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दुलारी : वसन्त लोहनी

 

दुलारी

दुलारी हो आप
शुरू से अंत तक
जब आप हंसती हो
खिलखिलाहट उभरती है
लगता है फूलों ने खिलना शुरू किया
आपकी खिलखिलाना गूंज उठी
सातों सुर अपने आप लगने लगे
अनुपम सिर्जना के लिए
चेहरा देदीप्यमान दिखाई देता है
लगता है अभी अभी दीप जला हो
चेहरे में अंकित घनीभूत भाव
इतना सुंदर लगता है
जैसे उद्गम स्थल हो मासूमियत की
आप सचमुच दुलारी है
जितना देखता हूं
देखने को और मन करता है
जितना साथ रहता हूं
साथ रहने को और दिल चाहता है
दुलारी, मेरी दुलारी हो आप।

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वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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