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सरे आम बीच सडक पर, लुट रही है बेटियां : अंशु झा

 

मंदिरों की घंटियों में
मंदिरों की घंटियों में,
अब नहीं जयघोष रहा,
न मानवता, न नैतिकता,
न दया–धरम का लेश रहा,
दानवों का बोल–बाला,
जग में हाहाकार मचा,
ढूंढ लो कोना कोना में,
कहीं नहीं विवेक रहा,
मंदिरों की घंटियों में
अब नहीं जयघोष रहा ।

सरे आम बीच सडक पर,1
लुट रही है बेटियां,
दूधपीती बच्चियों का,
पकड घसिटता चोटियां,
माएं रोती रही,
पिता चित्कार करता रहा,
मंदिरों की घंटियों में
अब नहीं जयघोष रहा ।

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कोई खींचा पैर कली का,
कोई चिडता सलवार,
कोई हाथ पकड मडोरा,
कोई स्तन पर किया प्रहार,
राक्षसों के कैद में बेटी,
भीख स्वतन्त्रता का मांगती रही,
आंखों से आंसू बहे,
देर तक फडफडाती रही,
एक न सुना हैवानों ने,
बलात्कार करता रहा
मंदिरों की घंटियों में
अब नहीं जयघोष रहा ।

हे विधाता ! सुन ले विनती,
किसी के घर न देना बेटी,
हो सके तो कृष्ण को भेजो,
कंश से अब भरा ये धरती,
बेटियों के करुण रुदन से,
अब आकाश है फट रहा,
मंदिरों की घंटियों में
अब नहीं जयघोष रहा ।

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अंशु झा, कवयित्री, लेखक एवं पत्रकार , काठमाण्डू ।

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