ुघटना होती रहती है। नेपाली जनता की आवश्यकता और नेपाल के धरोहर के रुप में रहे इस रेल्वे को ७७ वर्षहोने वावजूद भी किसी ने इस के सुधार की ओर ध्यान नहीं दिया।
वैसे नेपाल सरकार ने समय-समय पर र्सर्वेक्षण का नाटक किया है तो मधेशी नेताओं ने मधेश में रहे रेल्वे के प्रति पहाडÞी शासक भेदभाव कर रहा है कहकर सीधी-साधी नेपाली जनता को हमेशा गुमराह किया है। लेकिन सचाई ये है कि किसी में इसे जीवित रखने की इच्छा ही नहीं। जहाँ तक राजनीतिक दलों की बात है, वे अपने कार्यकर्ता कम्पनी में ठूसने के लिए लगे रहते हैं।
किसी भी विकास के क्षेत्र में दल गत यूनियन विकास का बाधक होता है। लेकिन यहाँ देखा जाए तो सरकारी और गैर सरकारी निकाय में यूनियन गठन किया जाता है, जिस के कवच का काम राजनीतिक दल करते हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि विकास के क्षेत्र में राजनीतिक दल बाधक बन रहे हैं।
अगर हम नेपाल को विकसित देश बनाना चाहते हंै तो सबसे पहले संस्थानों वा सरकारी तथा गैर सरकारी निकाय में रहे दलगत यूनियन तन्त्र को खत्म करना ही होगा। जनता चाहती है स्वच्छ राजनीति और विकास। रेल्वे को धराशायी करने में यूनियन तन्त्र भी कम दोषी नहीं है।
जुद्ध शम्शेर काल में वि.स. १९९३ में ब्रिटिस सरकार ने कोयले से चलने वाला ल्।व्।व्।च्। ‘जनकपुर रेल्वे’ जो वाद में ‘नेपाल रेल्वे’ कर दिया गया, नेपाल सरकार को सहयोग में दिया था। उस समय भारत के जयनगर से विजलपुरा तक लकडी ढुवानी होती थी। लेकिन जैसे-जैसे जंगल खत्म हुए, रेल लकडÞी के बदले यातायात के लिए प्रयोग में आने लगी।
फिलहाल भारत सरकार ने नेपाल रेल्वे ब्रोडगेज में लाकर व्यवस्थित करने के लिए बजेट की भी व्यवस्था की है। लेकिन जिस प्रकार रेल्वे के विस्तार को गम्भीरता से लेना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। नेपाल ब्रोडगेज का कार्यालय प्रमुख टेकबहादुर बोहरा कहते हैं- भारत सरकार तीन वर्षमें रेल्वे को ब्रोडगेज बनाकर नेपाल सरकार को हस्तान्तरण कर देगी। लेकिन नेपाल सरकार कुछ दिन तो जमीन के मुआब्जे विवाद में फंसी रही। उसके बाद धनुषा, महोत्तरी और र्सलाही के लिए नेपाल सरकार ने ४१ करोडÞ रुपैया २०६८ श्रावण में निकासा किया, जिस में से धनुषा में ५ करोडÞ और महोत्तरी में ३ करोड रुपैया मात्र वितरण हुआ है। जमीन के मुआब्जे लेने वाले व्यक्ति विदेश गए हुए हैं। इसी कारण रेल्वे का काम तीव्र गति में नहीं हो पा रहा है।
जनकपुर भन्सार क नायब सुब्बा राम गुलाब कहते है कि नेपाल सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व मधेश से जाता है लेकिन यहाँ का उद्योग व्यवासाय, यातायात प्रति सरकार गम्भीर नहीं होने के कारण राजस्व में कमी आई है। रेल्वे की अवस्था दिन प्रति दिन नाजुक होते जा रही है। प्रत्येक दिन दर्ुघटना में पडÞने के कारण व्यापारी रेल से सामान ढुवानी से डरते है। यही कारण है पहले की अपेक्षा अभी रल्वे से बहुत ही कम राजस्व उठता है।
नेपाल का सबसे बडा जनकपुर चुरोट कारखाना और सवारी साधन में नेपाल रेल्वे लि. रहा है। किसी समय चुरोट -सिगरेट) कारखाना की आम्दानी तो बैंक भी रखने से कतराती थी। लेकिन मधेश में रहे संस्थान एवं कलकारखाना प्रति दूरगामी सोच नहीं होने से और राजनीतिक युनियन तन्त्र के साथ ही राजनीतिक दल के दवाव के कारण विगत दो वर्षसे जनकपुर चुरोट कारखाना बन्द है।
अधिवक्ता लक्ष्मण पौडेल के अनुसार वास्तव में कहा जाए तो मधेश शाही काल में राजा द्वारा शोषित था तो प्रजातन्त्र में नेताओं द्वारा जनता को भूल-भूलैया में रखा गया। वो आगे कहते है- शाहीकाल में मधेश में रहे कलकारखाना, संस्थान की आमदनी राज परिवार में जाया करती थी तो प्रजातन्त्र में खसवादी शासको के व्यक्तित्व विकास में और लोकतन्त्र में मधेशी नेताओं की उदासीनता ने बची खुची सम्पतिको मटिया मेट कर के छोडÞ दी है।
लोकतन्त्र में स्थानीय नेताओ द्वारा इस क्षेत्र के विकास की ओर उदासीन रहना, एक दूसरे के प्रति दोषारोपण करना, विकास का बाधक है। कसी भी क्षेत्र के विकास के लिए स्थानीय जनता और राजनीतिकर्मियों की जागरुकता बहुत मायने रखती है। लेकिन राजनीतिकर्मी दलीय स्वार्थपर्ूर्ति में लिप्त हैं और जनता उदासीन है। जिस कारण क्षेत्रीय विकास प्रभावित हुआ है। इसी के फलस्वरुप इस क्षेत्र की जनता दिन-प्रति-दिन विदेश से आए रेमिटान्स पर निर्भर होती जा रही है।

