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बेटों से किसी तरह कम नहीं हैं बेटियां, हर क्षेत्र मे बराबरी योगदान : यामिनी स्वामी

 

बेटियों का मान बढ़ाती यामिनी स्वामी की नयी फिल्म बधाई हो! बेटी हुई है रिलीज के लिए तैयार

हमारे समाज में बेटियों के प्रति अवधारणा हमेशा गलत ही रही है लेकिन बेटियों ने भी हर क्षेत्र जैसे मुक्केबाजी हो या फाइटर प्लेन उडाना हो हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया है इसी के कारण समाज ने नतमस्तक होकर बेटियों को गर्व के साथ स्वीकार किया है। इस फिल्म में एक ऐसे परिवार की कहानी है जो आर्थिक रूप से कमजोर है, लेकिन उस घर में एक बेटी है जो पढं लिखकर परिवार की बुनियाद बनी है।

साथ ही इस फिल्म में नारी सशक्तिकरण, कन्या भ्रूण हत्या को रोकने तथा आत्मनिर्भरता के क्षेत्र मे बेटियों को बेटों के क्षेत्र में समान अधिकार दिलाने के लिए फिल्म में बेटियों को लेकर लोगो को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया गया है।

इस फिल्म की लेखिका यामिनी स्वामी शुरू से ही एक लडकी होने के कारण अपने परिवार और आस-पास के लोगों के ताने की शिकार हुई। इसी कारण उन्होंने शुरू से ही तय कर लिया था कि लडकियों को लेकर समाज को जागरूक करने की जरूरत है।

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यामिनी स्वामी बचपन से ही बहुत रचनात्मक और नारी समानता व उत्थान के प्रति सजग रही हैं। नारी के प्रति उनकी रचनात्मकता का पता इन्ही चंद पंक्तियों जो उन्होंने बचपन में लिखी वो यह है…

दुनिया में कैसे आओगे? माता किसे बुलाओगे? बहना किसे बनाओगे? राखी किससे बंधवाओगे?

क्या हुआ अगर बेटा न हुआ बेटी हुई यह तो खुशी की बातें है..क्यों रूक जाती है सुई?

यामिनी बताती हैं कि उन्होंने एक गाना लिखा था, जिसे अनूप जलोटा जी द्वारा गाया गया था। इसी से प्रेरणा लेकर मैने ऐसी बेटी की कहानी लिखी जिसके सिर पर पिता का साया नहीं था।
परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है, लेकिन माॅं ने बेटी को बेटे के समान शिक्षा और अधिकार दिए। जिसके बाद बेटी ने अपने परिवार का नाम रोशन किया।
यामिनी स्वामी समाज से सवाल पूछती हुए कहती है कि बेटियों का जन्म चाहे समाज के किसी भी वर्ग में क्यों न हो? समाज उसे आसानी से स्वीकार क्यों नही कर पाता?

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यामिनी स्वामी आगे बताती है कि जब उनकी बहन का जन्म हुआ तो वह हाॅस्पिटल गई थी जहां उन्होने देखा कि लडके के जन्म पर लड्डू बांटे जा रहे थे, लेकिन बेटियों के जन्म पर सभी के चेहरे उतरे हुए थे। यह सब देख काफी उदास हुई क्योकि कितनी महत्वपूर्ण होती है बेटियाॅं घर और समाज के लिए।

यामिनी स्वामी कहती हैं कि मेरी फिल्म बनाने का एक सपना था। लेकिन मेरा गाना सुनने के बाद लोगों ने मुझे बहुत सराहा। और मुझे ऊन लोगों से प्रेरणा मिली।

फिर मैंने फिल्म बनाने का निर्णय किया, क्योंकि फिल्म एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मैं अपनी बातें बहुत सारे लोगों तक पहुंचा सकती हूं। उनका कहना कि समाज में बेटियों की छवि को इतने उपर तक ले जानें की जरूरत है कि लोेग बेटियाॅ होने पर गर्व महसूस करें न कि उदास हों।

यामिनी बताती हैं कि इस फिल्म की शुरूआत अगस्त में ही हो गई थी। लेकिन मैं इस फिल्म में अभिनय करूॅगी, इसके बारे में सोचा नहीं था। लेकिन मेरे आस पास और मेरे परिवार में जो मैंने देखा है उसे मैं लोगों के साथ आसानी सें जुड़ सकती हूं। इस फिल्म की शूटिग राॅंची, मुम्बई, दिल्ली में हुई।

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जब उनसे पूछा गया कि रांची को ही शूटिंग के लिए क्यों चुना तो उन्होंने बताया कि रांची ही वह जगह है, जहाॅं फिल्म बनाने की शुरूआत हुई और वह बहुत से ऐसे कलाकार है, जिन्हें कुछ करने के लिए मंच नही मिल पाता उन्हें हमनें मंच दिया।

उन्होंने बताया कि मैं ही इस फिल्म की निर्देशक, लेखक और स्क्रिप्ट की हूं।
इसका टोटल बजट 8-9 करोड है और इस फिल्म को मार्च तक बना लिया गया था लेकिन लाॅकडाउन लग जाने के वजह से फिल्म में देरी हुई।

अंत में उन्होने कहा कि बेटियां सारी मुश्किलों कें बाद भी जो भी करती हैं, वह अपने परिवार और देश के लिए करती हैं, देश को आगे बढ़ाती हैं।

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