औरत होना ही हमारी मजबूती है : रमिता यादव

मैं रमिता यादव एक पत्रकार हूँ और साथ ही कानून की विद्यार्थी भी । मैं नेपाल के मधेशी समुदाय से आती हूँ । जहाँ पहले बेटियों को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता था । मैं जब छोटी थी तब से समाज में महिलाओं के उपर होनेवाले कई प्रकार की हिंसा, सामाजिक कुरीति, प्रथा, परम्परा, रीतिरिवाजों के बहाने महिलाओं के उपर होनेवाले अत्याचार को देखती आई हूँ । यह सब देखकर अन्दर एक उबाल आता था । इसके विषय में बोलने और कलम चलाने का मन होता था । और यही वजह है कि मैंने पत्रकारिता को चुना । क्याेंकि यही एक क्षेत्र है जहाँ आप अपने विचार स्वतंत्र रूप से रख और बोल सकते हैं ।
मैं मास कम्यूनिकेसन में मास्टर्स कर रही हुँ । परिवार के सदस्यों ने हमेशा मेरा साथ दिया । जहाँ तक शादी के बाद की परिस्थितियों का सवाल है तो वह हमेशा आपके अनुकूल नहीं होता । शादी के बाद जैसा आप चाहते हैं वैसा बिल्कुल भी नहीं हो पाता है । बहत सारी जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हंै । जिम्मेदारियाँ निभाते निभाते कभी कभार थक सी जाती हूँ लगता है कि सारा छोड़–छाड कर कहीं चली जाऊँ सब रहने के बावजूद भी अकेलापन महसूस होने लगता है । फिर सोचती हूँ नहीं जीवन का नाम ही संघर्ष है और हम तो दूसरों की आवाजÞों को बुलंदी देने का काम करते हैं अपने लिए और परिवार के लिए तो वक्त ही नहीं मिलता है । एक मानव होने के नाते अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभाना हमारा दायित्व बनता है इसलिए उसमें कभी कोई चुक नहीं होने देते ।
मेरी एक छोटी सी ६ साल की बेटी है । अभी बड़ों की तरह तो कोई सहयोग नहीं कर पाती हाँ, भावनात्मक रूप में मुझे लगता है उससे ज्यादा मुझे कोई नहीं समझता और नहीं कभी समझ पाएगा । इमोस्नली बहत सर्पोट मिलता है ।
बाहर की दुनिया हमारे लिए बहुत सहज नहीं है । एक औरत होने के नाते घर, परिवार, कार्यालय स्थल हर जगह हर दिन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है । अगर आप शादीशुदा हैं और अकेले भागदौड़ अपने काम या अन्य किसी कारणों से कर रहे हैं तो लोग आपको बुरी नजÞर से देखने लगते हैं । आपसे बेवजह मिलने की कोशिश में लगे रहते हैं । काम के बहाने आपका गलत इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं । अगर आप किसी से कोई सहयोग की अपेक्षा करें तो उसकी भी कई बार आपसे गलत अपेक्षा होती है । सहायता के बदले वो आपका गलत इस्तेमाल करने की कोशिश में लगे रहते हैं । कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है । घर में तो औरतों के साथ सामान व्यवहार नहीं होता तो हम बाहर के लोगों से इसकी क्या अपेक्षा करें । सभी पुरुषों के लिए तो नहीं कह सकते लेकिन मेरा ये मानना है कि १०० में से ९० प्रतिशत पुरुष महिलाओं पर अपना पुरुषत्व जताते हैं । सब से पहले तो सभी समान हैं और महिलाएँ भी एक इंसान है उसको भी थकान होती है उसको भी दर्द होता है अगर ये बात पुरुष अपने जेहन मेें बसा ले तो किसी भी महिला को काई परेशानी नहीं झेलनी पड़ेगी ।
मैं मानती हूँ कि हमें खुद को कभी किसी से कमजोर नहीं समझना चाहिए । हमारा औरत होना ही हमारी मजबूती होनी चाहिए । दूसरों से तुलना नहीं करें ना किसी के सहारे रहें यह बात आत्मसात् कर के हर महिला को आगे बढ़ना चाहिए यही मैं विश्वनारी दिवस पर सभी महिलाओं को कहना चाहती हूँ कि हम किसी से कम नहीं हैं ।

