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नेपाल में न समाजवाद है न साम्यवाद, यहां अनुवांशिकी भोगवाद है : अजयकुमार झा

 
जलेश्वर | 2065 में मैंने अपने एक मंतव्य में रौनियार धर्मशाला में बोला था, कि “नेपाल में न समाजवाद है न साम्यवाद। यहां गंधर्वो के राज होने के कारण अनुवांशिकी भोगवाद हैं।”  कुछ लोग अमेरिकी डालर से भोगातुर है तो कुछ युयान में लिपटे हुए है, वहीं बहुतेरे लोग भारत के रुपयों में नहाकर भारत को ही गालियां देते रहते हैं। ऐसी हालत में न संविधान के गरिमा को ऐसे लोग समझ पाते हैं, न राष्ट्रीय महिमा को। इन विदेशी नोकरीहरा के लिए पैसा और पद ही सर्वोपरी है।अतः राष्ट्रीयता और स्वाभिमान के नाम पर किए गए और किए जा रहे सभी आंदोलन अंततोगत्वा जनता के लिए दुखदाई ही साबित होगा। देश के साथ गद्दारी ही प्रमाणित होगा।
नोट:- नेपाल में एक भी नेता बता दें जो ईमानदार और समझदार हो।निष्पक्ष तथा सच्चा देशभक्त हो।किसी भी देश के एजेंट न हो। आप विचार कीजिए, मनन कीजिए, और स्वतंत्र होकर प्रज्ञापुर्ण निर्णय लीजिए, जो देश तथा समग्र देशवासी के हित में हो। धर्म और संस्कृति के संरक्षण तथा संबर्धन में हो। मानवता के कल्याण में हो।
दुनिया में करीब 2.2 अरब आबादी ईसाईयों की है जोकि पूरी दुनिया की आबादी का करीब 31.5 प्रतिशत है। इनके धर्म का 70 से अधिक देश है।
दुनियाभर में कुल मुसलमानों की संख्‍या करीबन 1.6 अरब है; तो वहीं उनके लिए 57 देश है। हम हिन्दू  1 अरब है जोकि विश्‍व आबादी की कुल 13.95 प्रतिशत है। हमारे लिए कोई देश नहीं है। बुद्ध धर्म की आवदी विश्व में 37.6 करोड़ है जोकि विश्‍व की आबादी की करीब 5.25 प्रतिशत है। और उनके लिए भी 4- 5 देश है। विश्व में यहूदियों कि कुल आबादी करीब 1.4 करोड़ है जोकि विश्‍व आबादी को 0.20 प्रतिशत है। लेकिन उनके लिए भी एक देश है, इजरायल। ऐसे में एक अरब आबादी बाला हिन्दू के लिए कोई देश नहीं है। एक नेपाल था उस भी  2008 में विदेशी षडयन्त्रकारी और नेपाली दलाल नेताओं तथा भारत के अदुरदर्शी निर्णयों के कारण नेपाल को हिन्दू राष्ट्र की जगह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया। वर्तमान में यहां हिन्दुओं की आबादी 81.3 फीसद है। 9.9 फीसद बौद्ध, 4.4 फीसद मुस्लिम, 3.3 फीसद किराटिस्ट (स्वदेशीय जातीय धर्म) 1.4 फीसद ईसाई व 0.2 फीसद सिख हैं। इतनी विशाल जान समुदाय को विश्वासघात करते हुए देश बेचुवा नेताओं ने हिजड़ो के शैली में तालियां बजाकर अपनी ईमान और संस्कार रूपी धर्म तथा संस्कृति को बेच दिया था। आज नेपाली राष्ट्रीयता के गरिमा को लौटाने का समय आ गया है। वर्तमान नायक भी जन समर्थन के प्रतीक्षा में है। वर्तमान प्रणाली के अंतर्गत प्रधानमंत्री के कदम को ग़लत भी ठहराया जा सकता है।देश को चलाने बाला बाहिरी शक्ति से लडने कि क्षमता किसी भी नेपाली नेता में नहीं है। फिलहाल ओली जी ने चाइना को भी मुंहतोड़ जवाब देकर विशुद्ध राष्ट्रीयता और राष्ट्रनायक के रूप में खुद को स्थापित करने का खतरों से भरा निर्णय लिया है, जिसे आम नागरिक स्वागत ही कर रही है। वर्तमान निर्णय के स्वरूप को तीव्रता नहीं दिया गया तो जनता को भड़काया भी जा सकता है। और बाद में हिंदुत्व के नाम पर कमल थापा जैसे अवसर वादी जनता को गुमराह कर लाभ उठाने से बाज नहीं आएगा।कांग्रेस के एक खेमा भी हिंदुत्व के समर्थन में आवाज उठाते आ रहे हैं। ज स पा के अत्यधिक समर्थक स्वाभाविक रूप से हिंदुत्व की चाहना रखते हैं। अतः कुल मिलाकर देखा जाय तो ओली जी का पलड़ा भारी होते देर नहीं लगेगा। इसका अत्यधिक संभावना है कि हिंदुत्व के लिए घोषित जनमत संग्रह में उन्हें दो तिहाई बहुमत ही मिल जाय। इतना तो पक्का है कि आम नेपाली जनता ने धर्म निरेक्षता को नकार दिया है। प्रधानमंत्री के निर्णय को स्वागत भी किया है। भारत के विरुद्ध उनके निर्णय को नेपालियों ने दिल से समर्थन किया था। उनपर भरोसा भी किया है। ऐसे में ऐतिहासिक पुरुष बनने के लिए जनता पर भरोसा कर के क्रांतिकारी कदम उठाना उनके लिए चुनौती नहीं वल्कि अन्य पार्टी तथा नेताओं के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। आज के परिवेश में नेपाली जनता के लिए सामान्य चुनाव का कोई मूल्य नहीं है। प्रधानन्त्री अथवा सरकार बनाने वाली चुनाव से लोग निराश हो गए हैं। अतः भ्रष्टचारियों को दण्डित करते हुए प्रत्यक्ष प्रधानमंत्री के चुनाव तथा हिंदुत्व के लिए जनमत संग्रह हेतु निर्णय करना समय सापेक्ष दिखता है।

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