Mon. May 25th, 2020

प्रदेश न.-2 के प्रेरक पर्यटकीय क्षेत्र ‘कारिख स्थान’ : अजयकुमार झा

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हिमालिनी  अंक  जनवरी 2020 आज हम नेपाल के दो नंबर प्रदेश के महोत्तरी जिला के उस विशेष स्थान के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं, जिसके बारे में नेपाल के महोत्तरी, धनुषा, सर्लाही, सप्तरी के साथ ही भारत के बिहार राज्य के सभी उत्तरी जिला के लोग श्रद्धा के साथ जानकारी रखते हैं । परन्तु दुर्भाग्य यह है कि इसे सरकार तथा बौद्धिक वर्गों ने अपने ध्यान और कलम के लायक नहीं समझा । और यही कारण है कि कड़ोरों जनमानस की आस्था का केंद्र रहते हुए भी यह विश्व पटल पर प्रकाशित नहीं हो पा रहा है ।

जी हां, ये वही स्थान है जिसे हम कारिख स्थान (पडौल) के नाम से जानते हैं । जनकपुर से ज्ञद्द कि.मी. पश्चिम और जलेश्वर से ज्ञज्ञ कि.मी. उत्तर तथा गौशाला से ज्ञज्ञ कि.मी.पूरव की ओर अवस्थित यह पवित्र स्थान बलबा नगरपालिका वार्ड नम्बर घ में स्थित है । यहाँ वर्ष में ठड दिन भव्य उत्सव, मेला के साथ साथ बलि प्रदान होता है । प्रत्येक सोमबार और शुक्रबार को यहाँ पूजा तथा उत्सव का आयोजन होता है । जिसमे कम–से–कम घण्ण्( डण्ण् तक खस्सियों को चढ़ाया जाता है ।

इसमे भारत के मुजफ्रपुर, दरभंगा, सिवहर के आसपास तक के श्रद्धालु अपनी पूरी साजबाज तथा जमात के साथ सहभागी होते हैं । प्रत्येक महिना के सोमबार और शुक्रबार को भारत के इस इलाके से जुड़े भिट्ठामोड़, मटिहानी, सुरसंड, परिहार लगायत अन्य व्यवहारिक नाकाओं से हजारों की संख्या में टेम्पू, मैजिक, ट्रेक्टर, मोटरसाइकल, कार आदि सवारी साधनों से जहाँ सरकार को लाखों का कर प्राप्त होता है वहीं इस इलाके के व्यापारियों के लिए आर्थिक लाभ के लिए सुनहरा अवसर भी मिलता है ।

परन्तु नेपाल सरकार की दृष्टि से योजनाबद्ध रूप मे अंधकार में डाला गया यह ऐतिहासिक धार्मिक पर्यटकीय स्थल प्रदेश सरकार की ओर से भी पर्यटकीय दृष्टिकोण से उदासीनता के कारण सबकुछ परम्परागत शैली में ही चलता दिख रहा है । कारिख स्थान क्षेत्र का भौतिक स्वरूप, पोखर की मरम्मत संभार तथा आधुनिकीकरण, सड़क व्यवस्थापन तथा धर्मशाला निर्माण, मनोहारी बगीचा के व्यवस्थित होटल और बच्चों के लिए आधुनिक खेल सामग्री–सम्पन्न क्रीडास्थल का अविलम्ब निर्माण इस क्षेत्र के लिए परमावश्यक है ।

दैवीय आस्था और भरोसा पर इस क्षेत्र की गरिमा तथा कारिख बाबा की महिमा को अधिक प्रसारित और महिमा मंडित नहीं किया जा सकता है । कारिख बाबा के प्रभाव को विस्तारित कर अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप मे इसे स्थापना करने लिए हमें संकल्पित होना ही पड़ेगा । इसके लिए जिला वासी के साथ साथ ग्रामीण जनता और बलबा नगरपालिका के आधिकारिक व्यक्तियों का प्रमुख कर्तव्य दिखाई देता है ।
हम बड़ी ही सहजता के साथ इसको आधुनिक स्वरूप प्रदान कर इस क्षेत्र के नागरिको के लिए दूरगामी आर्थिक आय का श्रोत और भौतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण द्वार बना सकते हैं ।

विद्वानों का कहना है –
हम अपना लिखते भाग्य स्वयं, पर समय बीत जब जाता है ।
खुद का ही लिखा न पढ़ पाते, अक्षर धुंधला पर जाता है । ।
इसलिए नियति को मत तानो, अपना हस्ताक्षर पहचानों ।
दायित्वम शरणम गच्छामि, भज ओशो शरणम गच्छामि । ।

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अतः याद रहे, हम महोत्तरी बासी अपना भाग्य खुद ही लिखेंगे । आज नेपाल के ठठ जिला में हम जीवन के सभी क्षेत्र में सबसे नीचे के पायदान पर हैं । शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थ, उत्पादन, कृषि, पर्यटन, व्यवसाय, नौकरी, रोजगार और राजनीति लगायत राज्य के सभी अंग हमारे लिए सपना होते जा रहे हैं । योजनाबद्ध रूप में हमें नीचे गिराया जा रहा है, और हम है कि शुतुरमुर्ग की तरह स्वनिर्मित अन्धकार को प्रकाशपुंज मानकर दीन हीनता को हृदयंगम कर के जीते जा रहे हैं । इस प्रकार हम धीरे धीरे नष्ट कर दिए जाएंगे । अतः जागरण और सक्रियता आवश्यक है ।

कितना सौभाग्य है हमारा कि स्वतः स्फूर्त रूप में लोग जिस प्रकार दुर्गा, लक्ष्मी, महादेव, हनुमान और विष्णु जैसे देवताओं को हिंदू पूजते हैं । उसी प्रकार अत्यधिक लोगों द्वारा पूजे जाने वाले कुल देवता और ग्राम देवता के रूप मे कारिख बाबा, गोरैया बाबा, बंदी माय, सोखा बाबा, सलहेस, दीना भदरी, ब्रह्म बाबा, गिहल, विषहरा, काली, बामती आदि हैं, जिन्हें पूजने वालों की संख्या करोड़ों में है । रोचक तथ्य यह है कि अगर आपका नाता ग्रामीण जनजीवन से नहीं है तो इनमें से ज्यादातर देवी–देवताओं के आपने नाम तक नहीं सुने होंगे । इंडियन कॉउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च के लिए उत्तर बिहार के ग्रामदेवता एवं कुलदेवता विषय पर शोध करने वाले बिहार सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के कंसल्टेंट प्रदीपकांत चौधरी के अनुसार (गोरैया बाबा और कारिख बाबा) जिनकी पूजा गोपालगंज से लेकर वैशाली तथ नेपाल भारत के मिथिला प्रदेश तक के इलाके में की जाती है उनको पूजने वाले लोग करोड़ में हैं । यूपी तक में लोग इनकी आराधना करते हैं । भारत बिहार के लगभग ज्ञद्धण् गांवों में सर्वेक्षण के दौरान टछ फीसदी लोगों ने इन्हें अपना कुलदेवता बताया ।

 

जबकि शहरों में काफी लोगों ने इनका नाम तक नहीं सुना होगा, गांवों में भी अगड़ी जाति के कई लोग इन नाम से अनिभज्ञ हों तो कोई हैरत की बात नहीं । पहले इनकी पूजा पासवान जाति के लोग करते थे, अब सभी पिछड़ी और दलित जातियों में इनकी पूजा होती है । इनके साथ बन्नी माई या बंदी माई की भी पूजा बड़ी संख्या में लोग करते हैं । गोरैया बाबा तथा कारिख बाबा को रक्षक माना जाता है और बन्नी या बंदी माई कुलदेवी होती हैं । प्रदीपकांत कहते हैं, इसी तरह सोखा बाबा और कारिख धर्मराज के उपासक उत्तर बिहार और नेपाल में बड़ी संख्या में हैं । बरह्म बाबा या डिहबार बाबा का स्थान तो तकरीबन हर गांव में मिल जाता है ।

 

गिहल चारागाह के देवता हैं और यादव समुदाय के लोग इनके उपासक हैं, राजा सल्हेस और दीना भदरी का नाम तो अपेक्षाकृत पापुलर है और दलित जातियों में इनका भरपूर सम्मान है । आज भी लोग इनके जीवनी पर आधारित गीति नाटक खेलते हैं । खासकर कारिख बाबा से सम्बंधित अधिकांश तथ्य गीति काव्य के रूप मे जनबोली में हर गाँव टोल में मिल जाएंगे । कारिख बाबा के जीवनी से सम्बंधित बहुत सारी बातें आज भी अनुसंधान का ही विषय है । वीर, विरह और करुण रस से ओतप्रोत इस लोक गीति काव्य वास्तव में विश्व में अपना अलग और सम्मानित स्थान रखता है । गाँव से निकलकर शहर तथा विदेशों में रहने के कारण लोग इसे गँवार और पिछड़ेपन की निशानी के डर से जानबूझकर भुलाने में अपनी प्रशंसा और आधुनिकता समझने लगे हैं । शायद यही कारण है कि लेखक, खोजी–पत्रकार और साहित्यकारों ने भी अपने–आप को इससे दूरी बनाने में ही बड़प्पन समझ रहे हैं । अन्यथा आज इन नामों से भी गूगल पर अनेकों लेख तथा तथ्यांक उपलब्ध होते ।
बहुत दिनों के खोजबीन के पश्चात महोत्तरी जिला के महोतरी गाँव पालिका वार्ड नंबर घ मडैइ के श्री राम एकवाल झा (मेरे पिता) जी से जानकारी मिली कि डाम्ही के एक दिव्य संत जो ‘महाराजा’ नाम से विख्यात हैं, उनसे इस विषय पर चर्चा करने पर स्थानीय सभी देवताओं के बारे में बृहत जानकारी मिल सकती है । इसी प्रयास में मैं उनसे मिलने जलेश्वर से ड की.मी. उत्तर डाम्ही पहुंचा । वहाँ के समाज सेवी श्री उपेन्द्र जी से उनके आवास स्थान का पता मिला । उनसे मिलने के वाद मेरे प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने बताया कि धर्मावती और भानुवती नामक दो साध्वी के यहाँ स्वयं भगवान सूर्य ने पंडित का वेश धारण कर महादेव पूजन के अनुष्ठान के माध्यम से एक दिव्य पुरुष का अवतरण हेतु यज्ञ करवाया था । जिस यज्ञ के हवन कुण्ड से ज्योतिस्वरूप एक पुरुष प्रकट हुआ । उस ज्योतिर्मय पुरुष का नाम स्वयं ज्योतिर्पुंज दीनानाथ भगवान सूर्य ने ‘ ज्योतिष’ रखा । ये बहुत ही प्रचंड और प्रतापी थे । बाघ और बैल को एक साथ हल में जोतते थे । आजीवन कुँवारा रहने का संकल्प था । लेकिन सूर्य देव ने सृष्टि व्यवस्थापन तथा मुगलों के क्रूर शासन तंत्र से परेशान नागरिक को मुक्ति दिलाने हेतु इस दिव्य पुरुष को अग्रसर करना चाहते थे । इस हेतु उन्होंने आम के पेड़ से एक अति रूप लावन्य कन्या को जन्म दिया, जिसे देखते हीं ज्योतिषी मोहित हो वैवाहिक बंधन में बंध गए । परन्तु इन्हें सूर्यदेव की आज्ञा उल्लंघन के कारण शापित होना पड़ा । इनकी पत्नी को सूर्यदेव तथा माँ गंगा के आशीष से एक दिव्य वालक का जन्म हुआ । जिसका नाम कारिख रखा गया ।

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कारिख जन्म से ही तेजस्वी और दूरदर्शी थे । मुगलों और तांत्रिको को शमन करने के लिए ही उनका जन्म हुआ था । उनके जन्म के साथ हीं सारे तांत्रिक, योगिनी और मलेक्ष्यों में हड़कंप मच गया । सब ओर से इस बालक कारिख पर आक्रमण होने लगा । मुगलों को शांत करने के लिए उन्होंने मक्का जाकर मीरा से मित्रता किया, फिर मानवता के रक्षा हेतु मीरा को यहाँ लेकर आए । मीरा ने खुद अपने ही धर्म के लोगों के विरुद्ध लड़ने से पहले इनकार किया था । परन्तु कारिख के समझाने तथा मीरा के उनके जन्म का रहस्य बतलाने पर वो कारिख के साथ यहाँ आने के लिए तैयार हो गए । मीरा के आने के बाद मुगलों के तांत्रिको के शक्ति का ह्रास होने लगा । और तंत्र मन्त्र के बलपर जनता के साथ किए जा रहे अत्याचार को रोका गया । गो हत्या बंद की गई । और एक सामाजिक मेलमिलाप का अद्भुत रसायन का निर्माण हुआ । यह रसायन आज भी पडौल के कारिख क्षेत्र में देखा जा सकता है ।
ज्ञातव्य हो ! पडौल कारिख बाबा का यह क्षेत्र मिथिला बिहारी परिक्रमा से भी संबधित है । पडौल वही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थान है । मुगÞल काल के इतिहास तथा बर्बरता की पीड़ा अपने भीतर संजोए यह क्षेत्र आज भी हमें सतर्कता अपनाने के लिए प्रेरित करती है । समयानुकूल क्षमता वृद्धि कर अपनी धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए तत्परता दिखाना हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए । यहाँ के युवाओं के लिए आधुनिक शिक्षा और अनेकों गुणों से युक्त होना इनके संस्कार में होना चाहिए । सारी सिद्धियाँ, तंत्र और मन्त्र शक्ति ये सभी बिना तपस्या और ज्ञान के संभव नहीं होते, इसबात का भी ख्याल होना चाहिए ।

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पहले जंगलों से घिरा हुआ यह क्षेत्र ऋषि महर्षियों की तपोभूमि थी । आश्रय स्थल था । वैदिक काल से ही यह क्षेत्र विश्व में अपना उत्कृष्ट स्थान रखता आया है । निमि ऋषि के पार्थिव शरीर को ऋषियों द्वारा मंथन कर एक नए बालक (मिथिल) को जन्म देने का अद्वितीय कार्य इसी पावन भूमिपर पहली बार हुआ था । इसी मंथन प्रक्रिया से जन्मे बालक के नाम पर इस क्षेत्र का नाम मिथिला पड़ा । यहाँ पर राजर्षि जनक के काल में विश्व के विद्वानों की सभा लगती थी । अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, श्वेतकेतु, भार्गव, मांडव्य, गार्गी, मैत्रेयी, शाण्डिल्य, मंडन मिश्र, वाचस्पति मिश्र, लखिमा मंडन आदि दिव्य पुरुषों की कर्म स्थली यह जनकपुर क्षेत्र पर्यटकों के लिए वास्तव में यथार्थ ज्ञान तथा वोध के लिए परमावश्यक है ।
आज कारिख बाबा के नामपर चुटकी में प्राविधिक संस्थाओं की स्थापना की जा सकती है क्योंकि कारिख बाबा के करोड़ो भक्त हैं । उन भक्तो का छोटा सा सहयोग भी यहाँ विकास की आँधी को लाने में समर्थ है । आवश्यकता है तो सिर्फ और सिर्फ एक सामूहिक ईमानदार संगठन की, एक विश्वसनीयता और लगनशीलता की, प्रबुद्धों द्वारा सामूहिक संरक्षण का, सरकार और समाज के द्वारा योजनाबद्ध सहयोग और दिशानिर्देशन का ।

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