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नेपाल भारत वाक युद्ध : डा अशोक महासेठ

 

डा अशोक महासेठ, ठिमी,काठमांडू | यह वाक् युद्ध बहुत पुराना है । इन दिनो इस द्वंद की आवाज सडक सदन तथा पूरे देश मे व्यापक रुप से देखा जा रहा है, जब कि अभी पूरा विश्व कोरोना भाइरस् की महामारी से जूझ रहा है यह भी युद्ध की तरह है । बीते साल २०१९ नोवेम्बर २ में भारत ने एक नक्सा जारी किया जो कश्मीर के ३७० धारा के समाप्त करने के बाद था जिसमे यह दिखाया गया कि लिम्पियाधुरा,कालापनी तथा लिपुलेख का भूभाग भारत के क्षेत्र में है यदपि यह विवाद २०५ बर्ष पुराना है जब नेपाल और ब्रिटिश शासक के बीच २ साल तक युद्ध चला था युद्ध के बाद सुगौली सन्धि सन् १८१६ इस्वी मे हुआ था । इस विवाद पर बहुत बार चर्चा तथा दो देशों के बीच में सरकारी स्तर पर बैठक होती आ रही है फिर भी विवाद का समाधान नहीं हो सका अब इसकी गर्मी का ताप सतह पर आ चुका है ।
अपने अपने पक्ष मे अपनी अपनी बातों को दोनो पक्ष बहुत मजबूती से रखते दिखाइ दे रहे हैं । ब्रिटिश की जो चाल रही है कि शासन सत्ता तो छोडना है परन्तु झगडा लगाकर जाना है । जिसका परिणाम भारत और पाकिस्तान के बीच में युद्ध है । यह भी ७२ साल पुराना हो चुका है, उसी तरह से इस विवाद का बीज उसने नेपाल और भारत के बीच रोप दिया जो आज सतह पर आ चुका है । भारत स्वतन्त्र होने से पहले ब्रिटिश सरकार ने सन १८५६ मे सर्भे अफ ईन्डिया ने एक नक्सा निकाला जिसमे विवादित भू भाग भारत के क्षेत्र में दिखाया गया है जबकि सुगौली सन्धि के मर्म या शब्दो के अर्थ से वह भूभाग नेपाल का है, विवाद यहीं से शुरु है । वह झगडा लगाने में सफल रहा और हम दो मित्र राष्ट्र झगड रहे है अर्थात कहा जाता है कि शिकारी दाना डालेगा चिडिंया को उस जाल मे नहीं फंसना चाहिए फिर भी दाना के लोभ मे चिडिया फसती है और पकडी जात है अन्त में मारी जाती है । वही हाल अभी यहाँ दो मित्र राष्ट्र के बीच में चल रहा है । अब यह दो राष्ट्र के बीच में कुछ अराजक तत्व अंतरराष्ट्रीयकरण करने पर लगा हुआ है। जिससे यह और जटिल हो जाएगा ।
अब इसे महाभारत महायुद्द के इतिहास की दृष्टि से देखे, श्री कृष्ण ने अन्त में ५ गाँव मांगा पाण्डव की ओर से शान्ति के पथ पर जाने के लिए तो धृतराष्ट्र तथा दुर्योधन ने कहाँ कि एक इन्च जमीन भी नहीं देंगे परिणाम रहा महायुद्द । तो क्या अभी भी कोइ इस द्वंद मे धृतराष्ट्र वा दुर्योधन तो नही है ?
महाभारत का युद्द धर्म और अधर्म के बीच हुआ था । यहाँ नेपाल के प्रधानमन्त्री भी इस धर्म के बातो को उठाया है जो भारत के चिन्ह मे लिखा हुआ है ू सत्यमेव जयतेू। अब यह देखना है कि सत्य कि राह पर कौन है विजय किसकी होती है । प्राचीन काल का इतिहास भरा पुरा है कि जमीन के भुभाग के लिए हमेशा युद्द होता रहा है और अभी भी हो रहा है, होता रहेगा ।
धर्म समय समय पर परिवर्तन होता रहता है । ब्यतिगत जीवन मे इसे वर्णाश्रम धर्म कहते हैं । राष्ट्र के स्तर पर इसे राष्ट्रीय धर्म कहते हैं और इसी धर्म के वजह से मानव के बीच भयंकर युद्द हुआ है जहाँ पर मानवता शून्य हो जाती है । एक मनुष्य दूसरा मनुष्य के खून का पिपासु हो जाता है । यह चलता आ रहा है और चलता रहेगा । इतिहास साक्षी है कि धर्म तथा राष्ट्रीयता के नाम पर जितनी खून की होली हो चुकी है उतनी प्राकृतिक बिपदा से नही हुइ है ।

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अब इसे अध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो यह पृथ्वी किसी मनुस्य के द्वारा नहीं बनायी गयी है जिसे मनुष्य अपनी सम्पति समझ रखा है । यह भगवान के द्वारा प्रगट हुआ है । यह भगवान की सम्पदा है । तो तर्क कहता है कि हम कोैन होते है इस पर विवाद खडा करने वाले, हमार अन्त हो जाएगा फिर भी यह भूभाग जहाँ का तहाँ ही रहेगा । हमरा लक्ष्य तो कुछ और ही है परन्तु हम अपने अज्ञानता के कारण इस जमीन के टुकड़ा को लेकर सर्बबिनाश कर बैठते है । इसका प्रत्यक्ष उदाहरण महाभारत में है। कौरव का सम्पूर्ण विनाश हो गया और अन्त में हस्तीनापुर राज्य भी धृतराष्ट्र को जीते जी खोना पडा तथा अन्त में खुद को बनबास की ओर निकल जाना पडा । इसमे इस परिवार का ही विनाश नही हुआ बहुत सारे यौद्धाओ, आम नागरिक और लाखों की संख्या मे सैनिकों का भी महाविनाश हुआ । इतनी बडी घटना होने के बाद क्या सभी मानव मे यह चेतना नहीं आई । आएगी भी नही । क्योंकि माया सर्व शक्तिमान है जो मनुष्य के ज्ञान को हटा कर अविधा को लाकर रख दिया उसे विक्षिप्त कर दिया जिसका परिणाम अक्सर विनाश होता है।
इस वाक युद्द ने बहुत सारे प्रश्न को भी जन्म दिया है जिसका उत्तर आने वाले समय के घटना क्रम से दिखाइ देगा, प्रश्न कुछ इस प्रकार है(

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१ क्या दो मित्र राष्ट्र के बीच में इस छोटे भूभाग के झगडा को लेकर कहीं सगरमाथा तो नही हाथ से चला जएगा ?

२ क्या कही मधेश का भुभाग तो नही हाथ से चला जाएगा ?

३ क्या तिस्रा पक्ष हाबी हो कर सैनिक का अखाडा नेपाल तो नही बन जाएगा ?

४ क्या हमारा देश अंतरराष्ट्रीय देश के राजनीति का खिलौना तो नही बन जाएगा ?

५ क्या भारत और नेपाल के बीच सीमा पर तार की जाली तो नही लग जाएगी तथा दोनो देश की जनता के लिए पासपोर्ट÷भिषा तो नही लग जाएगा ?
६ क्या नेपाल के अस्तित्व पर खतरा तो नही मंडरा रहा है ?
न जाने कितने प्रश्न उठ रहा है और उठने वाला है । गीता के श्लोक मे है संशय विनाश का कारण होता है अतः सचेत होना हम सभी नागरिक तथा सरकार की ज़िम्मेदारी है । अन्त मे होइ हैं वही जो राम रुचि राखा ।

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डा.अशोक महासेठ ‘ चिकित्सक एवं विश्लेषक

 

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